साहित्य - संस्कृति

‘अजय कुमार का पूरा लेखन एक वृहत सांस्कृतिक आंदोलन है ’

स्मृति दिवस पर अजय कुमार की किताब  ‘ राग जौनपुरी ‘ पर चर्चा

जौनपुर। कवि, लेखक, चित्रकार, अनुवादक अजय कुमार के पहले स्मृति दिवस पर हिंदी भवन, जौनपुर में ‘राग जौनपुरी‘ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। दो सत्रों में हुए इस कार्यक्रम में अजय कुमार की किताब ‘राग जौनपुरी ‘ पर परिचर्चा के साथ-साथ कवि सम्मेलन-मुशायरा हुआ।

हिंदी भवन और जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के पहले सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो अवधेश प्रधान ने कहा कि अजय कुमार पूरे जीवन जौनपुर को ही पढ़ते और लिखते रहे। ‘राग जौनपुरी ‘ एक साहित्यकार द्वारा लिखी किताब है जिसमें जनता का इतिहास है। यह किताब जन इतिहासकार की दृष्टिकोण से लिखी गई है। इसलिए इसमें जनजीवन, जनकला, संगीत, लोक साहित्य सब समाये हुए हैं। इस किताब में घर-गांव का इतिहास है। अपने देश को जानने-समझने का प्रयास है , जन संस्कृति को विकसित करने का प्रयास है। प्रो प्रधान ने कहा कि अजय कुमार का पूरा लेखन एक वृहत सांस्कृतिक आंदोलन है। उन्होंने हिंदी-उर्दू को एक साथ लाने का मंच बनाया। उनकी स्मृति हमें शक्ति और प्रेरणा देती है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रणय कृष्ण ने कहा कि अजय कुमार एक दरख़्त की तरह है जिन्होंने जौनपुर की संस्कृति ने जितने फल उगाए हैं उसकी ड्राफ्टिंग की है। उनमें इतिहास दृष्टि भी है और भविष्य दृष्टि भी। इस किताब में अजय जी का कवित्व खूब दिखता है। इतिहास में बहुस्तरीय वास्तविकता होती है जिसमें इतिहासकार को जाना पड़ता है। अजय कुमार ने इसे बखूबी निभाया है। जौनपुर की सूफियाना और सधुक्कड़ी संस्कृति से ओतप्रोत यह किताब प्रेरणादायी किताब बनकर निकलती है।

 

वरिष्ठ कवि व जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि इस किताब में जौनपुर के इतिहास का चार दौर है। शर्की काल से लेकर वर्तमान का दौर इसमें है। जौनपुर साझापन, साझी संस्कृति और एकता का मॉडल है। यह किताब उसी का जीवंत दस्तावेज है। कवि विद्यापति ने ‘कीर्तिलता’ में जिस ‘मिलल बास’ की संस्कृति को देखते व वर्णन करते हैं, तमाम घात-प्रतिघात के बाद भी जौनपुर ने उसे संजोए रखा है। यह किताब उस पर विशेष चर्चा करती है। उन्होंने वामिक जौनपुरी और अजय कुमार की मित्रता का जिक्र करते ही कहा कि जौनपुर में दोनों की दोस्ती प्रगतिशील आंदोलन और नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा का सम्मिलन भी है।

किताब पर चर्चा की शुरुआत करते हुए युवा कवि-आलोचक आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि जौनपुर शहर के अनन्य नागरिक, कवि-पत्रकार-संस्कृतिकर्मी अजय कुमार की आख़िरी किताब ‘राग जौनपुरी’ ही हो सकती थी। जीवन भर जो राग गाया-बजाया, जाते-जाते अजय जी उसे हम सबके सुपुर्द कर गए। जौनपुर पर केंद्रित कथेतर गद्य विधा की इस किताब की शैली कथात्मक है। यह कथात्मकता ही वह धागा है जिसने अलग-अलग विषयों पर केंद्रित आलेखों को एक किताब में जिल्दबंद किया है। जौनपुर का इतिहास, कला-संस्कृति, संगीत, साहित्य, शिक्षा, सामाजिक शख़्सियतें वग़ैरह कुछ डोमेन हैं, जिनके आसपास रहते हुए लेखक ने इस किताब का ताना-बाना बुना है।

जाने माने पत्रकार और अनुवादक प्रभात कुमार ने कहा कि शहरों पर लिखी गई किताबों से ‘ राग जौनपुरी ‘ इस मायने में अलग है कि इसमें जनसाधारण की अपने शहर को देखने समझने का नजरिया है। किताब की भाषा
बोलचाल की भाषा है। उन्होंने किताब में लोकसंगीत के पक्ष को विशेष रूप से रेखांकित किया और कहा कि इस पर और ज़्यादा और बार-बार बातचीत होनी चाहिए।

दिल्ली से ऑनलाइन जुड़ीं इतिहासकार कनिका सिंह ने आकस्मिक इतिहास और पॉपुलर इतिहास लेखन और उसकी खासियतों की चर्चा करते हुए कहा कि ‘राग जौनपुरी ‘ दोनों की जुगलबंदी है। इस किताब में तथ्य हैं, आलोचनात्मक विवेक व लोकतांत्रिकता है। इसमें सामाजिक संबंधों की जटिलता भी है और परेशान करने वाले घटनाओं व तथ्यों से बचा नहीं गया है। इस किताब में अतीत को देखने की दृष्टि है तो भविष्य को देखने के प्रति भी दृष्टि है।

‘ सिराज-ए -दिल जौनपुर ‘ के लेखक आईपीएस अधिकारी अमित श्रीवास्तव ने कहा कि शर्की शासन में जौनपुर की विद्वता की जो पहचान बनी उसी का बाद में विकास साहित्य में हुआ। जौनपुर का साहित्यिक विकास दिल्ली और लखनऊ की साहित्य-संस्कृति से मिलकर बनी जिसे मैं रंगीन सादगी कहता हूँ। अजय कुमार के लेखन में यह रंगीन सादगी साफ़ तौर पर दिखती है। उनकी आम जौनपुरिया की भाषा है।

वाराणसी से आए ट्रेड यूनियन लीडर एवं लेखक वी के सिंह ने अजय कुमार की याद साझा करते हुए कहा कि वे सूफी सरीखे थे। उन्होंने अपने जीवन और वृहद कार्य के ज़रिए यही बताने का काम किया कि यह दुनिया साधारण लोगों से बनी है और वे ही इसे टिकाए हुए हैं। आने वाले जमाने के लिए वे रोशन किताब की तरह हैं जिनसे नजर नहीं बचाया जा सकता।

वरिष्ठ शायर और अजय कुमार के अभिन्न मित्र अहमद निसार ने कहा कि ‘ राग जौनपुरी’ में कई सदियों की कहानी कह दी है। बीएचयू के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो वशिष्ठ अनूप ने अजय कुमार के साथ यादें साझा की। इस सत्र का संचालन ‘समकालीन जनमत’ के संपादक के के पाण्डेय ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत में डीपी सोनी बंटू और अंकुर ने वामिक जौनपुरी की रचना ‘ यकीं से काम लो .. ‘ को गाकर सुनाया।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी से आए कवि-कवयित्रियों के साथ जौनपुर के कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। शुरुआत में डॉ प्रतीक मिश्र ने अजय कुमार के संग्रह ‘नया बीजक’ से दो कविताएं सुनाईं। इस मौके पर कौशल किशोर, रूपम मिश्र, विमल किशोर, अहमद निसार, इबरत मछली शहरी, धीरेन्द्र पटेल, प्रतिमा मौर्य, अहमद हफीज, आलम ग़ाज़ीपुरी, विभा तिवारी, अजय विक्रम सिंह, आरपी सोनकर,असीम मछलीशहरी, मोनिस जौनपुरी, प्रमोद वाचस्पति, रामजीत मिश्र, प्रतीक मिश्र, अमृत प्रकाश आदि ने कविता पाठ किया। कवि सम्मेलन और मुशायरा का संचालन वरिष्ठ कवि धीरेन्द्र पटेल ने किया। हिन्दी भवन के अध्यक्ष अपल के धन्यवाद ज्ञापन से कार्यक्रम का समापन हुआ।

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