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ककरहा और मुर्तिहा के अन्य परंपरागत वन निवासियों को बेदखल नहीं करने के लिए डीएम को पत्र लिखा

बहराइच। सामाजिक कार्यकर्ता जंग हिंदुस्तानी ने जिलाधिकारी को पत्र भेजकर वन अधिकार कानून 2006 के प्राविधानों का समुचित परिपालन करते हुए अतिक्रमण के नाम पर ककरहा और मुर्तिहा के अन्य परंपरागत वन निवासियों को बेदखल नहीं करने की अपील की है।

डीएम के नाम भेजे पत्र में उन्होंने कहा है कि वह वन अधिकार कार्यकर्ता है और पिछले 2005 से वन अधिकार कानून 2006 के क्रियांवयन के लिए प्रयासरत‌ हैं। उत्तर प्रदेश की लोकप्रिय सरकार द्वारा अब तक वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा देने के साथ-साथ वन निवासियों के मुद्दों पर भी सरकार ध्यान दे रही है किंतु वन विभाग सरकार की छवि को धूमिल करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि जानकारी में आया है कि भारत नेपाल सीमा से 5 किलोमीटर के भीतर अतिक्रमण हटाने के नाम पर वन विभाग एक साजिश के तहत सशस्त्र सीमा बल, पुलिस तथा राजस्व विभाग के अधिकारियों को भ्रमित करके जनपद बहराइच के तहसील मोतीपुर के ककरहा के एक परिवार व मुर्तिहा के नौ परंपरागत निवासी परिवारों के घरों व अन्य परंपरागत वन निवासियों के सामुदायिक अधिकार के तहत उनके पवित्र पूजा स्थल/मंदिर को अतिक्रमण बताकर उन्हें ध्वस्त कराना चाहता है जो कि वन अधिकार कानून 2006 की धारा 4 उपधारा 5 का सरासर उल्लंघन है। यह सभी पवित्र स्थल वन विभाग के अस्तित्व में आने के पूर्व से स्थित है जिसे जनपद बहराइच के 1903 के गजेटियर और वन प्रबंधन कार्य योजना 1908 व इंपीरियल फॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया 1902 के मानचित्र में वर्णन किया गया है।

उन्होंने बताया कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत( वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 की धारा 4(5) में स्पष्ट लिखा गया है कि “जैसा कि अन्यथा उपबंधित है, के सिवाय वन में रहने वाले किसी भी अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी के उसके कब्जे की जमीन से उसे तब तक बेदखल नहीं किया जाएगा जब तक मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

उन्होंने कहा कि इन वनबस्ती ग्रामों के लिए ग्राम स्तरीय वन अधिकार समितियों के गठन की प्रक्रिया चल रही है जिसके समक्ष दावा प्रस्तुत किया जाना है।

उन्होंने कहा कि वन अधिकार कानून 2006 सभी अन्य कानून की अपेक्षा सर्वोच्च है इसलिए यदि किसी विभाग/अधिकारी/ कर्मचारी या व्यक्ति के द्वारा अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006 की इस धारा का उल्लंघन करने वाले वन अधिकार अधिनियम 2006 नियम 2008 और संशोधित नियम 2012 के तहत दोषी माने जाएंगे और उनके विरुद्ध सक्षम अदालतों में वाद दायर किए जाएंगे।

उन्होंने जिलाधिकारी जी से अपील की है कि बिना विकल्प दिए अथवा सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिए बिना किसी भी वन निवासी के परिवार को बेदखल ना किया जाए।