गोरखपुर। साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों द्वारा आज दोपहर में प्रेमचंद पार्क में आयोजित स्मृति सभा में प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र कुमार और वीरेन्द्र यादव को याद किया गया। वक्ताओं ने दोनों साहित्यकारों के सांस्कृतिक योद्धा बताते हुए उनके जीवन व सृजनात्मक साहित्य के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया।
स्मृति सभा का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, आयाम और प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने संयुक्त रूप से किया था।
दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो अनिल कुमार राय ने कहा कि राजेन्द्र कुमार और वीरेन्द्र यादपव को केवल साहित्य के दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता। दोनों प्रतिबद्ध सामाजिक-राजनीतिक विमर्शकार थे। उन्होंने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र को अपने संघर्ष का मोर्चा बनाया। वे धारा के विरूद्ध तैरने वाले जनबुद्धिधर्मी थे। प्रो राय ने कहा कि आज जब साहित्य को सत्ता के विभिन्न केन्द्रों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, सत्ता से रिश्ता बनाया जा रहा है तब राजेन्द्र कुमार और वीरेन्द्र यादव को प्रतिरोध की संस्कृति के वाहक के रूप में सदैव याद किया जाएगा। राजेन्द्र कुमार और वीरेन्द्र यादव का निधन साहित्य ही नहीं भारतीय समाज की बहुत बड़ी क्षति है।

प्रो अनिल राय ने राजेन्द्र कुमार और वीरेन्द्र यादव ने अपने समय की समस्याओं और सवालों से जिस तरह पूरी जिंदगी संघर्ष किया, वह हमें हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
वरिष्ठ आलोचक प्रो अरविंद त्रिपाठी ने वीरेन्द्र यादव के कथा आलोचना में योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि वे सतत विद्रोही थे। उन्हें सिर्फ 26 वर्ष की उम्र में एक लेेख के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान मिला था। उन्होंने राजेन्द्र कुमार द्वारा ‘ अभिप्राय ’ पत्रिका के विशेषांकों की चर्चा करते हुए कहा कि वे आलोचक-कवि के अलावा बहुत अच्छे संपादक भी थे। प्रो त्रिपाठी ने कहा कि वीरेन्द्र यादव और राजेन्द्र कुमार ने प्रतिबद्धता को कर्म क्षेत्र में उतारा।
दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक प्रो राजेश मल्ल ने वीरेन्द्र यादव ने अपने समय का बेहतर क्रिटिक रचा। उनके लिए साहित्य और आंदोलन में कोई विभाजक रेखा नहीं थी। प्रो मल्ल ने बाराबंकी में दलित उत्पीड़ने के खिलाफ जुलूस और किसान आंदोलन में वीरेन्द्र यादव की भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अद्भुत संगठनकर्ता भी थे। वे बहुत निडरता के साथ अपनी बात रखते थे।

युवा आलोचक डाॅ रामनरेश राम ने कहा कि प्रो राजेन्द्र कुमार के शिक्षक व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए कहा कि वे इलाहाबाद में एक स्कूल की तरह थे। उन्होंने कई पीढ़ियों को तैयार किया। डाॅ रामनरेश ने कहा कि वीरेन्द्र यादव प्रगतिशील आलोचना की सीमाओं को तोड़ते हुए उसे और आगे ले गए। कथा आलोचना में उनका योगदान अप्रितम है।
शिक्षक एवं नाट्य लेखक आनंद पांडेय ने कहा कि वीरेन्द्र यादव ने आलोचना के पैमाने को नया किया। वे आलोचना को अकादमिक दृष्टि से अलग सामाजिक-आर्थिक संबंधों में देखते थे। उन्होंने राजेन्द्र कुमार और वीरेन्द्र यादव को जनबुद्धिजीवी बताते हुए कहा कि दोनों साहित्यकार जनता के लिए समर्पित थे। इसलिए उनका जाना जनता पर बड़े आघात की तरह है।
स्मृति सभा में कवि जय प्रकाश मल्ल, डाॅ प्रेमनारायण भट्ट ने भी अपने विचार रखे।

संचालक जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने किया।
स्मृति सभा में प्रगतिशील लेखक संघ के कलीमुल हक, ट्रेड यूनियन नेता जेएन शाह, कवि निखिल पांडेय, अजीत सिंह, अनीता भट्ट, रणजीत कुमार, वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी, सरोश अनवर, वेद प्रकाश पाठक, मनोज यादव, धनेश कुमार, अंगद प्रजापति, रंग कर्मी धर्मेन्द्र भारती, बेचन सिंह पटेल, अवनीश मौर्य, दीपक कुमार यादव, रमेश कुमार, अंतिका त्रिपाठी, प्रबोध नारायण सिन्हा, सौरभ आजाद, राजू मौर्य, पद्मिनी मल्ल, संजना पटेल, अमित कुमार, शिखा सिंह, धीरज कुमार, हरीश चन्द्र, नवनीत तिवारी, शशि सिंह, अनुराग रंजन, विवेक ओझा, आशीष कुमार, साहिल विक्रम तिवारी आदि उपस्थित थे।
