गोरखपुर। गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में आज दोपहर लेखक-कलाकार संगठनों द्वारा आयोजित स्मृति सभा में प्रख्यात कथाकार एवं पत्रिका ‘ पहल ’ के संपादक ज्ञानरंजन को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।
स्मृति सभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर कहानीकार मनोज रूपड़ा के साथ बदसलूकी करने वाले गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति को बर्खास्त करने की मांग करते हुए लेखक समाज द्वारा इस घटना के विरोध में व्यक्त किए जा रहे विरोध का समर्थन करते हुए एकजुटता का इजहार किया गया।
स्मृति सभा का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा किया गया था।
स्मृति सभा में बोलते हुए जनवादी लेखक संघ के गोरखपुर इकाई के अध्यक्ष जय प्रकाश मल्ल ने ज्ञानरंजन की कहानी ‘ फेंस के इधर और उधर ’ की चर्चा करते हुए कहा कि वे प्रगतिशील रचनाशीनलता के बड़े स्तम्भ थे। उन्होंने ‘ पहल ‘ पत्रिका के जरिए नए रचनाकारों को मंच दिया। आज जब जब साहित्य-समाज में प्रतिरोध की कमी देखी जा रही है , वे बहुत याद आते हैं।
जनवादी लेखक संघ से जुड़े कवि वेद प्रकाश ने कहा कि पहल के सभी अंक संग्रहरणीय हैं। उन्होंने इस पत्रिका में साहित्य की सभी विधाओं को जगह दी।

प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े कवि वीरेंद्र मिश्र दीपक, कलीमुल हक ने ज्ञानरंजनज के सहज व्यक्तित्व को याद किया।
वरिष्ठ आलोचक डाॅ अरविंद त्रिपाठी ने कहा कि ज्ञानरंजन की कहानियों में साठ के दशक में समाज में व्याप्त मोहभंग, गुस्सा और बेचैनी की अभिव्यक्ति है। उनकी कहानियों का दृश्यविधान अविस्मरणीय है। एक कहानीकार के रूप में उनका बड़ा योगदान है। ‘ पहल ’ एक आंदोलन की तरह साहित्य के परिसर में आयी । संपादन के क्षेत्र में उनका योगदान बहुत बड़ा है। ‘ पहल ’ ने साहित्यकारों की दो पीढ़ियाँ तैयार की। इस पत्रिका ने साहित्य के साथ-साथ अपने समय की राजनीति को भी प्रभावित किया। इक्कीसवीं सदी के भारत मे जैसे-जैसे अंधेरा गहराता जाएगा ज्ञान जी बहुत याद आएंगे।
स्मृति सभा में वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी ने ज्ञानरंजन जी के डेढ़ वर्ष पुराने एक कार्यक्रम में दिए गए वक्तव्य का पाठ किया।
जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने ज्ञानरंजन जी से दो वर्ष पूर्व हुए मुलाकात को याद करते हुए उनकी कहानी ‘ घंटा ’, ‘ छलांग ’, ‘ पिता ’, ‘ अमरूद का पेड़ , ‘ बहिर्गमन ’ आदि की चर्चा की। उन्होंने बांदा में प्रेमचंद कथा सम्मान के मौके पर ज्ञानरंजन जी द्वारा दिए गए वक्तव्य का पाठ करते हुए कहा कि विचारधारा उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण थी।
कवि धर्मेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि पहल में छपना किसी भी रचनाकार के लिए गौरव का विषय होता था।
स्मृति सभा की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि देवेन्द्र आर्य ने कहा कि रचनाकार का एक दायित्व यह भी है कि वह रचनाकारों की नई पीढ़ी तैयार करे। ज्ञानरंजन जी ने यह भूमिका बखूबी निभायी। उन्होंने अपनी कहानियों के जरिए नया शिल्प और रूप विधान गढा। संपादक के बतौर भी उन्होंने एक व्यापक दायरा बनाते हुए उसे अर्थशास्त्र, राजनीति, सिनेमा, कला पर महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत की। वे नए प्रतिमान स्थापित करने वाले संपादक थे।

उन्होंने याद किया कि पहल के सातवें अंक में ज्ञानरंजन जी ने उनके गीतों को प्रकाशित किया। उनकी कविताओं को जगह दी। उनके लिए कोई छोटा-बड़ा रचनाकार नहीं था।
पैगाम ए अमन के जनार्दन शाही ने इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान ज्ञानरंजन से जुड़े संस्मरण साझा किया।
स्मृति सभा में कहानीकार सरिता यादव, दिवाकर गुप्ता, सुधाकर राय, आनंद राव ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
संचालन कर रहे डॉ रामनरेश राम ने लघु पत्रिका आंदोलन को मजबूत बनाने में ‘ पहल ’ के अप्रितम योगदान की चर्चा की।
स्मृति सभा में पूर्व सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही, नितेन अग्रवाल आदि उपस्थित थे।
