आजमगढ़। प्रो तुलसीराम स्मृति आयोजन 15 फरवरी, 2026 को आज़मगढ़ के तमसा प्रेस क्लब में ‘ चिंतन की प्रतिरोधी परंपरा और प्रो. तुलसीराम ‘ विषय पर आयोजित हुआ। यह कार्यक्रम जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश और प्रो तुलसीराम स्मृति आयोजन समिति धरमपुर के संयुक्त तत्त्वाधान में आयोजित हुआ।
प्रो तुलसीराम स्मृति आयोजन की शुरुआत उनके परिनिर्वाण के वर्ष 2015 से शुरू हुई थी। पहला व्याख्यान आज़मगढ़ के शिक्षक सदन में हुआ था, तब से अनवरत यह श्रृंखला जारी है। अभी पिछले वर्ष यह आयोजन उनके गाँव धरमपुर में हुआ था। इस तरह तमसा प्रेस क्लब में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम श्रंखला की 11वी कड़ी थी। विद्वान वक्ताओं के रूप में युवा आलोचकों की शानदार उपस्थिति ने इस श्रृंखला को खास बना दिया। कभी कभार मंचों पर उपस्थित होने वाले युवा आलोचकों ने सीमित स्रोताओं की उपस्थिति के बाद भी संवाद को गंभीर विमर्शों से गुणात्मक ऊर्जा से भर दिया।

जिस तरह भारत बहुसांस्कृतिक देश है उसी तरह विमर्शों की विविधता ने संवाद को जीवंत और बसहधर्मी बना दिया। इस संवाद में आधार वक्तव्य देते हुए जसम उत्तर प्रदेश के सचिव और युवा आलोचक राम नरेश राम ने कहा कि आज पूरे देश में भारतीय ज्ञान परंपरा पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है। सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं में सेमिनार और गोष्ठियों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा हो रही है। दरसल भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर भारतीय इतिहास के ऐसे सांस्कृतिक पहलुओं को सामने लाने, स्थापित करने की कोशिश की जा रही है जिसमें भारतीय समाज के बड़े हिस्से को गुलाम बनाये रखने के तत्त्व मौजूद हों। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा करते हुए ऐसे आभास दिलाया जाता है कि मानो औपनिवेशिक शक्तियों ने इस ज्ञान परंपरा को नेपथ्य में धकेल दिया था और अब चर्चा कराकर उसको फिर से स्थापित करना है जबकि इसके उलट सच्चाई यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर गुलामी की संस्कृति का ही महिमामंडन हो रहा है। ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि वर्चस्व की संस्कृति के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति भी हमेशा से विद्यमान रही है। प्रतिरोध की इसी संस्कृति की इसी अविच्छिन्न धारा के एक मजबूत स्तम्भ प्रो तुलसीराम थे।

उन्होंने अपने बौद्धिक उपक्रम से लगातार इस तथ्य को सामने रखने का प्रयास किया कि भारत की मूल संस्कृति बौद्ध संस्कृति रही है जिसको दमन और हिंसा के माध्यम से खत्म कर दिया गया। प्रो तुलसीराम ने हमेशा इस तथ्य को रेखांकित करने की कोशिश की कि ब्राह्मणवादी धर्मस्थल की जितनी भी प्रसिद्ध जगहें हैं वे कभी न कभी बौद्ध संस्कृति के गढ़ रहे हैं हैं। बहुत सुनियोजित ढंग से इन स्थलों को ब्राह्मणवादी संस्कृति के गढ़ों में बदल दिया गया। भारतीय दर्शन के इतिहास में वे उस धारा की तलाश करते रहे जो समता और बंधुत्व पर आधारित हो। इसीलिए वह लगातार बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक अवदानों को रेखांकित करते हैं। दरअसल प्रो तुलसीराम दर्शन की मुक्तिकामी धारा के अन्वेषी चिंतक थे।
संवाद की शुरुआत करते हुए सघन चिंतक और आलोचक डॉ कवितानंदन ने कहा कि ‘ मुर्दहिया ’ और ‘ मणिकर्णिका ’ डॉ.तुलसीराम जी की आत्मकथा है जबकि उनका रचना संसार इससे कहीं अधिक विस्तृत है। उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर बहुत लिखा है। हिन्दी साहित्य में रुचि रखने वाले उन्हें उनकी आत्मकथा से पहचानते हैं। ‘मुर्दहिया’ की कथा दलित समाज से निकले केवल तुलसीराम की कथा नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की कथा है जो शिक्षित होकर अभिशप्त जीवन से मुक्ति की राह ढूँढ़ रहे हैं। ब्राह्मणवादी-व्यवस्था और पूँजीवादी साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का विकल्प तलाशते हुए वह मार्क्सवाद से आम्बेडकरवाद और आम्बेडकरवाद से होते हुए बुद्ध तक जाते हैं ताकि समाज को इस अभिशप्त जीवन से बाहर निकलने का रास्ता दिखा सकें लेकिन वह कहीं भी संतुष्ट नहीं दिखाई देते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कि असमानता वाली राजनीति और अमानवीय सामाजिक व्यवस्था से केवल दलित पीड़ित हैं बल्कि ब्राह्मणवादी संस्कृति में सना यह पूरा समाज पीड़ित है। अपनी आत्मकथा और लेखों में वह समस्याओं की स्पष्ट पहचान करते हैं और उनके समाधान का विकल्प भी तलाशने की कोशिश करते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में दक्षिणपंथी शक्तियों के उभार ने हमारे सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। चिंतन की प्रतिरोधी परंपरा को समझने में डॉ, तुलसीराम का साहित्य महत्त्वपूर्ण है जो हमें भविष्य की रणनीति तैयार करने में सहयोगी की भूमिका निभाएगा। दक्षिणपंथी शक्तियों और उसकी उत्पन्न की हुई समस्याओं से लड़ने के लिए हमें रणनीति बनाकर लोगों के बीच में जाना होगा।
युवा आलोचक डॉ चंदन कुमार ने कहा कि भारतीय समाज में दो परंपराएं एक साथ चलती रही हैं। पहली परम्परा वैदिक ( ब्राह्मण ) परम्परा है तथा दूसरी बौद्ध श्रमण परम्परा है। पहली परम्परा शोषण – दमन पर आधारित है और दूसरी न्याय, समानता और बंधुत्व पर आधारित है। प्रतिरोध की यह परंपरा बुद्ध से होते हुए मध्यकाल में कबीर, रैदास, दादूदयाल तक आती है। जहां रैदास स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि ” ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न/ छोट बढ़ सब सम बसे रैदास रहें प्रसन्न।” यह प्रतिरोधी परंपरा वर्ण और जाति पर आधारित शोषण का प्रतिकार करती है। यह परंपरा फुले दंपत्ति , पेरियार , आंबेडकर से होते हुए प्रो. तुलसीराम तक आती है।

उन्होंने कहा कि प्रो. तुलसीराम मार्क्सवाद से होते हुए आंबेडकर और बुद्धिज़्म की यात्रा करते हैं। उनका स्पष्ट मानना था कि भारतीय मार्क्सवादियों को वर्ण – संघर्ष के पीछे आकर खड़ा होना पड़ेगा। क्योंकि भारत में इसी वर्ण – व्यवस्था ने पूंजीवाद को तरजीह देकर वर्ण – व्यवस्था को और मजबूत बनाने का कार्य किया है। भारतीय मार्क्सवादियों में कई घोर जातिवादी, सामंतवादी और महिला विरोधी हैं। इन्हीं लोगों की वजह से किसी भी प्रकार का बदलाव संभव नहीं है। आज जरूरत है कि परिवर्तनकामी शक्तियां एक साथ एकजुट हों और सामंतवादी, फांसीवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों का डटकर मुकाबला करें। साहित्यिक दायरे में यदि कहा जाय तो यह कह सकते हैं कि रही होगी बीसवीं शताब्दी किसी बड़े साहित्यकार के नाम इक्कीसवीं शताब्दी प्रो. तुलसीराम के नाम दर्ज रहेगी।
अभिनव कदम पत्रिका के संपादक और उत्तर प्रदेश जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष जयप्रकाश धूमकेतु ने कहा कि प्रो तुलसीराम गंभीर चिंतक थे।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए मार्क्सवादी चिंतक जयप्रकाश नारायण ने कहा कि किसी चिंतक की सामाजिक प्रतिबध्दता से ही उसकी मुकम्मल पहचान हो सकती है। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को नकार कर हम किसी सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। अस्मितावाद अंततः प्रतिक्रियावाद के पक्ष में खड़ा होता दिखायी देता है।
जसम के राष्ट्रीय महासचिव और प्रखर चिंतक मनोज कुमार सिंह ने कहा कि भारतीय इतिहास में प्रतिरोध का चिंतन हमेशा से मौजूद रहा है । इतिहास के जिस भी चरण में भेदभाव की व्यवस्था रही है उसमें भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने वाले लोग रहे हैं। बुद्ध , चार्वाक , गोरखनाथ, कबीर , रैदास, पेरियार , फूले,डॉ आंबेडकर और प्रो तुलसीराम इसी प्रतिरोधी चिंतन परम्परा के स्तम्भ थे। प्रो तुलसीराम ने प्रतिरोधी चिंतन परंपरा को समृद्ध करने बड़ा योगदान किया।

समकालीन जनमत पत्रिका के संपादक के के पांडेय ने कहा कि किसी भी समाज मे चिंतन की कोई एक धारा होती ही नहीं है। हमेशा समांतर कई धाराएं मौजूद रहती हैं। द्वंद्वात्मकता में ही चीजें आगे बढ़ती हैं। वर्णव्यवस्था का विरोध शुरू से रहा है। प्रो तुलसीराम वर्णवादी चिंतन के खिलाफ समतावादी चिंतन धारा के महत्वपूर्ण विद्वान थे।
डी ए वी डिग्री कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य डॉ जितेंद्र कुमार नूर ने अपनी गजलों से संवाद की सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया।
संवाद में अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान सामाजिक चिंतक और ‘ प्रोफेसर की डायरी ‘ जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक डॉ लक्ष्मण यादव की उपस्थिति ने इसको और समृद्ध कर दिया । उन्होंने प्रो तुलसीराम के साथ अपने जीवन अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि वे एक सजग और बेबाक चिंतक थे वे समय के संकट की शिनाख्त बड़ी संजीदगी से करते थे। जिस तरह के संकट के दौर से हम आज गुजर रहे हैं उसमें हमे बड़ी एका बनाने की जरूरत है। इस मामले में प्रो. तुलसीराम का चिंतन हमारा मार्गदर्शन कर सकता है।

संवाद में मऊ के डॉ तेजभान , फकरे आलम , गोरखपुर से डॉ सुनीता अबाबील , इप्टा के बैजनाथ गंवार, जलेस के आजमगढ़ जिला सचिव अजय गौतम , कारवाँ पत्रिका के संपादक रवींद्र नाथ राय ने भी अपने अपने वक्तव्यों के माध्यम से तुलसीराम के अवदानों पर चर्चा की।
कार्यक्रम में विनय सिंह यादव, कहानीकार हेमंत कुमार, कवितानंदिनी, विनोद सिंह, मनोज सिंह , मनीषा, बृजेश कुमार समेत शहर के तमाम नागरिक और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।
संवाद का संचालन राम नरेश राम ने और धन्यवाद ज्ञापन जसम आज़मगढ़ के सचिव यमुना प्रजापति ने किया।
रिपोर्ट -राम नरेश राम
