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‘ बुद्ध और कबीर की वैचारिक परंपरा पर दृढ़ता से खड़े होने की जरूरत है ’

गोरखपुर। बुद्ध से कबीर तक यात्रा के आठवें संस्करण के आज दूसरे दिन अपराहृन तीन बजे गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में संगोष्ठी और कविता पाठ काआयोजन किया गया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने बुद्ध और कबीर की वैचारिक परंपरा पर दृढता से खड़े होकर समानता, न्याय, लोकतंत्र और विचार स्वतंत्रता के आधार पर समाज के रूपान्तरण के लिए एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया।

संगोष्ठी के प्रारम्भ करते हुए लेखक-विचारक अलख निरंजन ने कहा कि बुद्ध ऐसे विचारक हुए जिन्होंने पहली बार मुनष्य और धरती को चिंतन का केन्द्र बनाया। बुद्ध की विचार परम्परा कबीर से होते हुए ज्योतिबा फूले, अम्बेडकर तक जाती है। आज हमें उस विचार परम्परा के वाहकों की पहचान करनी है और संघर्ष को आगे बढ़ाना है।

बुद्ध से कबीर तक संस्था के संरक्षक गुजरात के पूर्व डीजीपी डॉ विनोद मल्ल ने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य जनता और खासकर युवाओं के बीच भारत की साझी संस्कृति और संवैधानिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को सही तरीके से पहुंचाना है. पूर्वांचल की वैश्विक पहचान के रूप में बुद्ध और कबीर ने अपने विचारों के माध्यम से समाज और विश्व में शांति , अहिंसा और प्रेम का संदेश दिया था। कालान्तर में गुरु गोरखनाथ महात्मा गांधी डॉ अम्बेडकर जैसी अन्य महान विभूतियों के विचारों में भी यही सन्देश मिलता है. ऐसे में वर्तमान समय में हमें इनके विचारों और शिक्षा को अपनाने और उनपर अमल करने की ज़रूरत हैं. भारत की मूल सांस्कृतिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने के लिए युवाओं की भागीदारी और उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा की ओर उन्मुख करना ही हमारा प्रयास है।

दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो अनिल राय ने आज हमारे जीवन में कला, विचार, साहित्य, संस्कृति और बौद्धिकता के विमर्श की जगहें सिकुड़ती जा रही है। इन स्थानों को राजसत्ता और पूंजीवादी उत्पादों ने घेर लिया है। यह एक गंभीर संकट का दौर है। ऐसे दौर में हमें इतिहास में बने रहने की भूमिका को अपने अनथक प्रयासों के जरिए बनाए रखना है। उन्होंने आज के कार्यक्रम में कवियों द्वारा पढ़ी गयी कविताओं को आश्वस्तकारी बताया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि सर्वत जमाल, कलीमुल हक, पवन श्रीवास्तव, आदित्य और अंकुर सच्चर ने कविता, गजल व शेर पढ़े। इन रचनाओं में साधारण जनता के दुःख, संघर्ष के स्वर थे वहीं विभाजन और नफरत की राजनीति के प्रति रोष भी।

कार्यक्रम के प्रारम्भ और आखिर में प्रेरणा कला मंच, वाराणसी के कलाकारों ने ‘ पर्वत की चिट्ठी ’ और ‘ बाजार का जमाना ’ गीत गाया।

संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज सिंह ने किया।

संगोष्ठी और कविता पाठ में प्रो गौरहरि बेहरा, परदेशी बौद्ध, श्रवण कुमार निराला, संजय श्रीवास्तव, संतोष श्रीवास्तव, अब्दुल्ला सिराज, अशोक चौधरी, कामिल खान, काजी अबदुर्रहमान, संदीप राय, अमरनाथ जायसवाल, एचएस मल्ल, देशबंधु,निखिल पांडेय, समीना अहमद, आकृति विज्ञा अर्पण आदि उपस्थित थे।

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