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बुद्ध ने साधारण व्यक्ति की साधारणता को प्रतिष्ठित किया -प्रो शुभा राव

रामकोला (कुशीनगर)। रामकोला स्थित शिवदुलारी देवी दलडपट शाही महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय बौद्व संस्थान, साखी पत्रिका और एसडीडीएस वीमेंस कालेज के संयुक्त तत्वावधान में आज से 24 जून तक चलने वाली कार्यशाला ‘ हमारे लिए बुद्ध ‘ प्रारंभ हुई।

कार्यशाला में उद्घाटन वक्तव्य देते हुए बीएचयू के राजनीति विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो शुभा राव ने कहा कि वह करुणा ही है जिसके चलते बुद्ध बिना मनुष्य को प्रताड़ित किये या हीन भावना से ग्रस्त किये उसे अपनेपन से दुःख मुक्ति का मार्ग बता पाते हैं। बुद्ध के साथ हमारे इस रिश्ते की शुरुआत उनकी करुणा में नहीं, हमारे दुःख में है। बुद्ध को जानना अपने दुःखों को जानना है। लेकिन मात्र अपने दुःखों को जानना बुद्ध को पूरे तौर पर जानना नहीं है। बुद्ध मनुष्य के दुःख से प्रारम्भ अवश्य बरते हैं पर उसी में उलझे नहीं रहते हैं। वे दुःख के उस पैराडाइम को ही अतिक्रान्त कर उपचार करते हैं। बुद्ध में असल पैराडाइम परम सुख या निर्वाण है।

उन्होंने कहा कि बुद्ध के उपदेश दुःखी मन को सहलाने वाले प्रेम के संस्पर्श की तरह लगते हैं। उनसे सम्प्रेषित होने वाली यह आत्मीयता की ऊष्मा, अनौपचारिक हलकापन शांतिमयता पूरे बुद्ध वचन में एक मनोहारी ताज़गी और दिल में उतर जाने की ताकत पैदा करती है। बुद्ध विचार की जो सबसे बड़ी विशेषता यह है वे एक साधारण व्यक्ति की साधारणता को अपने प्रस्थान बिन्दु के रूप में ग्रहण करते हैं और अपने उपदेशों के नायक के रूप में केन्द्र में प्रतिष्ठित करते हैं।

मुख्य वक्तव्य देते हुए युवा इतिहासकार शुभनीत कौशिक ने कहा कि बुद्ध का मार्ग तथ्यता और सत्यता का मार्ग है। बुद्ध ने कहा कि मैं जो मार्ग बता रहा हूँ उस पर चलकर निर्वाण मिलेगा लेकिन उसके पहले कष्ट भी उठाना पड़ेगा। बुद्ध ने विचार को केवल सुनने और चिंतन करने पर ही नहीं उसे अपने जीवन में उतारने और उस पर चलने पर भी ज़ोर दिया।

श्री कौशिक ने 19वीं सदी में बुद्ध पर हुए अध्ययनों, पालि ग्रंथों के अनुवाद और प्रकाशन पर विस्तार से जानकारी देते हुए धर्मानंद कोसंबी द्वारा इस दिशा में किए गए श्रम साध्य कार्यों का विशेष रूप से उल्लेख किया।

वरिष्ठ कवि प्रकाश उदय ने ‘ बुद्ध की धरती पर कविता ‘, ‘ चरथ भिक्खवे यात्रा ‘ और अब कार्यशाला के आयोजन को बुद्ध के विचारों को समाज में के जाने का गंभीर प्रयास बताया।

युवा शोधविज्ञानी सुजीत कुमार सिंह ने नवजागरण के दौर में महात्मा बुद्ध पर लिखी रचनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में प्रकाशित पत्रिकाओं में बुद्ध पर लेख और कवितायें बहुतायत में मिलती हैं। इस विषय पर काम होना चाहिए। कोलकाता से प्रकाशित होने वाले “ विशाल भारत “ पत्रिका में सितम्बर और अक्टूबर  1945 में भदंत शांति भिक्षु शास्त्री के लेख की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बुद्ध ने धार्मिक कर्मकांड के बजाय ज्ञान पर जोर दिया।

अध्यक्षता कर रहे पालि भाषा के विद्वान प्रो राम सुधार सिंह ने धम्म पदों और जातक कथाओं के माध्यम से बुद्ध के जीवन और उनके देशना की मार्मिक व्याख्या की। उन्होंने कहा कि बुद्ध ने एक समाज विज्ञानी के रूप में समाज में समता के विचार को प्रतिस्थापित किया। उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मन को दूषित होने से बचाने का उपचार बताया।

कार्यशाला के प्रारंभ में साखी पत्रिका के संपादक और प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो सदानंद शाही ने कहा कि बुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के लिए हिमालय जाने के बजाय आम जन और प्रकृति के पास गए। अपनी ज्ञान को पूरे जीवन भर लोगो के बीच भ्रमण करते हुए प्रसारित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य सद्गुणों से मनुष्य बनता है। बुद्ध ने शत्रुता के बजाय मैत्री पर जोर दिया और कहा कि वैर से वैर खत्म नहीं होगा। मैत्री से ही वैर खत्म होगा।

कार्यशाला की संयोजक महाविद्यालय की प्राचार्य मनीषा सिंह ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य बुद्ध के विचारों को समझना और दैनंदिन जीवन में उनके विचारों को आत्मसात करना है।

धन्यवाद ज्ञापन महाविद्यालय के प्रबन्धक राधे गोविंद शाही ने किया।

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