जीएनएल स्पेशल

नेपाल : राजावादी आंदोलन कितना मजबूत

अगले कुछ महीनों बाद जब नेपाल ने संविधान लागू हुए दस वर्ष हो जाएंगे, नेपाल एक प्रतिगामी आंदोलन का सामना कर रहा है जिसमें राजशाही समर्थक ताकतें नेपाल को धर्मनिरपेक्ष संघीय गणराज्य के बजाय राजशाही की स्थापना की मांग कर रही हैं। साथ ही संघवाद को देश की एकता के लिए गैर जरूरी बता रही है।

राजा समर्थक ताकतों ने 28 मार्च को अपनी इन मांगों को लेकर काठमांडू के तिनकुने इलाके में हिंसक प्रदर्शन किया। हिंसा की घटना में एक टीवी पत्रकार सहित दो लोगों की जान चली गयी और 100 से अधिक पुलिस कर्मी व प्रदर्शनकारी घायल हो गए। जिला प्रहरी के अनुसार निजी सम्पत्ति, अस्पताल, व्यापारिक केन्द्र और तीन मीडिया केन्द्रों पर आगजनी, तोड़फोड़ व लूटपाट की गई। नेपाल समाजवादी पार्टी के कार्यालय में भी आगजनी की गई। पुलिस को हिंसा पर काबू पाने के लिए  कर्फ्यू लगना पड़ा हालांकि अगले ही दिन कर्फ्यू को हटा दिया गया।

सरकार ने हिंसात्मक आंदोलन पर सख्ती दिखाई और राजा समर्थक पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के महासचिव धवल शमशेर राणा, उपाध्यक्ष रवीन्द्र मिश्र को गिरफ्तार किया। राज संस्था पुनर्स्थापना के लिए संयुक्त जन आंदोलन समिति के संयोजक 86 वषीर्य नवराज सुवेदी को उनके घर में नजरबंद कर दिया। आंदोलन के कमांडर दुर्गा प्रसाई फरार हो गए जिन्हें 14 दिन बाद आसाम से पकड कर कर नेपाल लाया गया।

इस घटना के बाद राजा समर्थकों के कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हुए हैं। इन घटनाओं की काफी चर्चा हुई है। भारत की मीडिया में इसको लेकर खूब सुर्खी बनी।

एक दशक तक चले माओवादियों के सशस्त्र विद्रोह के बाद 21 नवंबर 2006 को शांति समझौता हुआ था। शांति समझौते का बाद चले व्यापक जन आंदोलन ने दो वर्ष में ही ज्ञानेन्द्र विक्रम शाह की राजशाही को खत्म कर दिया।

 नए नेपाल के लिए 10 अप्रैल 2008 को पहले संविधान सभा का चुनाव हुआ। संविधान सभा की पहली बैठक 28 मई 2008 को हुई जिसमें गणतंत्र की घोषणा हुई। एक पखवारे बाद ज्ञानेन्द्र शाह को नारायण हिती राजमहल को छोड़कर जाना पड़ा। नारायण हिती महल को म्यूजियम बना दिया गया।

पहली संविधान सभा संविधान का मसौदा तैयार नहीं कर पायी तो फिर दूसरी संविधान सभा का चुनाव हुआ और 20 सितंबर 2015 को नेपाल को जनता द्वारा चुनी गयी संविधान सभा से अपना संविधान मिला। इसके पहले नेपाल में अलग-अलग तरह के छह और संविधान अस्तित्व में रहे थे।

17 वर्ष पहले नारायणहिती महल से विदाई के बाद से पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र विक्रम शाह एक तरह से खामोश रहे। वह साल में नए वर्ष पर और कभी-कभी त्योहारों पर देश को अपनी शुभकामनाएं देते और मठ-मन्दिरों का भ्रमण करते। ऐसा लगता था कि उन्होंने अपनी नियति स्वीकार कर ली लेकिन यह सच नहीं था। उनमें फिर से नारायणहिती महल लौटने और वहां से देश के शासन की बागडोर हाथ में ले लेने की दिली तमन्ना खत्म नहीं हुई थी। अवसर देख अपनी तमन्ना को हकीकत में बदलने का प्रयास करने लगे।

पिछले पांच वर्ष से धीरे-धीरे उन्होंने अपनी गतिविधियां बढ़ाना शुरू कर दिया था। तीन वर्ष पहले नए वर्ष (वैसाख एक 2079) को उनके शुभकामना संदेश से उनकी भाषा बदली नजर आयी। उन्होंने पहले की तरह अपने को पूर्व महाराज के बजाय श्री 5 महाराजधिराज कहा। दो वर्ष पहले उन्होंने अपने संदेश में कहा कि युवा पीढ़ी मौजूदा व्यवस्था और सरकार की गतिविधियों से पूरी तरह असंतुष्ट होती जा रही है।

एक वर्ष पहले उन्होंने कहा कि भले ही पद्धतियां, प्रणालियां, शब्द और रूप बदल गए हों लेकिन देश में गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है। समय है कि लोग गंभीरता से सोचे, समीक्षा करें और सभी मिलकर सही चिंतन की दिशा में आगे बढ़ें। उन्होंने किसी का निषेध न करने को कहते हुए राजशाही की चाह को व्यक्त किया।

इस बार नेपाली नववर्ष पर उन्होंने 28 मार्च को राजशाही के समर्थन में हुई हिंसा पर चुप्पी साधे रखा और इसके लिए खेद तक प्रकट नहीं किया। उन्होंने खुले रूप से राजशाही के योगदान की चर्चा करते हुए जनता की भावनाओं-इच्छाओं के समझते हुए देश के समग्र ढांचे में परिवर्तन और सुधार के लिए कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने अस्थिरता, अशांति, अराजकता गरीबी और भ्रष्टाचार के अंत की बात कही और आशा प्रकट की कि नया वर्ष नेपाली इतिहास का एक यादगार और स्वर्णिम वर्ष बनेगा।

पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह केवल बातें नहीं कर रहे थे बल्कि नारायणहिती महल में अपनी फिर से वापसी के लिए पूरा ताना बाना बनाना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि उनके प्रभाव से राजतंत्र समर्थक पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र के नेतृत्व में बदलाव हुआ और कमल थापा की जगह राजेन्द्र लिङदेन अध्यक्ष बने। हालांकि इससे राप्रपा में विभाजन हुआ और कमल थापा ने नई पार्टी राप्रपा नेपाल बना ली। कमल थापा राजशाही की मांग से दूर हो गए लेकिन अब फिर वे पूर्व राजा के साथ हो गए हैं। ज्ञानेन्द्र शाह ने राजशाही समर्थक संगठनों और ताकतों-आरएपीपी, आरएपीपी नेपाल, रॉयल युवा शक्ति नेपाल, शिवसेना नेपाल आदि को एकत्र किया और राज संस्था पुनर्स्थापना के लिए संयुक्त जन आंदोलन समिति का गठन कर दिया। काठमांडू के तीनकुने इलाके में 28 मार्च के हिंसक प्रदर्शन के पहले 86 वर्षीय नवराज सुवेदी को संयोजक और दुर्गा प्रसाई को इसका कमांडर बनाया गया।

दुर्गा प्रसाई और नवराज सुवेदी तिनकुने हिंसा के एक दिन पहले ज्ञानेन्द्र शाह से मिलने उनके आवास निर्मल निवास गए थे।

दुर्गा प्रसाई एक विवादस्पद व्यक्ति हैं जिनके खिलाफ हथियारों की तस्करी, बैंक का पैसा गबन करने सहित कई आरोप है। यह व्यक्ति कथित रूप से माओवादी और नेकपा यूएमल में भी रह चुका है। नेपाल में इसकी माओवादी एकता केन्द्र के अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल और वर्तमान प्रधानमंत्री एवं नेकपा यूएमएल के अध्यक्ष केपी ओली के साथ एक तस्वीर पर चर्चा में है।

दुर्गा प्रसाई ने राजशाही की पुनर्वापसी के आंदोलन को उग्र बनाया और भीड़ को जबरन संसद की ओर ले जाने की कोशिश की। पुलिस के रोकने पर उसने अपनी जीप खतरनाक ढंग से चलायी। इस शख्स के सोशल मीडिया एकाउंट से पता चलता है कि राज संस्था की पुनस्र्थापना के समर्थन के लिए यह देश के विभिन्न स्थानों पर दौरा करता रहा है। गरीबी और बेरोजगारी के साथ-साथ बैंकों, सहकारी समितियों और माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों से पीड़ित लोगों को एकजुट होकर गौरवशाली नेपाल, राजशाही और सनातन धर्म से जुड़ा नेपाल बनाने का आह्वान करता रहा है। वह नेपाल राज्य की सारी सम्पत्ति मारवाड़ियों के हाथों में केन्द्रित होने की बात कहते हुए ‘ मारवाड़ी चरवाहों ’ के खिलाफ भी लड़ने की अपील करता रहा है।

तिनकुने हिंसक आंदोलन के पहले पांच मार्च को राप्रपा ने राजशाही के समर्थन में बाइक रैली निकाली थी। पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र विक्रम शाह ने पोखरा में प्रवास करते हुए छह मार्च को अपने बड़े भाई वीरेन्द्र विक्रम शाही की मूर्ति का अनावरण किया। इस मौके पर राजशाही व्यवस्था वाला राष्ट्रगान गाया गया। जब वह नौ मार्च को पोखरा से काठमांडू लौटे तो त्रिभुवन हवाई अड्डे पर अच्छी-खासी भीड़ ने उनका स्वागत किया। नारे लगे राजा लाउ देश बचाउ। ज्ञानेन्द्र शाह के स्वागत में उमड़ी भीड़ में एक व्यक्ति के हाथों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर भी दिखायी दी। ज्ञानेन्द्र शाह ने 31 जनवरी 2025 को गोरखपुर जाकर गोरखनाथ मंदिर में पूजा की थी। वर्ष 2018 में उन्होंने लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी।

पोखरा से काठमांडू लौटने के बाद ज्ञानेन्द्र शाह ने मार्च के तीसरे सप्ताह शाह वंश के राजमहल गोरखा दरबार की यात्रा की और अपने कुल के देवता गोरखनाथा व कुलदेवी गोरखकाली की पूजा की। यह यात्रा भी एक प्रतीकात्मक संदेश यात्रा थी। इसका संदेश था कि जिस तरह गोरखनाथ के आशीर्वाद से पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल का एकीकरण किया उसी तरह ज्ञानेन्द्र शाह नेपाल को स्थिरता और समृद्धि देने के लिए राजसंस्था की पुनर्स्थापना की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

राज संस्था की पुनर्स्थापना की मांग को हाल में कुछ समर्थन मिलने के पीछे कई कारण हैं। राजशाही की समाप्ति, नया संविधान बनने के बाद नेपाल में स्थिरता, विकास की जबर्दस्त जन आकांक्षा बनी। लोगों को उम्मीद थी नए संविधान के अनुरूप संघीय ढांचा अस्तित्व में आएगा, सभी क्षेत्रों, वर्गों और वंचितों को लोकतंत्र में हिस्सेदारी होगी। नेपाल से बड़े पैमाने पर होने वाला पलायन रूकेगा, विेदेश जाने की मजबूरी खत्म होगी और लोगों को अपने देश में रोजगार मिलेगा। शिक्षा-स्वास्थ्य सबके पहुंच में होगा। बुनियादी ढांचे का विकास होगा।

गणतंत्र की स्थापना के बाद नेपाल में बदलाव की उम्मीदों के पंख लग गए थे। नया नेपाल का नारा गूंजने लगा था। यह सबसे ज्यादा सुना जाने वाला शब्द था। कहा जाने लगा कि व्यापक बदलाव वाला नया नेपाल बनेगा लेकिन संविधान बनने में ही साढे सात वर्ष का समय लग गया।

अभी आए एक दिलचस्प आंकड़े के जरिए बताया गया है कि नेपाल का संविधान सबसे महंगा संविधान है क्योंकि इसके बनाने के लिए दो संविधान सभाओं का गठन किया गया। संविधाान सभा में 601 प्रतिनिधियों ने संविधान सभा बनाने में अपना सहयोग दिया और इस दौरान कुल मिलाकर 50 अरब रुपए खर्च हुए।

संविधान बनाने में काफी समय लगने से ही लोगों की उम्मीदें टूटने लगी थी। जब 20 सितम्बर 2015 को संविधान लागू हुआ तब तराई और मधेश के लोग असंतुष्ट होकर आंदोलन पर उतर आए। भारत ने इस आंदोलन की आड़ में नेपाल में नियंत्रित नाकाबंदी कर दी। नाकाबंदी के दौरान नेपाली नागरिकों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों से नेपाल सामना कर ही रहा था कि उसे बड़े भूकम्प की त्रासदी का सामना करना पड़ा।

इन विपरीत परिस्थितियों में नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दलों में गंभीरता, जिम्मेदारी व जवाबदेही का घोर अभाव दिखा। बड़ी उम्मीदों वाला ‘ नया नेपाल ’ शब्द आज व्यवस्था पर व्यंग्य करने वाला शब्द बन गया है।

राजशाही की समाप्ति के बाद पिछले 17 वर्षों में 14 सरकारें अस्तित्व में आ चुकी हैं। सभी सरकारें अल्पजीवी रहीं। भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता, भाई-भतीजावाद, सत्ता का केन्द्रीकरण सभी सरकारों की केन्द्रीय प्रवृत्ति रही। सिद्धांतहीन अवसरवादी गठजोड़ अब किसी को हैरत में नहीं डालता।

इन कारणों से जनता में पैदा हुई निराशा अब आक्रोश में बदल रहा है। जनता की निराशा और आक्रोश की अभिव्यक्ति बार-बार कई रूपों में होती रही है। पिछले आम चुनाव में नए बने दलों के समर्थन और बड़े राजनीतिक दलों के लोकप्रिय मतों में आयी गिरावट में इसे देखा जा सकता है। निकाय चुनाव में राजनीतिक दलों से हटकर सोशल मीडिया में लोकप्रिय चेहरों को समर्थन दिया जाना भी इसी का संकेत था लेकिन सत्ता के लिए जोड़-तोड़ में जुटे राजनीतिक दलों ने इससे कोई सबक नहीं लिया। इन्हीं परिस्थितियों को राजशाही समर्थक अपने पक्ष में जानकर सक्रिय हो उठे हैं और नेपाल के इतिहास के चक्र को पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता इसलिए भी रही कि चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कभी नेपाली कांग्रेस तो कभी नेकपा यूएमएल सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आए। पहले संविधान सभा के चुनाव के बाद प्रतिनिधि सभा में माओवादियों की संख्या भले कम होती रही लेकिन वे नेपाली तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत हमेशा बने रहे और इस ताकत के बूते वे सत्ता में भी आए। माओवादी और नेकपा यूएमल कभी एक होने की कोशिश किए तो कभी अपने भीतर से बंटे भी। इसी तरह तराई और मधेशी दलों में एकता और विभाजन का सिलसिला चलता रहा है। कही न कहीं सत्ता के लिए अवसर बनाने की होड़ में इन सभी दलों से जनता का जुड़ाव कमजोर होता गया है।

जुलाई 2024 में दो सबसे बड़ी पार्टियों, नेपाली कांग्रेस और यूएमएल ने मिलकर सरकार बना ली और केपी ओली चौथी बार प्रधानमंत्री बने।

दोनों दलों ने मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और संघवाद को मजबूत करने के लिए संवैधानिक संशोधनों की घोषणा की थी लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ हुआ नहीं है।

अब जब राजशाही ताकतें एकजुट होकर हुंकार भर रही हैं तो वाम दलों सहित नेपाली कांग्रेस को फिर से जनता की याद आई है। अपनी कमजोरी भी स्वीकारी जा रही है। साथी ही प्रतिक्रांति के डर से अपने को संगठित करने और इस दिशा में पहलकदमी भी ली जा रही है।

पोखरा से काठमांडू लौटने के बाद जब पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र विक्रम शाह का जोरदार स्वागत हुआ तो प्रचंड की अगुवाई वाली माओवादी एकता केन्द्र, माधव नेपाल की अगुवाई वाली नेपाली एकीकृत समाजवादी पार्टी और विप्लव के नेतृत्व वाली नेपाली कम्युनिष्ट  पार्टी द्वारा बनाए गए समाजवादी मोर्चा ने 28 मार्च को नेपाल में प्रदर्शन व सभा करने का ऐलान किया। यह सभा काठमांडू के भृकुटि मंडप क्षेत्र में हुई। यह सभा शांतिपूर्ण ढंग से हुई और सरकारी सूत्रों के अनुसार इसमें 35-40 हजार लोग रहे होंगे।

सभा में प्रचंड ने कहा कि हम अपनी गलतियों से सीखेंगे और जनता के पक्ष में एक और नई क्रांति की घोषणा करेंगे। उन्होंने कहा कि वह अपनी गलतियों को सुधारेंगे, आत्मचिंतन करेंगे और जनता से जुड़ेंगे। उन्होंने कहा कि वे कमजोरियों को दूर करने तथा गणतंत्र को पूर्ण करने के लिए एक नया आंदोलन शुरू करना चाहते हैं। उनकी पार्टी और मोर्चे के भीतर चर्चा के दौरान एक और क्रांति की आवश्यकता महसूस की गई है। उन्होंने टिप्पणी की कि एक और क्रांति करके सभी सामंतवाद को समाप्त करना आवश्यक है, क्योंकि पूंजीपति उग्रवादियों को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस बात की समीक्षा करना आवश्यक है कि लोगों में इतना गुस्सा क्यों है।

सीपीएन (एस) के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल ने कहा कि मौजूदा शासकों के कारण जनता परेशान है। उन्होंने कहा कि राजशाही कभी वापस नहीं आ सकती। लोग स्वतंत्र हो चुके हैं तथा किसी की गुलामी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। यदि हम याद रखें कि उन्होंने देश से कितना लूटा और चूसा, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि जो कोई भी वंशवाद का शासन लाने की कोशिश करेगा, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

दोनों नेताओं ने प्रधानमंत्री केपी ओली की आलोचना की और कहा कि उनकी सरकार का लोगों की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है। वर्तमान सरकार ने लोगों से दूरी बना ली है और वह उनकी भावनाओं को नहीं समझती।

राजावादी आंदोलन के प्रति प्रधानमंत्री केपी ओली ने भी कड़ा रूख दिखाया है। उन्होंने पूर्व नरेश और उनके समर्थकों पर कड़ा निशाना साधते हुए उनसे कहा कि अगर किसी के मन में अराजकता के रास्ते पर चलने और किसी को कुछ पाने का सपना है, तो बेहतर है कि वह ऐसा सपना न देखे। पूर्व नरेश को सभ्य और सुसंस्कृत तरीके से लोकतांत्रिक तरीकों से, संविधान और कानून के अनुसार चलना सीखना चाहिए। वे राजनीति में आना चाहते हैं तो स्वागत है। उनका उम्मीदवार बनना मजेदार होगा।

नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा ने कहा है कि देश अब एकजुट है और कोई भी अपनी इच्छा से गणतंत्र को समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने लुम्बिनी में नेपाल लेखक संघ के आठवें अधिवेशन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह संवैधानिक राजा नहीं बन सकते।

नेपाल में राजशाही , हिन्दू राष्ट्र को लेकर बहस नई नहीं है। नेपाल में धर्मनिरपेक्ष संघीय गणतंत्र की स्थापना के बाद से रह रह कर राजशाही को बहाल करने और नेपाल को हिन्दू नेपाल बनाने की मांग और बहस होती रही है। ये मांग अलग-अलग समूह व ताकतें करती रहीं हैं लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि दोनों मांगों वाले समूह व ताकतें एक साथ आ गई हैं और उन्होंने आंदोलन का रास्ता चुना हालांकि पहले ही आंदोलन में हिंसा का रास्ता चुनकर उन्होंने अपने असली इरादे जगजाहिर कर दिए। इस कारण से उनको मिल रहा समर्थन कम हुआ है लोग इस आंदोलन के पीछे निहित स्वार्थी तत्वों का हाथ देखने लगे हैं।

तिनकुने हिंसा के बाद नेपाल के नागरिकों के एक समूह ने बयान जारी कर कहा कि वे ‘ पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह समर्थित आंदोलन संविधान विरोधी, अराजकता फैलाने वाला, अवसरवादियों को बढ़ावा देने वाला और भारत में कुछ संकीर्ण धार्मिक समुदायों के समर्थन और विश्वास से चलाया जाने वाला मानते हैं। ’

राजशाही समर्थक ताकतें अपने समर्थन में झूठा प्रचार गढ़ रही हैं कि नेपाल में गणतंत्र की स्थापना के बाद से कोई उपलब्धि नहीं है और नेपाल में कोई बदलाव नहीं है। यह भी दुष्प्रचार किया जा रहा है कि राजशाही ही देश को स्थिरता और समृद्धि दे सकती है। यह दावा कितना झूठ है, नेपाल का इतिहास जानने वाले जानते हैं। पिछले 75 वर्ष से राजशाही के खिलाफ बार-बार विद्रोह औेर व्यापक जन आंदोलन होते रहे हैं। निरंकुशता, अन्याय, दमन, भ्रष्टाचार, लूट, कठोर नियंत्रण, व्यक्ति पूजा, भेदभाव राजशाही की निशानियां थी जिसके खिलाफ लाखों लोगों ने सड़क पर उतर कर हमेशा के लिए राजशाही को इतिहास बना दिया।

नेपाल में गणतंत्र की स्थापना के बाद तमाम दुश्वारियों के बाद भी नेपाल समावेशी संरचना की तरफ बढ़ रहा है। कई क्षेत्रों में उसने अच्छी उपलब्धियां प्राप्त की हैं। दूर दराज वाले इलाकों में सड़क परिवहन की सुविधा बढ़ी है। स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ी हैं। बिजली उत्पादन बढा है। महिला शिक्षा बढ़ी है। बाल एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। सबसे अच्छी उपलब्धि स्थानीय निकायों का प्रभावी बनना है। स्थानीय निकायों के जरिए सरकारी सेवाओं का विस्तार हुआ है। बुनियादी शिक्षा, कृषि बाजार के आधुनिकीकरण में प्रगति हुई है। संसद से लेकर स्थानीय निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। सामाजिक-आर्थिक संकेतक मजबूत हुए हैं। नेपाल में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है लेकिन सबसे बड़ी विफलता रोजगार के क्षेत्र में है। रोजगार के लिए विदेश जाने को मजबूर लोगों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है।

संविधान की भावना के अनुरूप प्रांतीय ढांचा मजबूत नहीं हो पाया है। नेपाल के कानूनों का क्रियान्वयन संघीय ढांचे के अनुरूप नहीं है। प्रमुख राजनीतिक दलों की संघीय ढांचे को मजबूत करने के प्रति कोई इच्छा शक्ति भी नहीं दिख रही है बल्कि वे केन्द्रीयता को महत्व दे रहे हैं। इस कारण से संघवाद को ही निशाना बनाया जाने लगा है। राजशाही समर्थक संघवाद को देश की एकता के लिए कमजोरी बताने लगे हैं। राजभक्त संघवाद और हिन्दू राष्ट्र के मुद्दे का भावनात्मक उपयोग कर रहे हैं।

नेपाल में नए संविधान में धर्मनिरपेक्षता की घोषणा के बाद से कतिपय हिंदूवादी संगठन सक्रिय हैं। सांप्रदायिक तनावों से दूर रहने वाला नेपाल इन दिनों कई बार साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा की चपेट में आया है। वीरंगज में अप्रैल के दूसरे सप्ताह में हनुमान जयंती के अवसर पर हिंसा हुई। पिछले वर्ष रामनवमी पर हिंसा हुई थी।

नेपाल की कांग्रेस पार्टी में कई नेता राजशाही के खिलाफ हैं लेकिन हिंदू राष्ट्र को लेकर उनका नरम दृष्टिकोण है। इस बारे में जब-तब उनके बयान भी आते रहते हैं।

देश में संविधान में संशोधन को लेकर छिड़ी बहस से भी राजावादियों को ताकत मिली है। पिछले एक वर्ष से अधिक समय से राजनीतिक स्थिरता के लिए संविधान में संशोधन की मांग ने जोर पकड़ा है। नेपाली कांग्रेस द्वारा इसे जोर-शोर से उठाने और पिछले वर्ष सत्ता परिवर्तन के बाद केपी ओली के नेतृत्व में बनी नेकपा यूएमएल और कांग्रेस सरकार द्वारा इसकी बात किए जाने के बाद से राजावादियों को लगा कि वे इस मौके का उपयोग राजशाही और हिन्दू राष्ट्र की बहाली के लिए कर सकते हैं। नेपाली कांग्रेस सहित कई दलों को लगता है कि चुनाव प्रणाली में संशोधन करने से और समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को बदल देने से राजनीतिक अस्थिरता पर रोक लग सकती है। दूसरी तरफ नेपाल में आदिवासी व वंचित समूह समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को हटाने या बदलने के बजाय इसे और प्रभावी तौर पर लागू करने के पक्षधर हैं। तराई और मधेसी दल संघवाद के खिलाफ राजा वादियों के विचार और प्रमुख दलों की प्रांतीय ढांचों को मजबूत करने के प्रति उदासीनता को लेकर संशकित हैं। इसी के मद्देनजर इसी महीने तराई और मधेस क्षेत्र के सात दलों-जनता समाजवादी पार्टी, डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी, जनमत पार्टी, सिविल लिबर्टीज, जनता प्रगतिशील पार्टी, तराई मधेश डेमोक्रेटिक पार्टी ने मिलकर संघीय डेमोक्रेटिक फ्रंट का गठन किया है।

इस तरह से राजावादी आंदोलन, संविधान संशोधन के सवाल, प्रांतीय ढांचा व उसके अनुरूप व्यवस्था, अगले आम चुनाव को लेकर नए सिरे से राजनीतिक दलों, समूहों का मोर्चा बनने लगा है। यह तो साफ तौर पर दिख रहा है कि राजशाही को लेकर व्यापक समर्थन नहीं है लेकिन यह भी सच है कि बढ़ते जन असंतोष का राजावादी ताकतें फायदा उठाने की गंभीर कोशिश कर रही हैं। यदि अब भी संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और गणतंत्र की समर्थक ताकतें संगठित होकर जनता की आकांक्षाओं को सम्बोधित नहीं करती हैं तो राजावादी और भी मजबूत होंगे।

(यह लेख समकालीन जनमत पत्रिका के मई 2025 अंक में प्रकाशित हुआ है)

Related posts