गोरखपुर/कुशीनगर। बौद्ध परिपथ की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्रा ‘ चरथ भिक्खवे ‘ आज चौथे दिन शाम को कुशीनगर पहुंचेगी। इस यात्रा में जाने माने साहित्यकार , सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं।
यह यात्रा 15 अक्टूबर को केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ के परिसर में आयोजित कार्यक्रम के साथ शुरू हुई थी। सारनाथ से चलकर बोधगया, नालन्दा, राजगीर, पटना, वैशाली, केसरिया होते हुए यात्रा आज शाम कुशीनगर स्थित पथिक निवास पहुँचेगी। अगले दिन 19 अक्तूबर को प्रातः 10 बजे कुशीनगर में भ्रमण और संवाद का कार्यक्रम है।
यात्रा संयोजक प्रो सदानन्द शाही ने कहा कि 19 अक्टूबर कुशीनगर से यात्रा रामकोला , परतावल, सोनौली होते हुए लुम्बिनी पहुंचेगी। वहाँ से 20 अक्टूबर को कपिलवस्तु होते हुए यात्री श्रावस्ती पहुंचेंगे। इसके बाद यात्रा कोशाम्बी होते हुए 24 को सारनाथ में सम्पन्न होगी।
यात्रा में लेखिका डॉ. गगन गिल, वरिष्ठ आलोचक डॉ. रंजना अरगड़े, डॉ. पृथ्वीराज सिंह, आनंदरूप घोष, डॉ. शैलेन्द्र, डॉ. पिंटू कुमार, डॉ. अनुज कुमार तरुण, डॉ. अम्बे कुमारी, डॉ. रमाशंकर सिंह, प्रकाश उदय, डॉ. कुणाल किशोर, अंशुप्रिया, चाहत अन्वी, वंदना शाही आदि शामिल हैं। कुशीनगर में कुशीनगर , गोरखपुर और आस-पास के जिलों के साहित्यकार, लेखक व संस्कृतिकर्मी यात्रा में शामिल होंगे।
प्रो शाही ने यात्रा के उद्देश्य के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि ‘अप्प दीपो भव का संदेश देने वाले गौतम बुद्ध को दुनिया महान शिक्षक के रूप में याद करती है। प्राचीन भारत के इतिहास में एक हजार वर्षों तक धम्म की जिस विशाल तरंग ने समूचे भारत को सराबोर कर दिया था, उसके सर्वोच्च शिखर पर जो महिमामयी मूर्ति विराजमान है, दुनिया उन्हें शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के नाम से जानती है। प्राचीन भारत में उन्हीं की प्रेरणा से एक महान सामाजिक बदलाव और धर्म, साहित्य, कला और संस्कृति में एक नव जागरण का सूत्रपात हुआ।
उन्होंने कहा कि आधुनिक भारत में भी उन्नीसवीं शताब्दी से जिस महान नवजागरण का आरंभ हुआ उसकी प्रेरणा का एक शक्ति स्रोत भगवान बुद्ध हैं। वर्तमान विश्व , युद्ध और युद्ध की आशंकाओं से त्रस्त है। सत्य असत्य का संघर्ष, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने का संघर्ष, अधिकार का संघर्ष आदि कितने ही संघर्षों से अटी पड़ी है मानव सभ्यता। ऐसे में हर अबोले प्रश्न का उत्तर हैं बुद्ध। बुद्ध अर्थात शांति, बुद्ध अर्थात ज्ञान और बुद्ध अर्थात प्रेम। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा था ‘ चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय, लोकानुकंपाय .. अर्थात् भिक्षुओं बहुजन सुख के लिए बहुजन हित के लिए,लोगों को सुख पहुँचाने के लिए निरन्तर भ्रमण करते रहो।हम बुद्ध की इसी शिक्षा को ध्यान में रखते हुए करुणा, मैत्री और संवाद का सन्देश लेकर यात्रा पर निकले हैं।