प्रमोद कुमार
लेखिका सिगरेट फूंके ! मर्द लेखकों को यह बर्दाश्त नहीं। अन्य भाषाओं म़े मर्द लेखकों की प्रजाति बीसवीं शताब्दी तक विलुप्त हो गई, पर हिन्दी में वह अभी इक्कीसवीं शताब्दी में भी विद्यमान है।
मर्द जो कुछ करता है वह कुल की मार्यादा के लिए करता है। कुल यानी पुरातन। वह स्त्री से साफ शब्दों में कहता है-
विदितश्चास्तु भद्रं ते योऽयं रणपरिश्रमः।
सुतीर्णः सुहृदां वीर्याद् न त्वदर्थं मया कृतः॥
रक्षता तु मया वृत्तम् अपवादं च सर्वतः।
प्रख्यातस्य आत्मवंशस्य न्यङ्गं च परिमार्जता॥
“ यह रण मेरे मित्रों की वीरता से सफल हुआ; यह तुम्हारे हित के लिए नहीं था।”
और
“यह मेरे उत्तम आचरण की रक्षा और मेरे प्रतिष्ठित कुल की अपमानजनक बातें हटाने के लिए किया गया।”
औरतों को भी कुल की मार्यादा में मर्दों के पीछे-पीछे चलना चाहिए।
लेकिन, आज संत महात्माओं से निर्मित मर्द लेखकों के प्रतिष्ठित कुल पर कोई औरत सिगरेट का धुआं उड़ेल रही है। मर्द
आरोप लगा रहे कि कवर पर सिगरेट पीने के चित्र से यह औरत पुस्तक का विज्ञापन कर रही है। ये मर्द रखते हैं दो चहरे, पर अपने केवल उज्ज्वल चेहरे को ही सामने लाते हैं। अपनी पुस्तकों पर दूसरा चेहरा क्यों छुपा लेते हैं। इनका जातिवाद, अवसरवाद, यूरोपियन अमेरिकन लेखकों की नकल, सरकार की जी हजूरी आदि छुपी हुई तो होती नहीं! पर ये उसे खाने के दाँत के रूप में सुरक्षित रखते हैं। सार्वजनिक जीवन में दोहरे व्यक्तित्व के अलावे घर-परिवार में भी इनका दोहरा चरित्र देखा जा सकता है। ये सबके लिए लिखते हैं, पर अपनी पत्नियों को भी कभी अपना लिखा नहीं पढ़ाते। इनके घर-परिवार में स्त्रियों को कोई स्वतंत्रता नहीं, कई तो स्त्रियों को घर से बाहर निकलने भी नहीं देते। ये रोज रोते हैं कि साहित्य के पाठक नहीं बढ़ रहे और अपने बेटे -बेटियों को भी साहित्य से जोड़ नहीं पाते। कागज पर आदर्शवाद और हर जगह लाभ का व्यापार।
जिसने सिगरेट के साथ अपना चित्र लगाया है, उसके दो चेहरे नहीं हैं। उसके विचार और जीवन में दोहरापन नहीं है। वह सरकार की दमनकारी यूएपीए पर भी डरी नहीं, आप तो भ्रष्ट मंत्रियों के कदमों पर बिल्कुल बिछ जाते हैं। डर से कभी साधारण सत्य भी नहीं बोलते। मुक्तिबोध में दोहरापन नहीं था, उनकी पुस्तकों पर भी स्मोकिंग करते चित्र छपा है। उनकी एक किताब पर सरकारी प्रतिबंध लगा, पर वह शिकायत करने भी नहीं गये।
केवल अंग्रेजी में लिखने छपने से वह लेखिका चर्चे में नहीं आ गई। कई हिन्दी लेखकों की रचनाएँ व पुस्तकें अंग्रेजी में पहले छप चुकी हैं। वे चर्चे में क्यों नहीं आ गये ? उनके पाठक क्यों नहीं बढ़े ? मर्द पुराना मुहावरा दोहरा रहे हैं कि अंग्रेजी स्टेटस सिम्बल है और यह लेखिका स्टेटस दिखा रही है। सच्चाई यह है कि भारत में अब अंग्रेजी स्टेटस सिम्बल नहीं रह गई है, हर हिन्दी वाले के बच्चे अंग्रेजी में पढ़ रहे हैं और अंग्रेजी में ही कमा रहे हैं। एक बड़े लेखक पर यह क्षूद्र आरोप, आरोपी को ही क्षूद्र बता रहा है।
स्टेटस सिम्बल आज जातीय उपनाम है। वह सैकड़ों वर्षों से अक्षुण्ण है जिसका इस्तेमाल मर्द लेखक ख़ूब कर रहे हैं।
वह विदेशी पुरस्कार से भी चर्चित नहीं हुई। देशी पुरस्कारों पर कुलीन मर्दवाद का कब्जा है -यह बात सामान्य पाठक भी जानते हैं। भारत में साहित्य, सिनेमा, खेलकूद आदि सभी के पुरस्कार अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे है। राजनीतिक प्रचार फिल्म को भी सबसे बड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार दे दिया जा रहा। पुरस्कार कोई भी हो, वह सवालों से घिरा हुआ है। पर, पाठक आपके पुरस्कारों से अधिक विदेशी पुरस्कारों को महत्व क्यों दे रहे , इसपर आपको भी विचार करना चाहिए।
यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। एक एलोगरिथ्म लादा जा रहा है -जो ये मर्द लिख रहे औरतें भी वैसा ही लिखें। वे मर्दों की भाषा में लिखें। मर्द जैसी प्रार्थनाएं कर रहे हैं, वैसी प्रार्थना वह भी करें। मर्दों की तरह वे भी दोहरा चेहरा रखें। कवर पर केवल सती सावित्री सा उज्ज्वल चेहरा छपवायें।
गोरखपुर के एक कुलीन मर्द ने सवाल उठाया है कि सिगरेट वाली ने साहित्य की कौन सी लड़ाई लड़ी है। यह मर्द महोदय कुलीन साहित्य में पाप-पुण्य के स्वयंभू धर्मराज हैं और उनका भविष्यहीन साहित्य पुरातन से जकड़ा हुआ है। जबकि लेखिका नवयुग की रचनाकार है, अब भविष्य इसी का है। लेखिका कुल की मार्यादा के मानकों व उसमें छुपे शोषण को तोड़ने की लड़ाई लड़ रही है।
अरुंधति राय की भाषा काव्यात्मक, प्रतीकात्मक और गहन अर्थपूर्ण होती है। उनकी शैली में मौलिकता और रचनात्मकता है, जो पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
उनके लेखन में सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय मुद्दों को गहराई से उठाया गया है। उनकी रचनाएँ न केवल मनोरंजन करती हैं बल्कि समाज को सोचने पर भी मजबूर करती हैं।
उनके लेखन में गहरे शोध और तथ्यों का समर्थन होता है, जिससे उनकी बातों में विश्वसनीयता आती है।
उनकी रचनाएँ भावनात्मक अपील और बौद्धिक गहराई का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करती हैं। वह एकांतिक जीवन नहीं जीती। वह जो सोचती है, वही लिखती है और उसी पर चलती भी है।
वह आधी आधुनिक और आधी पुरातन नहीं हैं। जबकि अपने को लेखक माननेवाले अनेक लोग डायलेमा में जीते हैं और सुविधा के अनुसार कभी आधुनिक और कभी पुरातन बनते रहते हैं।
अरुंधति राय के विचारों पर बहस हो सकती है, उनकी दृष्टि की आलोचना आप कर सकते हैं। साहित्य और जनतंत्र का रास्ता यही है। लेकिन, तब आपके पुरातन विचार औद दूसरा चेहरा बेनकाब हो सकता है।
वे किस स्तर के लेखक आलोचक होंगे जो लेखन पर बातचीत न कर, पुस्तक कवर पर छपी लेखिका की तस्वीर पर बातें कर रहे हैं। ये अब भी औरत का वनवास माँग रहे हैं।
( लेखक वरिष्ठ कवि हैं , संपर्क-87650 04454)
