साहित्य - संस्कृति

“ जन संस्कृति को लोक संस्कृति के क़रीब जाना होगा ”

जोगिया ( कुशीनगर)। 16वें लोकरंग के दूसरे दिन आज दोपहर में “ लोक संस्कृति का भविष्य बनाम भविष्य की लोक संस्कृति” विषय पर विचार गोष्ठी हुई। विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने लोकसंस्कृति के संकट के विविध पहलुओं पर चर्चा करते हुए लोकसंस्कृति को जन संस्कृति में बदलने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए इसके लिये व्यापक जन अभियान चलाने की बात कही।
मुख्य अतिथि डॉ सुरेश ख़ैरनार ने कहा कि लोक संस्कृति में बहुत कुछ ऐसा था जिसके छूट जाने या दूर हो जाने को अच्छा कहा जाना चाहिए। ख़ासकर महिलाओं के श्रम का शोषण करने वाली व्यवस्था का लोक संस्कृति का नाम पर गौरवगान करने की कोई ज़रूरत नहीं है। उन्होंने भेष भूषा खान पान के नाम पर लिंचिंग और हमले का प्रतिरोध न होने को सांस्कृतिक पतन की पराकाष्ठा बताते हुए कहा कि लोक संस्कृति के संकट को समग्रता में राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संकट के बतौर देखने और उसका मुक़ाबला करने की ज़रूरत पर बल दिया।

विचार गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रो शम्भू गुप्त ने कहा कि लोक जीवन, लोक संस्कृति और लोक मूल्य को बचाने के लिए मध्य वर्ग को अपने विचलन से पीछे हटना होगा। लोक संस्कृति का मूल सामूहिकता और सहजता में है। प्रकृति से प्रगाढ़ निकटता से है। अतीत से सबक़ लेते हुए आंदोलनात्मक मनोवृत्ति पैदा कर ही हम लोक संस्कृति का भविष्य सुनहरा बना सकते हैं।

रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो दिनेश कुशवाहा ने कहा की लोक संस्कृति मिश्रित संस्कृति होती है जिसे धर्मसत्ता, राजसत्ता और पितृसता निर्देशित करती है। जब यह धर्मसत्ता के साथ होती है तो अंधाधुंध मिथकों का निर्माण करती है जिसे कालांतर में इतिहास की तरह प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने लोक संस्कृति का सकारात्मक पक्ष को दुःख को अभिव्यक्ति करने की क्षमता में बताया और लोक संस्कृति को जन संस्कृति में बदलने की लड़ाई में कमजोरी का ज़िक्र करते हुए कहा कि लोक संस्कृति को भ्रष्ट, विकृत करने की कोशिशों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने साथ साथ बड़ा जन अभियान और आंदोलन ही इसे सही दिशा में ले जा सकता है।

कोलकाता के सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज (सीएसएसएससी) में जेंडर स्टडीज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ आशा सिंह ने कहा कि हिन्दी की हेज़मनी इतनी तगड़ी है कि हम भोजपुरी को ज्ञान, राजनीति और इतिहास की भाषा बनाने के बारे में हम बहुत कम बात करते हैं। उन्होंने भोजपुरी क्षेत्र की महिलाओं के लिए लिट्रेसी और इंफ़्रास्ट्रक्चर स्पेस बनाये जाने की ज़रूरत को रेखांकित करते हुए कहा कि इससे सांस्कृतिक रूपों में नयी प्रकार की मौलिकता आयेगी। डॉ आशा सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति के संरक्षण से आगे बढ़कर उसे बदलने, लोक संस्कृति के परम्परागत विचारों का खंडन करने और यथास्थितिवाद को सांस्कृतिक रूप से बदलने पर जोड़ देते हुए कहा कि जब भोजपुरी क्षेत्र की महिलाओं को दूसरे भाषायी संसाधनों से जोड़ा जाएगा तो वे सामाजिक परिवर्तनों से जुड़ेंगी और एक नयी आधुनिक चेतना लोक संस्कृति में आयेगी।

दक्षिण अफ़्रीका के डरबन से आये भोजपुरी गायक केम चांदलाल ने दक्षिण अफ़्रीका में भोजपुरी भाषा के आंदोलन के बारे में बताया और कहा कि हम वहाँ भोजपुरी को स्पेस दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक चंद्रभूषण ने कहा कि शासक वर्ग ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए संस्कृति को औज़ार बना रखा है। हमें एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार होना चाहिए। आज के समय में कलात्मक पूँजी बढ़ रही है लेकिन उसके अनुरूप प्रयोग नहीं हो रहे हैं। लोक कलाओं में अशिक्षित लोग भी अपनी रचनाओं में बड़े बड़े बिंब उपस्थित करते हैं जिसे टेक्निक से नहीं लाया जा सकता। यह लोक की सहज संवेदना से संभव हो पाता है। कला का मन बड़ी चीज होती है न कि टेक्निक। उन्होंने कहा कि जन संस्कृति को लोक संस्कृति के क़रीब जाना चाहिये।

झारखंड से आयीं वरिष्ठ लेखिका एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ता वंदना टेटे ने कहा कि आदिवासी पुरखा संस्कृति में विश्वास करते हैं जो हमारी ज्ञान परंपराओं, गीत, कहानी, गाथाओं से बनी है। आज लोग लोक संस्कृति को जीने का भ्रम प्रदर्शित करते हैं लेकिन वास्तव में उसे नहीं जीते। हैं। यदि हम मूल से हटे बिना लोक कला में कुछ नया जोड़ रहे हैं तभी हम लोक संस्कृति के भविष्य को बेहतर बनते देख पायेंगे। साकेत महाविद्यालय के हिन्दी के प्रोफ़ेसर अनिल कुमार सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति एक आयामी नहीं है। शासक वर्ग लोक संस्कृति पर न सिर्फ़ अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश करता हैं बल्कि लोक से उसकी स्वीकृति भी पाने का प्रयास करता हैं। शासक वर्ग अक्सर वर्चस्व स्थापित करने के लिए धर्म का सहारा लेता है। उन्होंने कहा कि लोकसंस्कृति का कोई भविष्य तभी हो सकता है जब यह जन संस्कृति में बदल जाय। सामूहिक बुद्धिमता से ही लोक संस्कृति को बचाया जा सकेगा।

विचार गोष्ठी के पहले वक्ता वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति का सीधा संबंध सामूहिकता और श्रम से है। आज उत्पादन संबंध बदल रहे हैं, संप्रेषण के माध्यम भी बदल गये हैं लेकिन श्रमशील जनता के दुःख और पीड़ा में कमी आने के बावजूद उसमें विस्तार हुआ है। शासक वर्ग एक तरफ़ परंपरा के नाम पर पुराने पतनशील मूल्यों व विचारो को बढ़ावा दे रहा है तो दूसरी तरफ़ आधुनिकता के नाम पर पूँजीवादी विचार का वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। लोक संस्कृति शासक वर्ग की पतनशील मूल्यों के प्रभाव में हैं। आज जिन चंद अमीरों ने देश की संपत्ति पर कब्जा कर बहुसंख्यक जनता को भूखा, ग़रीब बना दिया है वे ही कल्चरल सेंटर स्थापित कर संस्कृति को संरक्षित व आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। ऐसे समय में नये प्रयोगों के ज़रिए दमन और हिंसा के बीच जनता की संस्कृति को विकसित का साहस करना होगा।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ रामनरेश ने कहा कि तरह तरह के विभाजनों और सरंचनाओं पर सवाल उठाये बिना एक रेखीय तौर पर लोक संस्कृति की बात नहीं हो सकती। लोक संस्कृति की प्रतिरोधी चेतना को बचा लिया जाना आज की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जातिवादी संस्कृति का मुक़ाबला किए बिना भविष्य की लोक संस्कृति नहीं बन पाएगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के शिक्षक डॉ दीनानाथ मौर्य ने कहा कि आज जब संस्कृति के क्षेत्र में एकरूपता की बात की जा रही है तो लोक संस्कृति इसके बरक्स सामने आती है जो विविधता के आधार पर खड़ी है।

विचार गोष्ठी में मोतीलाल ने लोक कलाओं में संप्रेषण के नये माध्यमों के प्रयोग पर बाल दिया तो शिवानन्द यादव ने अंधविश्वास से संघर्ष को प्राथमिक बताया। गाँव के लोग पत्रिका से जुड़ीं अपर्णा ने लोक संस्कृति को बचाने में महिलाओं की महती भूमिका को रेखांकित किया। गोष्ठी में महेंद्र कुशवाह, कथाकार दीपक शर्मा ने भी अपनी बात रखी।
गोष्ठी का संचालन कथाकार रामजी यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने लोक संस्कृति के संकट और उसको बचाने की लड़ाई के लिए लोक संस्कृति के इतिहास को समझने पर जोर दिया।

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