कवियों ने रोहिणी नदी के तट पर कविता पाठ कर युद्ध का विरोध किया
महराजगंज। सेंट जोसेफ कालेज महराजगंज में 19 जून को दोपहर 2.30 बजे से अंतर्राष्ट्रीय बौद्व संस्थान, साखी पत्रिका और लोकायत प्रकाशन की ओर ‘ दैनंदिन जीवन में बुद्ध ’ विषयक कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला के वक्ता और प्रतिभागी कार्यशाला के पहले चौक के पास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा रामग्राम की खोज के लिए किए जा रहे उत्खनन स्थान को देखा । इसके बाद केवलापुर खुर्द गांव के पास रोहिणी नदी के तट पहुंचे और वहां कविता पाठ किया।
रोहिणी नदी के तट पर कविता पाठ के आयोजन के ऐतिहासिक सन्दर्भ के बारे में बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने रोहिणी नदी के पानी को लेकर कपिलवस्तु के शाक्यों और रामग्राम के कोलियों के बीच युद्ध को रोकने का प्रयास किया और वे इसमें सफल रहे। उनकी प्रवज्या का कारण युद्ध और हिंसा का विरोध था। आज जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है तो हम कवि, साहित्यकार, कलाकार उसी रोहिणी नदी के तट पर एकत्र होकर कविता पाठ के जरिए युद्ध का विरोध करते हुए आह्वान करते हैं कि सभी देशों की जनता युद्ध के खिलाफ उसी तरह अपनी आवाज बुलंद करे जैसा कि शाक्यों की सभा में बुद्ध ने किया था।
रोहिणी नदी के तट पर भोजपुरी के जाने माने कवि प्रकाश उदय, प्रो सदानंद शाही, रामसुधार सिंह, सुनीता अबाबील, अंशु प्रिया, चतुरानन ओझा, इन्द्र कुमार यादव, निरंजन, हिमांशु ने अपनी कविताएं पढ़ीं। इतिहासकार शुभनीत कौशिक ने इस मौके पर नदियों से लेखकों-कवियों की आत्मीयता का जिक्र करते हुए कहा कि आज एक बार फिर से नदियों के पास आने की जरूरत है।

कार्यशाला में साखी के संपादक और प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो सदानंद शाही ने ‘ बुद्ध की धरती पर कविता ‘ के आयोजन और पिछले वर्ष ‘ सारनाथ से सारनाथ तक ‘ दस दिवसीय ‘ चरथ भिक्खवे ‘ यात्रा के उद्देश्य की चर्चा करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म का प्रभाव आज भारत में कम दिखता है लेकिन बुद्ध के विचार सामान्य जनता के दैनंदिन जीवन को आलोडित करते हैं। बुद्ध की शांति, अहिंसा, करूणा व मैत्री के विचारों की अहमियत आज बढ़ती जा रही है। बुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के लिए जनता के बीच जाते हैं और उनसे संवाद के लिए निरन्तर भ्रमण करते हैं। आज की दुनिया युद्ध, ईर्ष्या , द्वेष और वैमनस्य के ऐसे जंजाल में फंसी है जहाँ से निकलने का रास्ता बुद्ध से होकर जाता है। बुद्ध की शिक्षाएँ – करुणा, प्रेम, मैत्री, संवाद, मध्यमार्ग, पंचशील, अष्टांगमार्ग आदि हमारे सामान्य जीवन के लिए बहुत जरूरी है। धरती को सुंदर बनाने की कुंजी बुद्ध के विचारों में है।
उन्होंने चरथ भिक्खवे के अगले चरण की यात्रा रोहिणी नदी के उद्गम स्थल से लेकर गोरखपुर में राप्ती नदी में मिलन स्थल तक करने की घोषणा की और कहा कि यह यात्रा पांच अक्टूबर से शुरू होगी।

कार्यशाला में अपने विचार रखते हुए डाॅ रामनरेश राम ने कहा कि बुद्ध की उपस्थिति हमारे सोचने और चिंतन में बनी हुई है। आजादी के आंदोलन के दौरान राहुल सांकृत्यायन बौद्धिक रूप से अपनी रचनाओं के माध्यम से बुद्ध को हमारे सामने एक बार फिर उपस्थित करते हैं तो डाॅ अम्बेडकर व्यवहार के स्तर बुद्ध के विचारों को अपनाने के लिए व्यापक अपील बनाते हैं। आज देश की बहुजन आबादी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और चिंतन प्रणाली के इतिहास की खोज की प्रक्रिया में बुद्ध तक पहुंच रही है।
पालि भाषा वि़द्वान प्रो रामसुधार सिंह ने धम्मपद और जातक कथाओं के माध्यम से कहा कि बुद्ध हमें अप्रमाद से मुक्त रहने की शिक्षा देते हैं। ज्ञान और तर्क के महत्व को रेखांकित करते हैं। आज जब अज्ञान का महिमामंडन हो रहा है और उसे प्रतिष्ठित करने का प्रयास हो रहा है तो हमें बुद्ध और ज्यादा याद आते हैं।
इतिहासकार शुभनीत कौशिक ने बुद्धकालीन भूगोल, पुरातत्व और समाजिक इतिहास के अध्ययन की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि सामाजिक इतिहास के लिए जातक कथाएं महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उन्होंने धम्मपदों में सामान्य व श्रमशील जनता के दैनिक कार्यों, मवेशियों, उत्पादन के साथनों के सूक्ष्म वर्णन के जरिए बुद्ध की देशना को सम्बोधित करने का रोचक विवरण दिया। उन्होंने कहा कि बुद्ध का मार्ग रोजमर्रा के समस्याओं का अनुसंधान का मार्ग है।
कार्यशाला की अध्यक्षता गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो अनिल कुमार राय ने छह वर्षों से बुद्ध केन्द्रित आयोजनों को एक सांस्कृतिक यात्रा बताया और कहा कि इन आयोजनों ने बुद्ध को फिर से जानने की नई ललक पैदा की है। उन्होंने कहा कि आज भौतिक सुख-सुविधाओं के विस्तार ने आत्मा के स्तर पर दुनिया को दरिद्र बना दिया है। दुनिया अन्तःकरण शून्य होती जा रही है। ऐसे समय में अपने समय के संकटों को पहचानने और उनसे संघर्ष करने में बुद्ध हमें रास्ता दिखाते हैं। उन्होंने बुद्ध और उनके विचारों पर नए सिरे से हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि ये हमले इसलिए हैं क्योंकि बुद्ध हर तरह के भेदभाव और वर्चस्व का विरोध करते हैं। इसलिए वर्चस्वशाली समूह बुद्ध को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं।

धन्यवाद ज्ञापन संतोष श्रीवास्तव ने किया जबकि स्वागत उद्बोधन पत्रकार मनोज सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री अंशुप्रिया ने किया। कार्यक्रम में लेखक डॉ पृथ्वीराज सिंह और कवयित्री सुनीता अबाबील को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ चिकित्सक ठाकुर भरत लाल, नाटककार आनंद पांडेय, श्रीनिकेत शाही, संतोष शर्मा, सुनीता अबाबील सुरेन्द्र सिंह एडवोकेट, सामाजिक कार्यकर्ता विजय प्रताप, मत्स्य विज्ञानी संजय श्रीवास्तव, डाॅ चतुरानन ओझा, इन्द्र कुमार यादव, शिवेन्द्र, हिमांशु सहित दर्जनों लोग उपस्थित थे।
