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डाॅ कफील खान के बारे में तीन वर्ष पहले दी गई सूचना से क्यों पीछे हट रहा है बीआरडी मेडिकल कालेज

डॉ कफील (फाइल फोटो)

बीआरडी मेडिकल कालेज की सीनियर क्लर्क विमी मंजुला सैमुअल को डाॅ कफील खान के सम्बन्ध में सूचना अधिकार कानून के तहत मांगी गई सूचना देने के बारे में निलम्बित किए जाने पर एक बार फिर बीआरडी मेडिकल कालेज का आक्सीजन हादसा सुर्खियों में आ गया है। सवाल उठ रहा है कि आखिर बीआरडी मेडिकल कालेज प्रशासन ने महिला लिपिक पर क्यों कार्रवाई की ? आखिर सूचना अधिकार कानून आवदेन पर दी गई सूचना से तीन वर्ष बाद बीआरडी प्रशासन क्यों पीछे हट रहा है और इसके पीछे उसकी क्या मजबूरी है ?

बीआरडी मेडिकल कालेज की सीनियर क्लर्क विमी मंजुला सैमुअल को लापरवाही का आरोप लगाते हुए 10 अगस्त को सस्पेंड कर दिया गया है। उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने वर्ष 2018 में आरटीआई पटल पर तैनाती के दौरान सूचना देने में लापरवाही बरती और सूचना में सही तथ्य नहीं दिए।

यह एक अजीब संयोग है कि सीनियर क्लर्क विमी मंजुला सैमुअल के खिलाफ कार्रवाई आक्सीजन हादसे की चौथी बरसी पर की गई।

जिस आरटीआई सूचना के बारे में बात की जा रही है , वह बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के निलंबित असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ कफील खान के बारे में है।
स्थानीय समाचार पत्रों में प्रिंसिपल डाॅ. गणेश कुमार ने बताया कि लिपिक ने आरटीआई के नोडल अधिकारी के सहमति के बगैर ही सूचना डॉ. कफील खान को दे दी। सूचना में सही तथ्य भी नहीं दिए गए जिसका फायदा उन्हें अदालत में हुआ। ऐसे में इस मामले की जांच में दोषी पाए जाने के बाद महिला लिपिक को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है। साथ ही उसके खिलाफ विभागीय जांच के भी आदेश दिए गए हैं।

अपने निलम्बन के बारे में पूछे जाने पर विमी मंजूला सैमुअल ने कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे मीडिया में इस बारे में बात नहीं करेंगी।

इस बारे में जानकारी लेने के लिए जब गोरखपुर न्यूज लाइन ने बीआरडी मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल डाॅ गणेश कुमार से सम्पर्क किया जो उन्होंने फोन नहीं उठाया।

आरटीआई आवेदन के बारे में दी गई जिस सूचना का जिक्र हो रहा है वह करीब तीन वर्ष पुराना है और यह प्रकरण डाॅ कफील खान के एईएस और 100 बेड के इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी होने से सम्बन्धित थी। इस बारे में सभी दस्तावेज गोरखपुर न्यूज लाइन के पास है।

बीआरडी मेडिकल कालेज के आक्सीजन हादसे में बाल रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ कफील खान को इंसेफेलाइटिस वार्ड का प्रभारी बताते हुए उन पर कई आरोप लगाकर निलम्बित कर दिया गया था। उनके खिलाफ केस दर्ज कर उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया। उन्हें करीब सात महीने जेल में रहना पड़ा।

डाॅ कफील खान का कहना था कि वे इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी थे ही नहीं। उन्हें फंसाने के लिए इंसेफेलाइटिस वार्ड का प्रभारी बताया जा रहा है।

लखनऊ के एडवोकेट रहमत उल्लाह ने वर्ष 15 जून 2018 में बीआरडी मेडिकल कालेज के जनसूचना अधिकारी से जानकारी मांगी कि इंसेफेलाइटिस वार्ड का प्रभारी किसको बनाया गया था। इस बारे में बीआरडी मेडिकल कालेज ने उन्हें सूचना नहीं दी। प्रथम अपील पर भी जब उन्हें सूचना नहीं मिली तो उन्होंने सूचना आयोग में अपील की। राज्य सूचना आयोग ने सुनवाई करने के बाद सूचना देने का निर्देश दिया तब बीआरडी मेडिकल कालेज ने 2 जुलाई 2018 को सूचना दी। इस सूचना में जानकारी दी गई कि ‘ दिनांक 11.05.2016 द्वारा डा0 भूपेन्द्र शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर बाल रोग विभाग को एईएस का और 100 नम्बर वार्ड का प्रभारी बनाया गया। ‘

बीआरडी मेडिकल कालेज ने आरटीआई से मांगी गई इस जानकारी को सूचना आयोग में अपील के बाद दिया था। आवेदक को दी गई सूचना पर बीआरडी मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य डा. गणेश कुमार का भी हस्ताक्षर है।

आश्चर्य है कि बीआरडी मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य डाॅ गणेश कुमार तीन वर्ष बाद इस सूचना को दिए जाने में सही तथ्य नहीं होेने की बात कर रहे हैं जबकि सूचना दिए जाने वाले कागजात पर उनका हस्ताक्षर हैं। सवाल उठता है कि क्या उन्होंने बीआरडी प्रशासन बिना देखे-पढ़े दी जा रही सूचना पर हस्ताक्षर कर दिया था ? किस कारण या दबाव से अब वे इससे मुकर रहे हैं और सारी जिम्मेदारी एक महिला लिपिक पर डाली जा रही है।

इस मामले में पड़ताल से जो जानकारी उभर कर सामने आयी है, उसके डाॅ कफील खान को खिलाफ आक्सीजन हादसे में कार्रवाई का सबसे बड़ा आधार यह बनाया गया था कि वे एईएस और 100 बेड के इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी थे और बतौर इस जिम्मेदारी उन्होंने अपने कर्तव्य पालन में लापरवाही बरती। डाॅ कफील खान शुरू से यह बात कहते रहे कि वह अपने विभाग में सबसे जूनियर हैं। एईएस और इंसेफेलाइटिस वार्ड का प्रभारी एसोसिएट प्रोफेसर को ही बनाया जा सकता है। उन्हें कभी यह जिम्मेदारी नहीं दी गई। आरटीआई से मिली जानकारी में भी बीआरडी मेडिकल कालेज ने यही सूचना दी कि एईएस और 100 बेड के प्रभारी एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ भूपेन्द्र शर्मा थे। इस जानकारी को उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अपने खिलाफ चल रही विभागीय जांच में भी प्रस्तुत किया।

डॉ कफील खान पर विभागीय जांच में चार आरोप लगाए गए थे जिसमें से दो उनके प्राइवेट प्रैक्टिस से सम्बन्धित थे जबकि दो आक्सीजन कांड से जुड़े हुए थे। सबसे गंभीर आरोप  आरोप संख्या-3 यह था कि बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग में बच्चों की आकस्मिक मौत की घटना के समय वह मौजूद थे और वे 100 बेड एईएस वार्ड के नोडल प्रभारी थे। उन्होंने जीवन रक्षक आक्सीजन की कमी जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम को तत्काल उच्चाधिकारियों से अवगत नहीं कराया जो उनकी मेडिकल निग्लीजेंस का परिचायक है। इस आरोप में यह भी जोड़ा गया था कि डॉ कफील की तत्कालीन प्राचार्य डा राजीव मिश्र से दुरभिसंधि थी जिसके कारण उन्होंने कदाचार करते हुए शासकीय नियमों का उल्लंघन किया।

इस आरोप के साक्ष्य के बतौर जांच अधिकारी को महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण डॉ केके गुप्ता की जांच आख्या और उप्र सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 की नियम 3 की प्रति उपलब्ध करायी गई थी।

डॉ कफील ने इन आरापों के जवाब में जांच अधिकारी को साक्ष्य दिया कि वह 100 बेड के एईएस वार्ड के नोडल अधिकारी कभी थे ही नहीं। यह कार्यभार बाल रोग विभाग के सह आचार्य डा भूपेन्द्र शर्मा के पास था। डॉ कफील ने यह भी बताया कि मेडिकल कालेज में लिक्विड आक्सीजन के रख-रखाव, टेण्डर, भुगतान, आर्डर सप्लाई और प्रबंध में उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी।

जांच आधिकारी हिमाशु कुमार ने आरोप संख्या तीन का विश्लेषण करते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि महानिदेशक की जांच आख्या में कहीं भी प्रश्नगत आरोप के सम्बन्ध में कोई टिप्पणी नहीं की गई है। इस आरोप के सम्बन्ध में न तो कोई जांच की गई है और न ही उनकी जांच रिपोर्ट में इस तरह के आरोप का कोई उल्लेख है।

जांच अधिकारी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि आरोप संख्या 3 के सम्बन्ध में विभाग द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य बलहीन एवं असंगत हैं। इस सम्बन्ध में आरोपी अधिकारी द्वारा दिया गया उत्तर ग्राह्य प्रतीत होता है। यह आरोप आरोपी अधिकारी पर सिद्ध नहीं पाया जाता है।

डॉ कफील पर यह आरोप लगाया गया था कि वह 100 बेड एईएस वार्ड के नोडल अधिकारी थे। बाल रोग विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में दी जाने वाली सुविधाओंए उपचार तथा स्टाफ के प्रबंधन आदि का सम्पूर्ण उत्तर दायित्व उनका था परन्तु उनका आचरण अनुत्तरदायित्वपूर्ण था। उन्होंने अपने शासकीय कर्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वहन नहीं किया और न ही अधीनस्थों पर समुचित नियंत्रण रखा। यह अपकृत्य कदाचार उत्तर प्रदेश कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 के नियम 3 (1) का उल्लंघन है।

जांच अधिकारी ने इस आरोप को भी खारिज कर दिया हैण् उन्होंने लिखा है कि आरोप की पुष्टि में दिए गए साक्ष्य अपर्याप्त और असंगत हैं। यह आरोप आरोपी अधिकारी पर सिद्ध नहीं पाया जाता है।

आरोप संख्या एक और दो डॉ कफील खान के प्राइवेट प्रैक्टिस से सम्बन्धित थे। आरोप संख्या एक में डॉ कफील पर बीआरडी मेडिकल कालेज में बाल रोग विभाग में सीनियर रेजीडेंट और बाद में प्रवक्ता पद पर रहते प्राइवेट प्रैक्टिस जारी रखने का आरोप लगाया गया था। आरोप संख्या दो में डॉ कफील पर नियम विरूद्ध निजी नर्सिंग होम संचालित करने, प्राइवेट प्रैक्टिस करते हुए बीआरडी मेडिकल कालेज में राजकीय चिकित्सक के रूप में कार्य करने का आरोप लगाया गया था।

डॉ कफील बीआरडी मेडिकल कालेज में 23-05-2013 को बाल रोग विभाग में सीनियर रेजीडेंट नियुक्त हुए थे। बाद में वह लोक सेवा आयोग से 03.08.2016 को वह बाल रोग विभाग में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुए और आक्सीजन कांड के समय इसी पर पर कार्य कर रहे थे।

दरअसल डाॅ कफील खान के निलम्बन मामले में हाईकोर्ट में चल रहे केस में शासन को कोई जवाब देते नहीं बन रहा है कि चार वर्ष से उन्हें क्यों निलम्बित रखा गया है ? डाॅ कफील खान के निलम्बन का सबसे बड़ा आधार जिस बुनियाद पर खड़ा किया गया था कि वह एईएस व 100 बेड के इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी थे, वह बीआरडी मेडिकल प्रशासन ने आरटीआई सूचना में खुद ही खारिज कर दिया। निलम्बन का काई औचित्य साबित करना मुश्किल हो रहा है। इसलिए अब बीआरडी मेडिकल कालेज प्रशासन तीन वर्ष पहले खुद अपनी सूचना को ही झूठा साबित करने पर तुल गया है। महिला क्लर्क के निलम्बन की कार्यवाही उसी दिशा में की गई कार्यवाही है।

About the author

मनोज कुमार सिंह

मनोज कुमार सिंह गोरखपुर न्यूज़ लाइन के संपादक हैं

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