गोरखपुर। ‘ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में फासीवाद का खतरा बढ़ रहा है। आज अपने देश में लोकतंत्र का जो संकट उत्पन्न हुआ है, वह लोभ लाभ की राजनीतिक संस्कृति की अनिवार्य परिणति है जिसके प्रति कवि मुक्तिबोध ने बहुत पहले चेताया था। संसदीय लोकतंत्र पूंजीपति के अपने अन्तर्विरोध को सुलझाने की एक व्यवस्था है लेकिन यह बढ़ता अन्तर्विरोध हर समय सुलझाए भी नहीं जा सकते। ऐसी स्थिति में पूंजीवादी लोकतंत्र अपने ही पैदा किए गए मूल्यों, जनता के अधिकारों का गला घोंटना शुरू कर देता है। विपक्ष का दमन करने लगता है। आने वाला समय और खौफनाक हो सकता है जिसका सामना करने के लिए हमें बड़ी तैयारी की जरूरत है। ‘
यह बातें समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने जन संस्कृति मंच की गोरखपुर इकाई द्वारा आज अपरान्ह गोरखपुर जनर्लिस्ट्स प्रेस क्लब में आयोजित ‘ लोकतंत्र की चुनौतियां ‘ विषयक संवाद कार्यक्रम में कही।
संवाद कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रामजी राय ने कहा कि भारत का फासीवाद अपनी खास विशेषता लिए हुए है। उसने सामाजिक न्याय और हर नए आंदोलन का अगुवा बनने वाले ताकतों को पराजित करने के लिए हर तरह के हथियार का इस्तेमाल किया है। आज विपक्ष और क्रांतिकारी वामपंथ को विचार करने की जरूरत है कि यह दुर्घटना कैसे घटी। आजादी के बाद समाज सुधार के किसी बड़े एजेंडे को सामने न ला पाना भी इसका कारण हो सकता है। फासीवाद का मुकाबला बड़े परिवर्तनकारी आंदोलन से ही हो सकता है। यह केवल एक पार्टी नहीं कर सकती बल्कि तमाम तरह के आंदोलनों और संघर्षों को मिलकर यह लड़ाई लड़नी होगी।

बातचीत की शुरूआत करते हुए दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर राजेश मल्ल ने कहा कि आज लोकतंत्र की सभी मूल अवधाराणाओं पर प्रहार हो रहा है। लोकतंत्र अधिकतम प्रतिनिधित्व और अधिकतम भागीदारी देता है लेकिन आज अल्पमत, बहुमत पर हावी हो गया गया है। विधायिका से लेकर कार्यपालिका और हर तरह की संस्थाओं की चयन प्रक्रिया को पूरी तहर हड़प लिया गया है और इन पर एक विचारधारा का वर्चस्व कायम किया जा रहा है। सामाजिक न्याय की अनदेखी की जा रही है और एसआईआर की प्रक्रिया द्वारा अल्पसंख्यकों में खौफ पैदा किया जा रहा है।
दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो चन्द्रभूषण अंकुर ने उच्च शैक्षिक संस्थानों में लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को खत्म करने और पूरी राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल, बाहुबल के वर्चस्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के हुक्मरान जनता के मताधिकार को व्यापक बनाने के बजाय उसे सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं।
दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो अनिल राय ने कहा कि आज लोकतंत्र पर जो खतरा मंडरा रहा है वह पिछले सात दशक की पूंजीवादी समाज के विकास की अनिवार्य परिणाम है। हमें लोकतंत्र के इससे भी अधिक खराब और विद्रूप संस्करण के लिए तैयार रहना चाहिए। आज सत्ता हमारे जीवन को पूरी तरह नियंत्रित कर रहा है। इस स्थिति में हमें असली शत्रु की पहचान करनी होगी और इसके खिलाफ संघर्ष में अपनी भूमिका खोजनी होगी। उन्होंने जन प्रबोधन का क्रांतिकारी अभियान संचालित करने पर बल दिया।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने मीडिया की भूमिका, बेनिफिशरी स्कीम के जरिए जनता का समर्थन हासिल करने के प्रयास, ज्ञान-विज्ञान के संस्थानों के प्रोपेगेंडा प्रचार के लिए इस्तेमाल, असहमति के विचारों को दबाने, नागरिकों के उपर बढ़ते सर्विलांस सहित कई मुद्दों पर सवाल रखे जिसका जवाब वक्ताओं ने दिया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि देवेन्द्र आर्य, प्रो गौरहरि बेहरा, राजेश सिंह, अब्दुल्लाह सिराज, समीना अहमद, अशोक चौधरी, अलख निरंजन, दिवाकर गुप्ता, सर्वत जमाल, डाॅ रामनरेश, रिंकी प्रजापति, भाष्कर चौधरी, निखिल पांडेय, सुबुर अहमद, राजेश साहनी, राकेश सिंह, आरके सिंह, विनय करूण, रामलौट, संजय श्रीवास्तव, संतोष श्रीवास्तव, जय प्रकाश यादव, अबुलैस अंसारी, अख्तर अली सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
