साहित्य - संस्कृति

जलेस के स्थापना दिवस पर युवा कवियों का कविता पाठ, दिवंगत साथियों को याद किया

गोरखपुर। राष्ट्रीय स्तर पर जनवादी लेखक संघ की स्थापना के 45वें दिवस पर उसकी गोरखपुर जिला इकाई ने एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें लेखक संघ की भूमिका व मुद्दों पर गंभीर बातचीत हुयी. जलेस की इस इकाई ने इस जिले के कुछ दिवंगत जनपक्षधर लेखकों के योगदान को याद करने के साथ नई पीढ़ी के रचनाकारों की संभावनाओं को उजागर करने के लिए उन्हें काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित किया था।

दिवंगत कवि आलोचक व गोरखपुर इकाई के प्रथम अध्यक्ष डा लालबाबू श्रीवास्तव, प्रसिद्ध समाजविज्ञानी व आलोचक प्रो हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, कथाकार बादशाह हुसैन रिजवी व कवि पत्रकार देवेंद्र नाथ द्विवेदी को क्रमशः कवि महेन्द्रनाथ श्रीवास्तव, कवयित्री डा रंजना जायसवाल ,शायर कलीमुल हक व वेद प्रकाश ने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को याद करते हुए उन्हें जनवादी साहित्य का पुरौधा बताया. करोना काल में युवावस्था में ही कालकवलित कवि व संगीतकार सुरेश चंद की कुछ कविताओं को उद्धृत करते हुए दलित विचारक अलख निरंजन ने कहा कि सुरेश अपनी सहज संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के कारण दलित लेखक थे पर जलेस के सान्निध्य से उन्होंने वर्गचेतना भी अर्जित की और उनकी कवितायेँ वर्ण व वर्ग दोनों के शोषण की अभिव्यक्ति व मुक्ति की आकांक्षा हैं.

कोरोना से अल्प आयु में ही बिछुड़े कवि प्रो शरतचंद्र श्रीवास्तव को याद करते हुए डा आनन्द पांडये ने कहा कि एक सच्चे जनवादी की तरह वह किसी लालच व् भय से मुक्त हो लिख रहे थे. साहित्य में जनवाद की यही भूमिका है. उनमें सृजन की अपार संभावनाएं थीं। अब तो अपस्तीन फाइल से स्पष्ट हो रहा है कि कोरोना को फ़ैलाने में अमेरिका के कॉर्पोरेट का ही हाथ था. भारत समेत अनेक देशों की संभावनाएं उससे धूमिल हुयी.

कार्यक्रम के दूसरे भाग में युवा कवियों संजीव सिंह, अभिषेक कुमार, योगेंद्र पांडेय और राणा प्रताप ने अपनी कविताएं पढ़ी।
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो डा अनिल राय ने कहा कि यहाँ हम अपने पूर्वज लेखको को कृतज्ञता से देखते हुए उनकी परम्परा को समकालीनता में विकसित होते देख प्रसन्न हैं। हमारे पूर्वज लेखकों ने जिस आँखिन देखी परम्परा का निर्माण किया था। जनवादी लेखक संघ के अन्वेषण में नयी पीढ़ी हमें आश्वस्त कर रही है।

इस अवसर पर वरिष्ठ कवि देवेंद्र आर्य ने कहा कि साहित्य में प्रतिरोध को जीवित रखने के लिए जनवाद ही रास्ता है। आज का कार्यक्रम पूर्वजों को याददाश्त में रखकर नयी पीढ़ी को जोड़ने का सार्थक कार्यक्रम है।

जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह ने जलेस को ४५वे स्थापन दिवस पर बधाई दी व देश में आ चुके फासीवाद को रेखांकित किया और कहा कि आज का समय सभी जनपक्षधर संगठनों – प्रलेस, जलेस, जसम और दलित लेखकों द्वारा मिलजुल कर संघर्ष करने का है। यह काम स्थानीय स्तर  पर भी किया जाना चाहिये। प्रलेस के जिला अध्यक्ष कलीमुल हक ने भी शुभकामनाएं दी।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में वरिष्ठ कवि प्रमोद कुमार ने 14 फरवरी 1982 को राष्ट्रीय स्तर पर जलेस की स्थापना की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जलेस शुरू से ही साम्प्रदायिकता, पुनरुत्थानवाद और फासीवाद के खतरों के प्रति लेखकों को आगाह करता रहा, आज पूरा देश उनकी चपेट में है। गोरखपुर मे विस्मृति का रोग भी भी है, हम अपने पूर्वज लेखकों को भूलते जा रहे हैं। फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ जो गोरखपुर म़े जलेस के संस्थापक सदस्य भी है, ने स्थापना काल के संघर्षों के संस्मरण रखे।
कार्यक्रम का संचालन कवि व जिला इकाई के अध्यक्ष जयप्रकाश मल्ल ने किया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार राजाराम, कवि धर्मेंद्र त्रिपाठी, कथाकार रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, शंकर यादव , अक्स गोरखपुरी , मोहम्मद कामिल खान, , सरवत जमाल, शत्रुघ्न, सुनील शर्मा, सत्येंद्र गिरी, मारकंडे, गौतम कुमार,आदि अनेक लेखक उपस्थित रहे।

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