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गाँव से एक डिस्पैच : असल डर तो ‘ पॉजिटिव ’ होने का है

डर को संभालना होगा- 1

चिकित्सकों/विशेषज्ञों की माने तो कोविड से लड़ाई पूरी तरह तकनीकी है। इस जंग को जीतेगा इंडिया/पीटेगा इंडिया जैसे खेल के अतिरंजित नारों से नहीं जीता जा सकता। थाली, शंख और घंटा तो बज ही चुका है। तमाम सारे श्रेष्ठता और दंभ का हस्र सामने है।

यह लड़ाई संसाधन और सुविधा संपन्नता की लड़ाई है। जो सिर्फ सत्ता और उसकी मशीनरी के व्यवस्थित प्रबंधन से ही आसान हो सकती है। हमारी एक बड़ी आबादी ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्र से है। असल चुनौती वहीं से है। विशेषज्ञों की माने तो कोविड के 85 फीसद केस माइल्ड होते हैं। केवल 5 से 10 फीसद ही क्रिटिकल कैटेगरी में आते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है माइल्ड केसेज थोड़ी सी जागरूकता और सामान्य ट्रीटमेंट में घर के एकांत (होम आइसोलेशन) से ही ठीक हो सकता है। अब इसके लिए पहली व आवश्यक शर्त है कि कोविड के दहशत व डर को संभाला जाए। यह तभी संभव है जब सीएचसी,पीएचसी के मार्फत ग्राम पंचायत स्तर पर जांच व जागरूकता अभियान का व्यापक नेटवर्क बनाया जाये

ग्राम पंचायत स्तर पर यह ढांचा पहले से स्कूल, एएनएम सेंटर व आशा, शिक्षा मित्र आदि के रूप में तैयार खड़ा है। जरूरत है बस उन्हें स्वास्थ्य वालंटियर के रूप में सक्षम किया जाए। उन्हें साधन व सुविधा संपन्न बनाया जाए।

डर को संभालना होगा- 2

फलाने बहू खतम हो गयी। दू-चार दिन बुखार था, अस्पताल ले जाते रास्ते में दम तोड़ दी… फलाने की पतोहू नहीं रही। नाते में गई थी। रात भर मुंह-पेट चला, सुबह चल बसी… फलाने सुबह ही चौराहे पर सब्जी बेचने गए थे। घर लौटे तो चक्कर आ गया और गुजर गए…

मौत का कोई यह असामान्य रूप नहीं है। गांव में मौत का यह सामान्य रूप है। ऐसा ही होता आया है। अमूमन यहां न तो अच्छे अस्पताल ले जाने की हैसियत है न ही बेड व दवाओं की मारामारी में कीमत चुकाने की औकात। उनके हिस्से में न तो किसी एक्सपर्ट की काउंसिलिंग है न ही बीमार-बीमारी की कोई केस हिस्ट्री।

यहां बीमारी की हिस्ट्री यही है- जो आया है, जाएगा। गांव में पिछले एक डेढ़ माह में आधा दर्जन से अधिक चले गये। सिर्फ एक ही पुख्ता रूप से कोविड का केस था। शहरों में कोविड से असामान्य मौतों का हाहाकार है। यह असामान्य स्थिति अब गांवों में भी बनने लगी है। ऐसे में अब सामान्य मौत पर भी डरना लाजिमी है।

 

 

शहरों में जागरूकता है। जांच है और सुविधा भी। गांवों में डर है। जागरूकता और सुविधा नहीं। लेकिन इस डर में छुपाव है। इस छुपाव को गली-नुक्कड़ के डॉक्टर बाबुओं से भी आत्मविश्वास मिल जाता है। क्योंकि वही उनके नजदीक हैं। उनकी सुविधा-जरूरत पर हाजिर हैं। इसीलिये डर के बावजूद भी गांवों में शादी-ब्याह, भोज-भंडारे यथावत हैं और सर्दी-जुकाम, बुखार-खांसी आम है।

गांव के ही मेरी रिश्तेदारी में परिवार के तीन-चार लोग कोविड पॉजिटिव निकल गए। शुक्र था, लोग सही समय पर चेत गए और जांच करवा लिए। हफ्ते भर की प्राथमिक ट्रीटमेंट और आइसोलेशन की सुविधा में सभी दुरुस्त हो गए। वहीं उनके पड़ोस का घर डर वश जांच से पीछे हट गया और सप्ताह भर में परिवार की जवान बिटिया दम घुटने से खतम हो गई।

बात इसी डर की है। डर के छिपाव की है। जागरूकता की है और अतिरेकी विश्वास की है। इस असामान्य स्थिति और हाहाकार में डर जरूरी है पर जागरूकता के साथ। न कि निडर होने का गांव में यह अतिरेकी विश्वास कि बुलावा पे जाये के पड़ी, बाकी डरे से का होई। ऐसा विश्वास इस हाल में मुश्किल में डाल सकता है।

जब विशेषज्ञों का भी मानना है कि कोविड के 80 फीसद केस सामान्य ट्रीटमेंट और आइसोलेशन की स्थिति में ठीक हो जाते है। ऐसा होते हुए देखा भी जा रहा है। तो सवाल यही है कि गांव की परिस्थितियों में इसकी क्या तैयारी है? इस संदर्भ में जब आसपास के पीएचसी कोविड कंट्रोल नंबर पर एंटीजन जांच की जानकारी ली गई तो पता चला यह सुविधा सिर्फ सीएचसी पर है। मतलब कि ब्लाक स्तर पर।

अब बड़ा सवाल है कि जब बाजार धड़ल्ले से अपनी पहुंच गांवों तक बना ले रहा है जिसमें स्वास्थ्य का बाजार भी शामिल है। गली नुक्कड़ के डाक्टर बाबू भले ही आम आदमी का भला करते दिखते हैं पर हिस्सा तो उसी बाजार के हैं। तो आपात स्थिति में सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुविधाएं दूर क्यों?

 

 

जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं गांवों की बिल्कुल नजदीकी जरूरत हैं। सीएचसी क्या ? पीएचसी क्या ? इन्हें तो पंचायत स्तर पर होनी चाहिए। मामला तो साल भर से ऊपर का है। अब तक तो पंचायत स्तर पर सक्षम और समर्थ स्वास्थ्य वालंटियर खड़े हो जाना चाहिए। जो लोगों को महामारी से लड़ने के लिए मजबूत और जागरूक करते।

जरूरत इस डर को संभालने के तकनीकी सरोकार की है। बावजूद इसके संसाधनों, सुविधाओं का हाहाकार है। टीवी के चैनलों पर आरोग्य आयुर्वेद और योगा का व्यापार है। बहसों में दूसरे तीसरे स्ट्रेन की भयावहता का प्रचार है। अगर इस पर भी सवाल पिछली सरकारों से है, तो मरहला राम जाने… ?

 

असल डर तो ‘पॉजिटिव’ होने का है

गांव पर हूं। यहां हर दूसरा तीसरा आदमी बुखार/वायरल की चपेट में है। मौसम भी वही है। दिन में तीखी धूप, गर्म हवा और रात अपेक्षाकृत ठंडी। असामान्य स्थिति में सबकुछ सामान्य है। गांव-गली-नुक्कड़ के डॉक्टर हैं। वही पर्याप्त हैं। वही विश्वास हैं और वही भगवान हैं। यहां दूसरे फेज में पंचायती चुनाव निपट चुका है। लोग अपने खेमे की हार-जीत की गुणा-गणित में व्यस्त हैं।

वहीं शहरों में कोरोना के दूसरे स्ट्रेन का महामारी काल है। सबकुछ असामान्य हैं, अस्पतालों में हाहाकार है। लोग अपने परिचिताें, अपरिचितों सभी के लिये बेड, दवा, आक्सीजन की गुहार लगा रहे हैं। अफ़सोस, सबके अपने बिछड़ रहे हैं। देखते-देखते बहुत से अपने बिछड़ गए।

मन ग़मज़दा है। आहत है। लोग सकारात्मक (पॉजिटिव) रहने की बात कह रहे हैं। पर यही सकारात्मकता तो डरा रही है। फिर भी आहत मन को सकारात्मक बनाने के लिए बाजार निकल गया। वही भीड़भाड़, कोई डर नहीं। मन थोड़ा हल्का हुआ। फिर अचानक ‘कोई डर नहीं’ का डर! आखिर यह कैसी सकारात्मकता?

गांव में शादी है। दावत है। भंडारा है। सब सकारात्मक पहलू है। सबसे सकारात्मक तो यह है कि कई-कई दिन के बुखार में गली नुक्कड़ के भगवानों पर यकीन और निर्भरता। यकीनन वह डॉक्टर नहीं भगवान ही हैं। क्योंकि वह एक बड़ी आबादी के मेहनत मशक्कत की छोटी जमा-पाई को बड़ी फीस और महंगे जांच खर्च से बचा लेता है।

 

अमूमन सभी गांवों की एक बड़ी आबादी की स्वास्थ्य सलामती इन्हीं गली नुक्कड़ के भगवानों के सहारे है। अब उन्हें झोलाछाप कहने का पाप नहीं किया जा सकता। भले ही उनकी डिग्री संदिग्ध है, कोई विशेषज्ञता नहीं है। फिर भी यह महारत उन्होंने पिछले एक-दो दशक में सीधे लोगों के बीच जाकर और मैडिसिन बाजार से हासिल कर ली है।

असल बात तो इसी सकारात्मकता की है। उस यकीन की है, विश्वास की है। जो भगवान सरीखा है। जो इस असामन्य स्थिति में सामान्य सी दिख रहा है। भगवान भी करे कि यह सकारात्मकता और सामान्य स्थिति बनी रहे। पर इस कोरोना काल के दूसरे स्ट्रेन की हाहाकार का क्या करें, जिसने ‘पॉजिटिव’ शब्द को ही ख़ौफ़ का पर्याय बन दिया है।

जबकि इसी ‘पॉजिटिव’ ने तीस फ़ीसद शहरी आबादी के कुछ फ़ीसद से असली भगवानों (विशेषज्ञ डॉक्टरों) और सुविधा संपन्न अस्पतालों को हिला दिया है। असल सकारात्मक सवाल यही है ग्रामीण सत्तर फ़ीसद आबादी असल भगवानों और सुविधा संपन्न अस्पतालों पर अभी कोई दबाव नहीं बनाया है। उनकी सकारात्मकता यही है- न वह इसके आदी हैं न उनकी ऐसी हैसियत है। पर यह सकारात्मकता डराती है ..

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ओंकार सिंह

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