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स्वतंत्रता संग्राम के महातीर्थ ‘ महुआ डाबर ’ को कब मिलेगी पहचान 

डॉ. शाह आलम राना 

बस्ती जनपद के बहादुरपुर ब्लॉक अंतर्गत मनोरमा नदी के पवित्र तट पर आज भी अतीत में बिसरा दिए गए एक गांव के अवशेष बिखरे पड़े हैं। महुआ डाबर का नाम 3 जुलाई 1857 को हुए उस कथित बर्बर जनसंहार की स्मृति से जुड़ा है, जिसे स्वतंत्र भारत के इतिहास की मुख्यधारा की पुस्तकों में अपेक्षित स्थान आज तक नहीं मिल सका है।

दस्तावेजों और स्थानीय ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, उस दिन ब्रिटिश सेना ने गांव को तीन ओर से घेर लिया और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या कर पूरे गांव को आग के हवाले कर दिया। स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध दस्तावेजों में मृतकों की संख्या पांच हजार से अधिक बताई जाती है। हिंदू-मुस्लिम, बच्चे-बूढ़े और महिलाएं—किसी को नहीं बख्शा गया। सामूहिक हत्याओं के बाद गांव में कई दिनों तक आग जलती रही। कहा जाता है कि इस भयावह घटना ने पूरे क्षेत्र को दहला दिया था।

बाद में ब्रिटिश अभिलेखों में महुआ डाबर को ‘गैरचिरागी’ यानी ऐसा गांव जहां दोबारा आबादी नहीं रही, के रूप में दर्ज किया गया। कभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा यह कस्बा देखते ही देखते तबाही के मलबे में बदल गया।

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 1813 में डॉ. फ्रांसिस बुकानन के सर्वेक्षण में महुआ डाबर का उल्लेख एक बसे-बसाए कस्बे के रूप में मिलता है। करीब 200 घरों वाला यह कस्बा मनोरमा नदी के किनारे स्थित था। यहां सूती वस्त्र, छींट, रेशम, मलमल, कपड़ों की रंगाई तथा अनाज और पीतल के कारोबार के लिए बाजार प्रसिद्ध था। 1857 से पहले महुआ डाबर क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के व्यापारिक नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ था।

गोरखपुर के तत्कालीन कमिश्नर एवं जज डब्ल्यू. विनयार्ड से संबंधित पत्रों का भी इस घटना के संदर्भ में उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि 15 जून 1857 को उन्होंने विलियम पेप्पे को मजिस्ट्रेट की शक्तियां देते हुए महुआ डाबर के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद पेप्पे ने महुआ डाबर और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक दमनात्मक कार्रवाई की। 15 जून से 29 जुलाई 1857 के बीच हुई कार्रवाई में गांवों को जलाने और लोगों को दंडित किए जाने के विवरण विभिन्न स्रोतों में मिलते हैं।

इसी दौर में महुआ डाबर और आसपास के क्षेत्र में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह भी हुआ। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, फैजाबाद (अयोध्या) से दानापुर की ओर जा रहे छह अंग्रेज अधिकारियों—लेफ्टिनेंट टी. ई. लिंडसे, लेफ्टिनेंट डब्ल्यू. एच. थॉमस, लेफ्टिनेंट जी. एल. कॉल्टी, सार्जेंट एडवर्ड्स, ए. एफ. इंग्लिश और टी. जे. रिची—को स्थानीय क्रांतिकारियों ने मार गिराया था। इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने महुआ डाबर और आसपास के इलाकों में व्यापक दमन किया। अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई लोगों को फांसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

महुआ डाबर की क्रांति के प्रमुख चेहरों में जमींदार जफर अली का नाम भी लिया जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, विदेश से लौटने के बाद उन्हें इनाम के लालच में धोखे से गिरफ्तार कराया गया। गोरखपुर के न्यायाधीश बेंसन ने उन्हें मृत्युदंड सुनाया। बाद में वर्ष 1871 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति टर्नर और न्यायमूर्ति टर्नबुल ने भी उनकी फांसी की सजा बरकरार रखी।

स्मृतियों को बचाने की कोशिश

‘गैरचिरागी’ घोषित कर दिए गए महुआ डाबर के शहीदों और क्रांतिकारियों की स्मृतियों को संरक्षित करने के उद्देश्य से उनके वंशजों ने वर्ष 1999 में महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की। संग्रहालय में 1857 से संबंधित पत्र, हथियार, जले हुए अवशेष, समाचार पत्र-पत्रिकाएं, तस्वीरें, सिक्के, दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं, ऐतिहासिक दस्तावेज, पुस्तकें तथा मुकदमों से संबंधित अभिलेख संरक्षित किए गए हैं।

यह विडंबना ही है कि स्वतंत्रता के 78 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी महुआ डाबर को वह राष्ट्रीय पहचान नहीं मिल सकी, जिसका यह ऐतिहासिक स्थल हकदार है। स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक न तो देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री और न ही उत्तर प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री ने यहां आकर श्रद्धांजलि दी है। संग्रहालय को भी अपेक्षित सरकारी संरक्षण और आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी है।

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव जैसे राष्ट्रीय आयोजनों के दौरान भी महुआ डाबर को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी स्थानीय लोग लंबे समय से मांग करते रहे हैं। यही उपेक्षा अब इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय स्मृति में स्थापित करने की मांग को और तेज कर रही है।

हमारी मांगें

1. सरकार द्वारा प्रस्तावित लगभग दस एकड़ क्षेत्र में भव्य राष्ट्रीय स्मारक एवं शहादत कॉरिडोर का निर्माण शीघ्र कराया जाए।

2. यूपी बोर्ड और NCERT की कक्षा 6 से 12 तक की इतिहास की पुस्तकों में ‘महुआ डाबर जनसंहार’ और 1857 के स्थानीय स्वतंत्रता संग्राम पर विस्तृत पाठ शामिल किया जाए।

3. संसद में विशेष विधायी पहल के माध्यम से 1857 के शहीद परिवारों के सम्मान, संरक्षण और पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

4. महुआ डाबर संग्रहालय को सरकारी सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान किया जाए तथा उसके दस्तावेजों और ऐतिहासिक सामग्री के डिजिटलीकरण के लिए सरकारी अनुदान उपलब्ध कराया जाए।

5. 3 जुलाई को महुआ डाबर के शहीदों की स्मृति में राष्ट्रीय स्मृति दिवस घोषित करने पर विचार किया जाए। जनपद के स्कूल-कॉलेजों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएं और विद्यार्थियों को क्रांति स्थल का शैक्षणिक भ्रमण कराया जाए।

6. 1857 के दौरान महुआ डाबर में हुई ब्रिटिश कार्रवाई के लिए ब्रिटेन की सरकार से आधिकारिक रूप से ऐतिहासिक खेद और माफी की मांग की जाए।

7. महुआ डाबर से संबंधित यदि कोई ऐतिहासिक धरोहर या अभिलेख विदेशों में संरक्षित हैं, तो उनकी पहचान कर उन्हें भारत वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए जाएं।

8. 1857 के दौरान अंग्रेजी शासन का साथ देने वालों की संपत्तियों के संबंध में उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों की जांच कर कानून के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई की जाए।

9. महुआ डाबर को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिया जाए और यहां तक बेहतर सड़क संपर्क उपलब्ध कराया जाए।

10. बस्ती जनपद के स्कूल-कॉलेजों के लिए महुआ डाबर का नियमित एवं निःशुल्क शैक्षणिक भ्रमण कार्यक्रम शुरू किया जाए, ताकि नई पीढ़ी अपने स्थानीय इतिहास से परिचित हो सके।

11. देश के प्रधानमंत्री अथवा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं महुआ डाबर पहुंचकर मनोरमा नदी के तट पर स्थित क्रांति स्थल पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।

महुआ डाबर सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि 1857 की उस सामूहिक चेतना का प्रतीक है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम मिलकर औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ खड़े हुए थे।

यदि जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक बन सकता है, तो 1857 में तबाह किए गए महुआ डाबर की शहादत को राष्ट्रीय पहचान क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

यह सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक ऐतिहासिक स्मृति का सवाल है।

जब तक सांस है, महुआ डाबर के शहीदों की कहानी सुनाई जाती रहेगी। इस मिट्टी में बहाए गए रक्त को नमन किया जाता रहेगा और उन गुमनाम बलिदानियों की स्मृति में श्रद्धा के फूल अर्पित किए जाते रहेंगे।

( डॉ. शाह आलम राना  स्वयं द्वारा स्थापित महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक हैं )