जय प्रकाश नारायण
बात 2002 या 2003 3 की है। मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। सरकार के फैसले के अनुसार अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण लड़कियों को साइकिल वितरण का अभियान चल रहा था। साइकिल वितरण का कार्यक्रम जनता दरबार के नाम से बड़े समारोह के तहत आयोजित होता था। जिसमें जिले के आला अधिकारी भाग लेते थे। जिस तहसील या ब्लॉक में यह कार्यक्रम आयोजित होता था। वहां विभिन्न विभागों के सरकारी प्रतिनिधि मौजूद रहा करते थे।
ऐसा ही कार्यक्रम निजामाबाद तहसील के तहबरपुर ब्लाक पर था। इसकी जानकारी मिलने पर भाकपा ( माले ) ने समानांतर जनता संसद लगाने का फैसला किया जिसको सफल बनाने के लिए ब्लॉक के विभिन्न गांवों में प्रचार चलाया गया। प्रचार की दिशा थी कि लोग आप भारी तादात में जनता संसद में भाग ले, अपनी समस्याओं को रखें और इन्हें जनता संसद में पास कर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के समक्ष पार्टी की तरफ से सौंपा जाएगा।
इस घोषणा से वातावरण तनावपूर्ण हो गया था। ब्लॉक के गेट के ठीक सामने ही हम लोगों ने जनता सांसद आयोजित करने का ऐलान किया था। तत्कालीन निजामाबाद के एसडीएम ने हमारे परिचित एक वकील से कहा कि आज आपके कामरेड को सबक सिखाया जाएगा। इसके पहले निजामाबाद तहसील और कोयलसा ब्लॉक पर इस तरह का आयोजन हो चुका था जिससे प्रशासन थोड़ा असहज हो गया था। यह सूचना मुझे कार्यक्रम शुरू होने के पहले मिल चुकी थी।
खैर ,हम लोग 10 बजे से पहले ही ब्लॉक पर पहुंच गए। ढाई सौ से ज्यादा महिला पुरुष और पार्टी के कार्यकर्ता इकट्ठा हो चुके थे। ब्लॉक के अंदर भी हजारों की तादात में लड़कियां और उनके अभिभावक आए थे। वे उत्सुकता बस हमारे कार्यक्रम में आते और हमारी मीटिंग सुनते। बहुत ही दिलचस्प नजारा था। जनता के सवाल एक-एक कर जन संसद में पेश हुए और उसे संसद द्वारा पारित कराया गया । एक बजे तक डेढ़ सौ से ज्यादा जन समस्याएं इकट्ठा हो चुकी थी। जिसे हमारे प्रतिनिधियों द्वारा डेड बजे अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों को सौंपा जाना था।
जन संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने लगी तो मैं थोड़ा सहज गया। इसके बाद मैं बगल की चाय की दुकान पर गया। वहां कई परिचित आ गए और कार्यक्रम को लेकर बातें होने लगी। इस तरह का कार्यक्रम तहबरपुर ब्लाक पर पहली बार हो रहा था । इसलिए लोगों में खास तरह की उत्सुकता थी।

इस दौरान मैंने देखा कि एक औसत कद के सज्जन हमारी मीटिंग को बहुत गौर से सुन रहे थे और उनके चेहरे पर खुशी दिखाई दे रही थी । वह चेहरा मुझे अपरिचित सा लगा था जिससे मेरा ध्यान कई बार जा चुका था। स्थानीय इंटेलिजेंस के लोग तो बार-बार मिल ही रहे थे।
चाय की दुकान पर वही सज्जन मेरे करीब आकर खड़े हो गए। ज्योंहि मैं अकेला हुआ वे मेरे करीब आए और लाल सलाम किया। मैंने भी लाल सलाम से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम बहुत अच्छा है। मुझे खुशी हो रही है। साथ ही उन्होंने बताया कि वह निजामाबाद तहसील में आपूर्ति निरीक्षक हैं। जनता दरबार में आपूर्ति विभाग की ओर से भाग लेने आए हैं। मेरा नाम अरुण प्रकाश पाठक है।
थोड़ी ही देर में घनिष्ठता हो गई। गोरखपुर यूनिवर्सिटी के जमाने के साथियों कुलदीप नाथ शुक्ला, गुरु प्रसाद पांडे, रामेश्वर पांडेय आदि का परिचय दिया। वे छात्र जीवन में पार्टी के साथ रहे चुके थे।
उन्होंने वही मुझे अपना नंबर और पता दिया और कहा कि अखबारों में आपका नाम देख रहा था। कई महीने से प्रयास कर रहा था। आज आपसे मिलने का मौका मिला है। बस क्या था कुछ ही दिनों में हमारे बीच में घनिष्ठता और आत्मीयता हो गई । वह मेरे सबसे करीबी सहयोगी कामरेड बन गए। कई बुरे वक्त में वह मेरे और पार्टी के बड़े मददगार बने। थोड़े दिनों में ही वे पार्टी के साथियों में लोकप्रिय हो गए।
इस मुलाकात के बाद करीब पाँच साल तक वह सेवा में रहे और पार्टी के सहयोगी की भूमिका निभाते रहे। सेवानिवृत्ति के बाद मैंने उन्हें गोरखपुर के साथियों का पता दिया। गोरखपुर वापस लौटने के बाद वे पार्टी के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ गए।
गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के दौरान हमारी उनसे मुलाकात हुई। गोरखपुर जाने पर उनसे मुलाकात होती रहती थी। वही आत्मीयता, लगाव और सहयोग की प्रवृत्ति उन में बाद में भी कायम रही। एक बार जिद करके वह अपने घर ले गए। उनका मुस्कुराता हुआ हंसमुख विनोदी चेहरा देखकर कोई यह नहीं समझ सकता था कि उनके पीछे कितने बड़ी पीड़ा भरी जिम्मेदारी हैं ।वे मूलत: देवरिया के रहने वाले थे। उनके पिता जी गोरखपुर में आकर बस गए थे।
खपरैल का पैतृक मकान था। जहां वह पत्नी और जन्मजात मूक बधिर बेटे के साथ रह रहे थे। संबंधों के लंबे समय के बावजूद भी कभी उन्होंने अपनी समस्या के बारे में चर्चा तक नहीं की। घर पर ही उन्होंने पारिवारिक परिस्थितियों के बारे में बताया। मैंने पहली बार बेटे के भविष्य की चिंता उनके चेहरे सघन रूप से देखी थी। कुछ समय के लिए मैं भी उदास हो गया था।
कोरोना के बाद उनसे मिलने का मौका नहीं मिला लेकिन साथियों से उनके के बारे में पूछ लिया करता था। ठीक है यह जानकर संतुष्ट हो लेता था लेकिन मन में एक टीस तो बनी ही रहती थी।
चार जुलाई को उरई जाते हुए सुबह ट्रेन में ही मैंने जब फेसबुक पर उनके न रहने की खबर देखी। तो रास्ते भर उदास रहा। उनका हंसमुख प्रसन्न चेहरा तथा अन्य स्मृतियां ताजा हो गई । 70 के दशक के साथियों के एक-एक करके बिछुड़ने की पीड़ा और ज्यादा सघन हो गई ।
उदारीकरण के बाद भारतीय समाज में हुए बदलाव के इस दौर में अरुण प्रकाश पाठक जैसे कामरेड साथी मित्र और सहयोगियों का मिलना बहुत कठिन है और दुर्लभ है।
साथी अरुण प्रकाश पाठक आपको मेरा आखिरी क्रांतिकारी सलाम ।अलविदा साथी।
(जयप्रकाश नारायण मार्क्सवादी चिंतक तथा अखिल भारतीय किसान महासभा की उत्तर प्रदेश इकाई के प्रांतीय अध्यक्ष हैं)
