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यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 पर लगी रोक तुरंत हटाई जाए : अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच

 नई दिल्ली। अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (AIFRTE) ने मांग की है कि यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, पर लगी रोक को तत्काल हटाया जाए।

अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष जगमोहन सिंह, प्रवक्ता मधु प्रसादऔर संगठन सचिव प्रसाद वी ने 14 फरवरी को जारी बयान में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन विनियमों के क्रियान्वयन पर “ विभाजनकारी ” होने के आधार पर रोक लगाने का निर्णय उच्च शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक दायित्व पर गंभीर चिंता पैदा करता है। ये विनियम सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्देश के अनुरूप बनाए गए थे, जो 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी  की माताओं द्वारा दायर मामले के संदर्भ में दिया गया था। दोनों की मृत्यु, जिनमें गंभीर भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप सामने आए थे, ने विश्वविद्यालयों के भीतर जातिगत पदानुक्रम और सामाजिक बहिष्कार की गहरी जड़ों को जगजाहिर किया।

मंच ने कहा कि पिछले कई दशकों में, उच्च शिक्षा में जाति, धर्म, भाषा, जातीयता, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव की उपस्थिति बनी हुई है। इस अवधि में निजीकरण और केंद्रीकरण ने उच्च शिक्षा को ऐसे रूप में ढाला है, जो संरचनात्मक असमानता को और गहरा करते हैं और समान पहुंच को सीमित करते हैं। भेदभाव न तो आकस्मिक है और न ही व्यक्तिगत असफलता। यह विशेषाधिकार और पदानुक्रम की संरचनाओं में निहित है। लैंगिक अन्याय को पितृसत्तात्मक संस्थागत संस्कृति से अलग नहीं किया जा सकता। जातिगत भेदभाव एक ऐसे सामाजिक ढांचे पर आधारित है, जहाँ ऊँची जातियाँ विशेषाधिकार पाती हैं और डॉ. आंबेडकर द्वारा बताए गए “नीची” जातियों को हाशिये पर रखा जाता है। यही संरचनाएँ उच्च शिक्षा संस्थानों में रोज़मर्रा की प्रथाओं, संस्थागत प्रतिक्रियाओं और न्याय तक पहुंच को आकार देती हैं।

इसीलिए, क्योंकि भेदभाव संरचनात्मक है, इसलिए शिकायत निवारण तंत्र लोकतांत्रिक, प्रतिनिधिक और स्वतंत्र होना चाहिए। लेकिन वर्तमान विनियम “इक्विटी एम्बेसडर” और निगरानी “स्क्वॉड” की नियुक्ति के प्रावधान रखते हैं, जिनके सदस्यों को कुलपति नामित या नियुक्त करते हैं। ढांचा भले ही समानता, भाषाई एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात करता हो, परंतु स्वयं विनियमों में इन समुदायों, पिछड़े वर्गों, विकलांग व्यक्तियों या महिलाओं का प्रतिनिधित्व उल्लेखित नहीं है। जब शिकायत किसी वंचित समुदाय के विरुद्ध होती है, तो नियंत्रण उन्हीं के हाथ में आ जाता है, जिससे प्रक्रिया की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

ऐसी केंद्रीकृत नियुक्तियाँ जोखिम पैदा करती हैं कि वंचित समुदायों की शिकायतों की सुनवाई उन्हीं के हाथों में चली जाए जिनसे संरक्षण की अपेक्षा है। इससे शिकायतकर्ता छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास कम हो जाता है। यह स्थिति पूर्वाग्रह और बहिष्करण के अनुभवों को और बढ़ाती है।

एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित व्यवस्था, जिसमें छात्रों, शिक्षकों, गैर-शिक्षण स्टाफ और प्रशासन का प्रतिनिधित्व हो, एक स्वतंत्र और संरक्षित तंत्र उपलब्ध करा सकती है। इसी से शिकायत निवारण तंत्र प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर वास्तविक न्याय सुनिश्चित कर सकता है।

इन मुद्दों पर पुनर्रचना और पारदर्शी बहस की आवश्यकता है।

परंतु डिज़ाइन में कमियाँ पूरे ढांचे को रोक देने का आधार नहीं हो सकतीं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह समानता और गरिमा की रक्षा करे—न कि प्रणालीगत भेदभाव से निपटने के प्रयासों को रोक दे। अन्याय को चुनौती देने के प्रयासों को “विभाजनकारी” बताना, असमानता को उजागर करने को ही विभाजन का कारण मानना है। सामाजिक न्याय की संवैधानिक दृष्टि मांग करती है कि संस्थागत स्तर पर भेदभाव के सभी रूपों से निपटने की ठोस कोशिशें तत्काल शुरू हों। रोक के आदेश से यह प्रतिबद्धता कमजोर होती है। इसलिए एआईएफआरटीई दोहराता है कि रोक तुरंत हटाई जाए और लोकतांत्रिक, जवाबदेह तंत्र स्थापित किए जाएँ, जो उच्च शिक्षा में भेदभाव को प्रभावी ढंग से संबोधित कर सकें।