डाॅ0 दरखशाँ ताजवर
गुज़श्ता ख़ाक-नशीनों की यादगार हूँ मैं
मिटा हुआ सा निशान-ए-सरे मज़ार हूँ मैं
(अमीर मीनाई)
गोरखपुर में बाईपास से सटे, सौदागर मोहल्ले के पीछे, राप्ती नदी के तट पर, लालडिग्गी सब स्टेशन के समीप, एक टूटी-फूटी चहारदीवारी वाली कई सौ साल पुरानी इमारत है जो बसन्तपुर क़िले के नाम से मशहूर है। इसके अन्दर एक ऐतिहासिक इमारत है, जिसे मोती जेल के नाम से जाना जाता है। इस परिसर में एक कुआँ, विशालकाय पाकड़ का पेड़, फाँसी घर और कुछ बैरेकें गवाह हैं, उन रणवाँकुरों के शौर्य, बहादुरी और पराक्रम की जिन्होंने 1857 के जन विद्रोह में अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
यह जेल जो पुरानी जेल के नाम से मशहूर है, राजा बसन्त सिंह के क़िले के अन्दर थी, जिसमें आम बन्दी रखे जाते थे। इस क़िले का निर्माण राजा बसन्त सिंह ने 1456 ई. में करवाया था। 2
इसके एतिहासिक महत्व एवं निर्माण के विषय में डा0 कृष्ण कुमार पाण्डेय लिखते हैंः- ‘‘ गोरखपुर की विरासत का जीवन्त स्वरूप यह एतिहासिक इमारत जिसके दरो दीवार में क़ैद है बीते दिनों की कुछ धुँधली संस्कृति, जिसने स्वयं अपना इतिहास लिखा है। गोरखपुर महानगर के दक्षिण-पश्चिम में बसन्तपुर नामक प्राचीन मुहल्ला है, जिसे सतासी वंश के सातवें राजा बसंत सिंह (1417-1458) ने क़िला बना कर उसके साथ ही बसाया था। इतिहासकार मोन्ट गोमेरी मार्टिन के अनुसार इसका उल्लेख अबुल फ़ज़ल द्वारा अपनी पुस्तक में किया गया है, जो बादशाह अकबर के समकालीन थे। ’’ 3
1688 ई0 में जब गोरखपुर के चकलेदार काज़ी ख़लीलुर्रहमान बने तो यह क़िला, उनके क़ब्ज़े में आ गया। उन्होंने इस क़िले की मरम्मत कराकर, यहाँ फ़ौजी चौकी बनवा दी। 4
1801 में अवध के नवाब सआदत अली ख़ाँ ने गोरखपुर क्षेत्रा को अंग्रेज़ों को हस्तान्तरित कर दिया। 5
14 नवम्बर 1801 को यहाँ प्रथम कलक्टर और जज की नियुक्ति के बाद अंग्रेज़ों ने इस बन्दीगृह को मोती जेल के रूप में परिवर्तित करके यहाँ क़ैदियों के लिए कमरे बनवाए और प्रत्येक कमरे को चार ख़ानों में बाँट कर चार क़ैदियों को रखने की व्यवस्था की।6
समय के साथ विभिन्न काल में मेरा इतिहास और मेरा स्वरूप बदलता गया। वर्तमान समय में जेल परिसर में चार बन्दीगृह भवन शेष है, जिसके प्रत्येक भवन में 15 से 18 कमरे बचे हैं। 7
मोती जेल के इतिहास का सबसे गौरवशाली पन्ना 1857 में जुड़ा, जब अंग्रेज़ों के विरूद्ध पकता हुआ नफ़रत का लावा ज्वालामुखी बन कर प्रथम स्वतन्त्राता संग्राम के रूप में फूटा। देश के हर भाग में भारतवासियों ने बहादुरी और वीरता का ऐसा अभूतपूर्व प्रदर्शन किया कि अंग्रेज़ भी दंग रह गये। गोरखपुर में भी क्रूर और निरंकुश शासन के विरूद्ध नफ़रत का लावा पक रहा था और उन्हें फूटने का अवसर मिल भी गया। उनको एक वीर नायक मोहम्मद हसन के रूप में मिल गया, जिसके नेतृत्व में गोरखपुर वासियों ने अंग्रेज़ी शासन की नीव तक हिला दी। मोहम्मद हसन और क्रान्तिकारियों ने अभूतपूर्व वीरता का प्रदर्शन किया, जिसके फलस्वरूप कई महीनों (22 अगस्त 1857-5 जनवरी 1858) तक गोरखपुर अंग्रेज़ों के प्रभुत्व से आज़ाद हो गया।8
1857 में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व यहाँ के पूर्व नाज़िम मोहम्मद हसन ने किया। मोहम्मद हसन पहले अवध के नवाब के नाज़िम थे। अवध के विलय के बाद अंग्रेज़ों ने उनका पद समाप्त कर दिया था, इस कारण उनके हृदय में अंग्रेज़ों के विरूद्ध नफ़रत की भावना पनप रही थी। उन्होंने गोरखपुर को अंग्रेज़ों के प्रभुत्व से मुक्त कराने की योजना बनाई। उनके विद्रोही तेवर को और अधिक बल डुमरी के नरेश बाबू बन्धु सिंह और नरहरपुर के राजा हरप्रसाद और रूद्रपुर के राजा के सहयोग से मिला। मोहम्मद हसन ने जब गोरखपुर की ओर प्रस्थान किया, उस वक़्त गोरखपुर का कलक्टर पैटर्सन आजमगढ़ में था।9
विद्रोह की सूचना मिलने पर पैटर्सन ने गोरखपुर की ओर प्रस्थान किया, लेकिन जगदीशपुर के कुँवर सिंह और उनके सत्तर वर्षीय भाई अमर सिंह ने सरयू तट (बड़हलगंज) में उनका रास्ता रोक दिया। अतः सरयू के उत्तरी इलाक़े पर मुहम्मद हसन का क़ब्ज़ा हो गया।10
इसके बाद मोहम्मद हसन जब गोरखपुर की ओर बढ़े, तब भी उन्हें भरपूर सहयोग मिला। अंग्रेज़ों ने यहाँ के रजवाड़ों बाँसी, सतासी, गोपालपुर, मझौली, तमकुही को यह निर्देश दिया कि वह गोरखपुर के आन्दोलनकारियों पर नज़र रखें और मोहम्मद हसन को गोरखपुर में प्रवेश न करने दें, लेकिन किसी ने भी मोहम्मद हसन को रोकने की कोई कोशिश नहीं की।11

वरन् अदम्य उत्साह के साथ गोरखपुरवासियों ने उनका और उनके साथ आने वाले क्रान्तिकारियों का स्वागत किया। इस अवसर पर हिन्दुओं और मुसलमानों ने एकजुट होकर उनके नेतृत्व को स्वीकार किया और सम्प्रदायिक एकता का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया।12
उन्हें जब यह सूचना मिली कि मोहम्मद हसन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व करने के उद्देश्य से अपने साथ बड़ी संख्या में क्रान्तिकारियों के साथ गोरखपुर में प्रवेश करने वाले हैं तो मोहम्मद हसन की अगुवाई के लिए अपने साथियों के साथ आग़ा मोहम्मद इब्राहिम जो मोती जेल के जेलर थे, स्वयं राप्ती तट पर गये और उन्होंने मोहम्मद हसन और उनके साथ आने वाले क्रान्तिकारियों का स्वागत किया। मुशर्रफ़, पंडित, सरदार अली, अली हसन, नौनीध राय, मिर्ज़ा फ़़तह अली, मोहम्मद सईद, आबिद हुसैन, उल्फ़त अली, अमीर अली, गुमा ख़ान, इम्दाद अली, आबिद अली, मज़हर अली, वाहिद अली, अहमद ख़ाँ, कल्लू बेग, बृजमोहन, अनूप, शुकरूल्लाह, मंसूर अली, मख़दूम बख़्श, फ़ैज़ बख़्श के उनके साथ जाने की पुष्टि कश्फुल बग़ावत से होती है, 13 जो 1857 में गोरखपुर के इतिहास का एक समसामयिक स्रोत है, जिसे सैयद अहमद अली शाह ने लिखा था।14
इसी इसी पुस्तक से इस बात की भी पुष्टि होती है कि मुहम्मद हसन के गोरखपुर पहुँचने से पूर्व ही मुशर्रफ़ अली, मदार बख़्श और उनके कुछ साथियों ने ख़ज़ाने, तोपों और रसद की व्यवस्था कर दी थी।15
इस बीच मोती जेल के जेलर आग़ा मुहम्मद इब्राहीम ने क़ैदियों को भी रिहा कर दिया कि वह भी देश पर आई इस विपत्ति की घड़ी में अंग्रेज़ों के विरूद्ध लामबंद हों।16
जेल से छूटने वाले क़ैदियों ने मोहम्मद हसन को भरपूर सहयोग देने का वचन दिया।17 मोहम्मद हसन का साथ देने के लिए बड़ी संख्या में क्रान्तिकारी अवध से भी गोरखपुर आये।18 गोरखपुर पर क़ब्ज़ा प्राप्त करने के लिए क्रान्तिकारियों को अंग्रेज़ों से भीषण संघर्ष करना पड़ा था। अंग्रेज़ों से उनकी एक बड़ी लड़ाई मोती जेल के समीप लालडिग्गी के पास बाँध पर भी हुई।19 अन्ततः जीत मोहम्मद हसन और क्रान्तिकारियों को हुई और गोरखपुर से अंग्रेज़ों का शासन पूर्णतयः समाप्त हो गया।
क्रान्तिकारियों ने बर्ड की कोठी फूँक दी। इसके अतिरक्ति उन्होंने किसी भी सरकारी सम्पत्ति को कोई भी नुकसान नहीं पहुँचाया।20
मोहम्मद हसन ने बर्ड के सर पाँच हज़ार का ईनाम घोषित कर दिया, लेकिन बर्ड छुपते-छुपाते किसी प्रकार से गोरखपुर से फरार हो गया।21 मोहम्मद हसन की ताजपोशी की रस्म ऐतिहासिक मोती जेल में ही हुई।22 मोहम्मद हसन ने नाज़िम का पद स्वयं संभाला और अपना नायब नाज़िम मुशर्रफ़ ख़ाँ को बनाया।23 मोहम्मद हसन की हुकूमत को अवध की हुकूमत से भी मंजूरी मिल गयी। साथ ही उनको मुक़र्रिबुद्दौला का ख़िताब (सम्मान) और ख़िलअ़त (पोशाक) देकर सम्मानित भी किया गया।24
मोहम्मद हसन ने गोरखपुर से अंग्रेज़ी शासन को समाप्त करने के बाद बाबू बन्धू सिंह के नेतृत्व में सरकारी ख़ज़ाने और शास्त्रागार पर कब्ज़ा कर लिया, और अपनी सरकार बनाई एवं अपने पहले ही आदेश में अंग्रेज़ों के बनाये सभी क़ानून रद्द कर दिये। मोहम्मद हसन ने राजस्व की वसूली की, कचहरी बनाई और शासन का कार्यभार संभालने के बाद स्वयं की फ़ौज़ का गठन किया।25 उन्होंने सवारों का मालिक सरदार अली को बनाया।

कशफुल बग़ावत के लेखक के अनुसार बहुत बड़ी संख्या में लोग उनकी फ़ौज में भर्ती हुए जिनमें से कुछ के नाम भी उन्होंने अपनी इस पुस्तक में लिखे जिनमें विशेषकर नवाबन, गौहर, शमशेर अली, एहसान अली, ख़ुर्शीद अली, वज़ीरन, कल्लू बेग, हसन खाँ, रामफल, ग़यासुद्दीन ख़ाँ और उनका पुत्र दिलदार ख़ाँ, वलीदाद ख़ाँ, छिंगे ख़ाँ, नारायण और आबिद अली का नाम लिया जा सकता है. 26
एक समकालीन इतिहासकार मुईनुद्दीन हसन ख़ाँ ने अपनी पुस्तक ‘ ख़दंगेे ग़दर ‘ में लिखा है कि मोहम्मद हसन ने लगभग 25 हज़ार लोगों को अपनी फ़ौज में भर्ती किया था।27 मोहम्मद हसन ने गोरखपुर वासियों में अंग्रेज़ विरोधी भावना प्रबल करने के लिए हर सम्भव प्रयास किये। उन्होंने गोरखपुर के नागरिकों को आदेश दिया कि वह अपने घरों से विदेशी सामानों को निकाल कर उनकी होली जलाएँ। उनके आदेश का पालन करके गोरखपुर में विदेशी सामानों के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया गया28 और इस प्रकार गोरखपुर को सर्वप्रथम स्वदेशी आन्दोलन को प्रारम्भ करने का गौरव प्राप्त हुआ, जबकि आम धारणा यही है कि स्वतन्त्राता आन्दोलन में स्वदेशी आन्दोलन 1906 में बंग-भंग आन्दोलन के समय में शुरू हुआ था।
मोहम्मद हसन ने लगभग छह महीने ( 22 अगस्त 1957 से 5 जनवरी 1958) तक गोरखपुर पर शासन किया, लेकिन जनवरी में गोरखपुर उनके हाथों से निकल गया। यद्यपि गोरखपुर पर पुनः क़ब्ज़ा प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ों को कई स्थानों पर भीषण संघर्ष का सामना करना पड़ा। 26 दिसम्बर 1857 को कर्नल रोक्राफ्ट और मोहम्मद हसन की सेना के बीच एक बड़ी लड़ाई गोरखपुर के निकट सोहनपुर में हुई। इस लड़ाई में मोहम्मद हसन का भरोसेमन्द नायब नाज़िम मुशर्रफ़ अली और अली करीम अपने कई सौ साथियों के साथ शामिल हुआ।29 बराबर का मुक़ाबला हुआ, लेकिन पलड़ा अंग्रेज़ों का ही भारी रहा।
मोहम्मद हसन से निपटने के लिए 6 जनवरी 1858 को नेपाल के राणा जंग बहादुर की गोरखा फ़ौज पिपराइच पहुँच गई। साथ ही अंग्रेज़ों की ताक़त पंजाब के सिख राजाओं की अत्याधुनिक हथियारों से लैस फ़ौजों के पहुँच जाने से अत्यधिक बढ़ गई। 11 जनवरी 1858 को क्रान्तिकारियों ने अंग्रेज़ों से भीषण युद्ध किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में देशभक्त वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन वह विजय प्राप्त करने में असफल रहे। मोहम्मद हसन अपने साथियों के साथ टाँडा की ओर निकल गये।30 मुहम्मद हसन के टाँडा की ओर निकलने का एक कारण यह भी रहा कि वह गोरखपुर पर हमला करने से पूर्व टाँडा ही गये थे और वहीं रह कर पैसों की व्यवस्था की थी।31 उस अवधि में उन्होंने क्रान्तिकारियों के गुस्से से कुछ अंग्रेज़ों की जान की रक्षा भी की थी। यह ख़बर अंग्रेज़ों को मिली थी तो उन्होंने पाँच हज़ार ईनाम के रूप में मोहम्मद हसन को भेजे भी थे, जिसे लेने से उन्होंने साफ़ मना कर दिया था।
गोरखपुर के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट बर्ड ने तो उन्हें क्रान्तिकारियों का दमन करने के लिए गोरखपुर आने के लिए आमंत्रित भी किया था, लेकिन क्योंकि मोहम्मद हसन अंग्रेज़ों के विरूद्ध एक निर्णायक लड़ााई लड़ने का मन बना चुके थे, इसलिए उन्होंने मना कर दिया था। बर्ड को मोहम्मद हसन के तेवर का अंदाज़ा हो चुका था।32
मोहम्मद हसन की गतिविधियों ने बाद में यह सिद्ध भी कर दिया। उन्होंने गोरखपुर में अंग्रेज़ों को नाकों चने चबवा भी दिये थे।

गोरखपुर पर क़ब्ज़े के बाद मोहम्मद हसन फ़रार हो गये। अंग्रेज़ों ने मोहम्मद हसन को गिरफ़्तार करने वालों के लिए ईनाम की भी घोषणा कर दी,33 लेकिन वह उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सके।34 गोरखपुर से फ़रार होने के बाद भी उन्होंने अंग्रेज़ों से लड़ाई जारी रखी। उनकी कुछ लड़ाईयाँ अंग्रेज़ों से बस्ती और फ़ैज़ाबाद में भी हुईं।35 उन्होंने नाना साहब के भाई बालाराव के साथ तुलसीपुर में भी अंग्रेज़ों से मोर्चा लिया, लेकिन अंग्रेज़ों ने अपनी पूरी ताक़त झोंक कर क्रान्तिकारियों को तितर-बितर कर दिया। उसके बाद क्रान्तिकारियों की हालत अत्यन्त दयनीय हो गई, उनके पास न तो लड़ने के लिए हथियार बचे और न ही खाने-पीने का सामान ख़रीदने के लिए पेसे ही बचे। नाना साहब और बालाराव ने नेपाल में शरण ले ली।36 मोहम्मद हसन को जब लगा कि वह क्रूर और निर्दयी शासकों के विरूद्ध लड़ाई जारी नहीं रख सकते तो उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने हथियार डाल दिये। अंग्रेज़ों ने उन्हें सीतापुर की सीमा के अन्दर रहने के कड़े निर्देश दे दिये और 200 रूपये गुज़ारा भत्ता देने का उन्हें आश्वासन भी दिया।37 उनको फाँसी सिर्फ़ इस लिए नहीं दी गई कि उन्होंने विद्रोह से पूर्व कुछ अंग्रेज़ों की जान बचाई थी।
इधर गोरखपुर में क्रान्तिकारियों की धर-पकड़ शुरू हुई। शक की बुनियाद पर लोगों को फाँसी देने और प्रताड़ना देने का एक लम्बा सिलसिला शुरू हुआ। अंग्रेज़ों ने क्रूरता की सभी सीमाएं लाँघ लीं । जगह-जगह लोगों को फाँसी दी गयी। अलीनगर, घंटाघर और मोती जेल में बड़ी संख्या में लोगों को फाँसियां दी गईं।38 तीन सौ से अधिक फाँसियाँ मोती जेल के उस विशालकाय पेड़ पर दी गई, जिसका अस्तित्व कई सौ वर्ष बीत जाने के बाद आज भी मौजूद है।39 अंग्रेज़ों ने जिन लोगों को सज़ाएँ दीं ओर मौत के घाट उतारा उनमें कुछ के नाम सैयद अहमद अली शाह ने अपनी किताब में लिखे हैं। अंग्रेज़ों ने मोहम्मद हसन के नायब मुशर्रफ़ ख़ाँ को जिन्होंने गोरखपुर में 1857 में सक्रिय योगदान दिया, को अलीनगर में फाँसी दी। रसूल अली, औलाद अली, नौनींध राय, वाहिद अली को फाँसी दिये जाने की पुष्टि कशफ़ुल बग़ावत से होती है। बसन्त नाथ, तुमन के सिपाही लाल ख़ाँ, शेख़ फ़ैज़्ाू, वलीदाद ख़ाँ, करीमदाद ख़ाँ, इनायत अली, हैदर हुसैन को फाँसी दिये जाने की जानकारी भी हमें कशफ़ुल बग़ावत से मिलती है। इसके अतिरिक्त यह भी पता चलता है कि एक विद्रोही ख़ैरात अली को अंग्रेज़ों ने बग़ावत के जुर्म में दस साल की क़ैद की सज़ा दी थी।40
अंग्रेज़ों ने फाँसी देने के बाद लाशों को मोती जेल के कुएँ में भरना शुरू किया।41 कुछ को तो कुएँ पर लगी उस लोहे की कील में भी लटकाया गया जो उस जर्जर कुएँ पर आज भी देखी जा सकती है। मोती जेल का कुआँ जब लाशों से पट गया तो अंग्रेज़ों ने लगभग तीन सौ लाशों को बसंत राय के क़िले के समीप सौदागर मोहल्ले के निवासी सरफ़राज़ अली के घर, जो मोहल्ले में नई हवेली के नाम से मशहूर था, ले जाकर तहख़ाने में पाट दिया42, क्योंकि सरफ़राज़ अली तो देश के विभिन्न हिस्सों में स्वतन्त्राता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के जुर्म में नेपाल के काठमांडू में नाना साहब और बेगम हज़रत महल के साथ निर्वासन का दुःख झेल रहे थे और उनके परिवार वाले अंग्रेज़ों के अत्याचार के डर से सिद्धार्थनगर के पोखरभिण्डा में जाकर बस गये थे।43
मोती जेल के समीप ही दो क़ब्रें गंजे शहीदाँ के नाम से सौदागर मुहल्ले के क़ब्रिस्तान में ऐसी हैं जिनमें बहुत बड़ी संख्या में इकट्ठे उन क्रान्तिकारियों को दफ़नाया गया था, जिनका सम्बन्ध इसी मुहल्ले से था और उन्होंने बग़ावत के जुर्म में फ़ाँसी पाई थी।44
मोती जेल का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है और यह जेल क्रान्तिकारियों की शहादत की गवाह रही है। इस लिए इसके संरक्षण के लिए आवाज़ उठाना हर उस देशवासी की ज़िम्मेदारी है जिनमें उन क्रान्ति वीरों के प्रति आदर और सम्मान की भावना है और जिनके विषय में बहादुर शाह ज़फ़र के शब्दों में यह कहना सही होगा कि:-
न दबाया ज़ेरे ज़मीं उन्हें
न दिया किसी ने कफ़न उन्हें
न हुआ नसीब वतन उन्हें
न कहीं निशाने मज़ार है
आवश्यकता इस बात की है कि इस जेल को शहीद स्थली घोषित करके यहाँ पर एक शहीद स्मारक बनाया जाए, जिस पर उन क्रान्तिकारियों के नाम अंकित किए जाएँ, जिन्हें यहाँ क़ैद कर प्रताड़ना दी गई या फाँसी पर लटकाया गया। उस विशालकाय पेड़ को भी संरक्षित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए जिन पर तीन सौ से अधिक लोगों को फाँसी दी गई थी। कहीं ऐसा न हो कि उसके समीप कूड़ा निस्तारण केन्द्र के वायुप्रदूषण से इस एतिहासिक पेड़ का अस्तित्व ही मिट जाए। इस बात का भी प्रयास किया जाए कि क्रान्तिकारियों की याद में यहाँ एक पुस्तकालय, वाचनालय और एक सेमिनार कक्ष भी बनवाया जाए जहाँ हर वर्ष सेमिनार का आयोजन करके उनका स्मरण किया जाए और उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किये जायें और उनकी कुर्बानियों से देशवासियों को अवगत कराया जाए जिससे यह गर्व से कहा जा सके कि ” शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले , वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा। “
साथ ही साथ सरकार से यह अनुरोध भी किया जाए कि मोती जेल की दीवार से संलग्न कूड़ा निस्तारण केन्द्र को कहीं और आबादी से दूर स्थानान्तरित किया जाए और उस स्थल को स्वयं क़ब्ज़े में लेकर उस स्थान का भी सौन्दरीकरण किया जाए। वहाँ के प्रदूषित वातावरण को और अधिक सुन्दर बनाने के लिए वहाँ शहीदों के नाम पर एक उद्यान और पार्किंग स्थल की भी व्यवस्था की जाए, जिससे अधिक से अधिक संख्या में लोग यहाँ आकर उन वीरों को श्रद्धासुमन अर्पित करें। यही देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले उन रणबाँकुरों को सच्ची श्रद्धाजंलि होगी,।
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संदर्भ:-
1. GORAKHPUR : A GAZETTEER, VOLUME XXXI, District Gazetteers of the United Provinces of Agra and Oudh, By H. R. NEVILL, Allahabad, 1909, P – 240
2. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, वाणी प्रकाशन, 2017, पृष्ठ – 459
2. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, वाणी प्रकाशन, 2017, पृष्ठ – 459
3. आइने गोरखपुर (अतीत से वर्तमान) लेखक – पी0 के0 लाहिड़ी, डा0 कृष्ण कुमार पाण्डेय, सुधा स्मृति संस्थान, गोरखपुर, 2018, पृष्ठ – 89
4. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ – 459
5. 1857 में अवध का महाज़, मआसिर उर्दू माख़ज़ के आइने में (उर्दू) डा0 दरख़शाँ ताजवर, प्रिंटोलोजी इंक, नई दिल्ली 2015, पृष्ठ-38
6-7. आइने गोरखपुर (अतीत से वर्तमान) लेखक – पी0 के0 लाहिड़ी, डा0 कृष्ण कुमार पाण्डेय,
पृष्ठ – 91
8. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू) डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, कहकशाँ ग्राफिक्स, देहली 2025, पृष्ठ – 331
9-10. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ – 63
11. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, आरफ़न स्कूल प्रेस, मिर्ज़ापुर, 1860,
पृष्ठ- 31 – 33
12. प्रथम स्वतन्त्राता संघर्ष और गोरखपुर जनपद, लेखिका – सीमा श्रीवास्तव,
पेपर आई0 डी0 17553, प्रकाशन तिथिः 25-4-23,
प्रकाशक – Socialresearchfoundation.com
13. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 42 – 45
14. देखें: 1857 उर्दू माख़ज़ के आइने में, डा0 दरख़शाँ ताजवर, रामपुर रज़ा लाइब्ररी, रामपुर, 2011, पृष्ठ- 319 से 346
15. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 42 – 45
16. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 330
17-18. कैसरूत्तवारीख़ (भाग-2), सैयद कमालुद्दीन हैदर, मुंशी नवल किशोर, लखनऊ, 1879,
पृष्ठ – 304-305
19. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ – 65
20. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 330
21. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 329
22. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 99
23. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 329
24. कैसरूत्तवारीख़ (भाग-2), सैयद कमालुद्दीन हैदर, पृष्ठ – 304-305
25. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ – 63
26. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 45 – 47
27. ख़दंगे गदर (उर्दू) मुईनुद्दीन हसन ख़ाँ, सम्पादक-ख़्वाजा अहमद फ़ारूक़ी, शोबा-ए-उर्दू, देहली यूनिवर्सिटी, देहली, 1972, पृष्ठ-137
28. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 49, 52
29-30. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद
सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 331
31-32. क़ैसरूत्तवारीख़, भाग-2 (उर्दू), सैयद कमालुद्दीन हैदर, मुंशी नवलकिशोर, लखनऊ, 1879,
पृष्ठ – 302 – 304
33. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 94
34. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 107 – 108
35. बर्तानवी बेहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 331
36. तारीख़ उरूज अहद सल्तनत इंग्लिशिया हिन्द (भाग-2) मुहम्मद ज़काउल्लाह, शमसुल मताबा, नई दिल्ली, 1904, पृष्ठ-178
37. बर्तानवी बहीख़्वाहों के करतूत (महाज़ यू0 पी0 के तनाज़्ाुर में) (उर्दू), डा0 मोहम्मद शाहिद सिद्दीक़ी, पृष्ठ – 331
38. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ – 65
39. मक्का मुअ़ज़्ज़मा से मुअ़ज़्ज़माबाद तक, मुजाहिदुल हसन, काकोरी आफ़सेट प्रेस, लखनऊ, 2010, पृष्ठ – 167
40. कशफ़ुल बग़ावत (उर्दू) सैयद अहमद अली शाह, पृष्ठ- 112 – 113
41. शहरनामा गोरखपुर, सम्पादक – डा0 वेद प्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ – 459
42. मक्का मुअ़ज़्ज़मा से मुअ़ज़्ज़माबाद तक, मुजाहिदुल हसन, पृष्ठ – 136
43. इतिहास दृष्टि (संयुक्तांक: 8-9), सम्पादक-सैयद नजमुल रज़ा रिज़वी, कमल आफ़सेट प्रिन्टर्स, गोरखपुर, पृष्ठ- 119 -121
44. मक्का मुअ़ज़्ज़मा से मुअ़ज़्ज़माबाद तक, मुजाहिदुल हसन, पृष्ठ – 135-136
( लेखिका आई. सी. एच. आई. रामपुर और यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन की पूर्व पोस्ट डाक्टोरल फेलो रही हैं। संपर्क-7007281376 )
