साहित्य - संस्कृति

युवा कवि पराग पावन को पहला रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ जन संस्कृति सम्मान

लखनऊ। हिंदी के युवा कवि पराग पावन को पहला रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ जन संस्कृति सम्मान प्रदान किया गया। रविवार को लखनऊ के कैफ़ी आज़मी एकेडमी सभागार में आयोजित समारोह में उन्हें शाल, सम्मानपत्र और 21 हजार रुपए की धनराशि भेंट करके सम्मानित किया गया। कहानीकार शिवमूर्ति, आलोचक रामजी राय व प्रणय कृष्ण, कवि कौशल किशोर व कवि रूपम मिश्र,  अनुपम सिंह, मृत्युंजय की उपस्थिति में उन्हें यह सम्मान मिला।

कार्यक्रम की शुरुआत डीपी सोनी बंटू और अंकुर द्वारा प्रस्तुत निराला की कविता ‘गहन है यह अंधकारा’ से हुई। इसके बाद कवि व जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर का स्वागत वक्तव्य हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि विद्रोही कविताएं लिखते नहीं थे, बल्कि वे सीधे उनके हृदय से उपजती थीं। उन्हें अपनी हर कविता याद थी। कविता जीवन मांगती है और उन्होंने गोरख की तरह पूरा जीवन दिया भी। उनकी कविताएं जन-प्रतिरोध और वर्ग-चेतना की कविताएं हैं। विद्रोही की कविताओं में करुणा और आक्रोश का चरम रूप देखने को मिलता है। विद्रोही की परंपरा की तलाश में पराग पावन को सम्मान के लिए चुना गया है।

 

सम्मानपत्र पढ़ते हुए रूपम मिश्र ने कहा कि पराग पावन की कविताएं हमारे समय की जटिलताओं, जनपक्षधरता, प्रतिरोध की परंपरा और मानवीय जीवन की सुंदर संभावनाओं को संवेदनशीलता, वैचारिक स्पष्टता और रचनात्मक प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त करती हैं। उनकी रचनाओं में समकालीन समाज के भय, घृणा, उन्माद और असमानताओं के विरुद्ध निर्भीक स्वर के साथ-साथ प्रेम, करुणा और मनुष्यता के पक्ष में अडिग आस्था दिखायी देती है। उनकी कविताएं न केवल वर्तमान समय को दर्ज करती हैं बल्कि बदलाव की उम्मीदों को भी सहेजती हैं।

सम्मान ग्रहण करने के बाद पराग ने कहा कि यह सम्मान मुझ अकेले को नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों को मिला है जिन्होंने अंधेरे में दीपक की लौ संभाल रखी है। उन्होंने अपनी कुछ कविताओं का भी पाठ किया जिनमें ‘चूल्हे की राख’, ‘एक आवाज आती है’, और बेरोजगारी शृंखला की कविताएं शामिल हैं।

इसके बाद ‘समकालीन कविता में प्रतिरोध की परंपरा’ पर परिचर्चा शुरू हुई, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में मृत्युंजय ने कहा कि विभिन्न सत्ताओं की पहचान करना और उनसे सवाल पूछना, प्रतिरोध की परंपरा के केंद्र में रहा है। यह परंपरा हमारे इतिहास-बोध में धंसी हुई है, चाहे हम 1857 के पहले राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष का उदाहरण लें या उससे भी पहले के आदिवासी विद्रोहों का। इसके बाद के दौर की बात करें तो तेभागा, तेलंगाना और नक्सलबाड़ी ने उस समय की कविता को एक अलग स्वर दिया। शीतयुद्ध के दौरान पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ मजबूत स्वर देखने को मिला। अगर हम 1990 से लगभग 35 साल के समय की कविता को समकालीन कविता मानें तो इसे भूमंडलीकरण, मंडल और कमंडल ने आकार दिया। इसके बाद भूमंडलीकरण के सह-उत्पाद के रूप में आये तकनीक के तेज विकास की भूमिका रही। चाहत और ‘न पाने’ के बीच ऐसी खाई कभी नहीं रही। असमानता के पहाड़ खड़े हो रहे हैं। थ्रीजी के आगमन के साथ इंटरनेट-क्रांति पर सवार होकर ऐसी बहुत सी आवाजें निकल कर आयीं जिन्हें संपादकों, आलोचकों, प्रकाशकों ने बाहर कर रखा था। इसी के साथ अस्मितावादी विमर्शों ने जोर पकड़ा। उन्होंने आगाह किया कि अगर अस्मिता केवल कुछ पा लेने की जुगत में लगी रहेगी, तो वह अंतत: प्रतिगामी ताकतों के काम आयेगी।

कवि अनुपम सिंह ने कहा कि एक दशक पहले जेएनयू में पराग पावन को पहली बार सुना, वहीं पहली बार विद्रोही को भी देखा। दोनों अवध से हैं और उन्हें जोड़ने वाला एक धागा यह भी है। ‘अलविदा तुलसीदास’ के जरिये पराग पावन स्थापित करते हैं कि परंपरा का मूल्यांकन कितना जरूरी है। हाशिये के विमर्श, जिसमें दलित, आदिवासी, स्त्री विमर्श शामिल हैं, परंपरा का मूल्यांकन कर रहे हैं। पराग पावन की कविता ‘महिषासुर का संधि-पत्र’ में महिषासुर दुर्गा से पूछता है कि मेरे सीन में धंसा त्रिशूल किसका है। वह गहन मानवीय संवेदनाओं के कवि भी हैं, ‘पंजे भर जमीन’और ‘वासना का चंद्रोदय’ जैसी कविताएं इसका उदाहरण हैं।

कवि रूपम मिश्र ने कहा कि पराग पावन इस बीहड़ समय में मनुष्य पर मनुष्य के भरोसे के कवि हैं। इसी भरोसे के बूते वह ‘कितना पानी है काफलपानी में’ सवाल करते हैं – ‘मुझे जाना है तुम्हारे गांव/ क्या तुम्हारे गांव में मुझे घुसने देंगे लोग/ क्या तुम इसके खिलाफ कोई कविता नहीं लिखोगे?’ उनकी कविताएं मनुष्य में यह भरोसा पैदा करती हैं कि जब आततायी मनुष्यता को लहूलुहान करेंगे तो कई प्रतिरोध में उठ खड़ा होगा। ‘मैं नहीं ढोऊंगा तुम्हारे गेहूं का बोझ’ तो प्रतिरोध का सीधा उद्घोष है। उनकी कविताएं जनता के लिए काम आने वाली कविताएं हैं।

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे आलोचक प्रणय कृष्ण ने कहा कि उस दौर में जेएनयू में कई अच्छे कवि थे लेकिन छात्रों के बीच सबसे ज्यादा गोरख पांडे और विद्रोही सुने जाते थे। विद्रोही 1983 के छात्र आंदोलन में जेएनयू से निकाले गये, लेकिन उन्होंने जेएनयू छोड़ने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके लिए कोई तो एक जगह है। मेरे लिए खुशी की बात है कि जिसकी स्मृति में यह पुरस्कार है और जिसे दिया जा रहा है दोनों जेएनयू की परंपरा से जुड़े हैं।

मार्क्सवादी आलोचक व जनमत के संपादक रामजी राय ने कहा कि विद्रोही की कम-से-कम एक कविता ‘मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से’ विश्व पटल पर जाने लायक है। गोरख की तरह ही विद्रोही की कविताओं में स्त्रियां बार-बार आती हैं। बंधन की कितनी परतें हैं, यह सबसे अच्छे तरीके से स्त्रियां और मेहनतकश ही जानते हैं। आज मुक्ति, न्याय, मनुष्यता के लिए एक बड़ी लड़ाई का जिम्मा साहित्य को उठाना होगा।

कार्यक्रम का संचालन जसम के राज्य सचिव राम नरेश राम ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यकर्ता नगीना निशा ने किया।

जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह ने अभी देश में चल रहे मजदूर आंदोलनों के समर्थन में और आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं के दमन के विरोध में एक प्रस्ताव पेश किया।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने हाथ उठाकर इसे पारित किया और मजदूरों के हक सुनिश्चित करने की मांग की। इस सफल आयोजन में जसम लखनऊ इकाई के सचिव फरजाना मेहदी व अन्य साथियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। शुरुआत में डी पी सोनी और अंकुर ने निराला की कविता ‘गहन है अंधकारा’ का सस्वर पाठ किया।