विचार

इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका

दार्शनिक, चिंतक एवं क्रांतिकारी एम.एन. रॉय की किताब पर चर्चा कर रहे हैं इमानुद्दीन

विश्व स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व करने वाले और उसकी नींव रखने वाले प्रख्यात दार्शनिक, चिंतक तथा क्रांतिकारी एम.एन. रॉय (1887–1954) की पुस्तक इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका (1939) भारत समेत पूरी दुनिया में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव के स्वप्नदर्शियों की मार्गनिर्देशिका के तौर पर देखी-समझी जाती है। भारत में क्रांति की समस्याओं पर हिंदू-मुस्लिम मसले को उन्होंने बहुत गहराई से समझने का प्रयास किया था। वह पहले ही भारत-विभाजन के विनाशकारी त्रासदी को भांप गए थे। पाठकों को यह बात जरूर आश्चर्य में डालेगी कि वह भारत में सामाजिक विघटन के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था की खुलेआम आलोचना करते हैं। ऐतिहासिक रूप से बौद्ध धर्म की भूमिका का भी उल्लेख करते हैं जिसकी आगे चर्चा की गई है।

उन्होंने यह पुस्तक इस्लाम धर्म की विशिष्टताओं से बहुसंख्यक हिंदुओं को अवगत कराने के उद्देश्य से लिखी। उनका मानना था कि इस्लाम ने दुनिया को बदलने में क्रांतिकारी भूमिका अदा की है। लेकिन इस संबंध में भारत के बुद्धिजीवियों समेत आम जनता में तमाम भ्रांतियां हैं। इन्हीं भ्रांतियों को दूर करने और सकारात्मक सोच स्थापित करने के उद्देश्य से इस पुस्तक में लिखा गया है — “कोई भी सभ्य देश इस्लाम के इतिहास से इतना अनभिज्ञ नहीं है जितना हिंदू है और वे मुसलमानों के धर्म से घृणा करते हैं। हमारे राष्ट्रवाद के सिद्धांत का मुख्य लक्षण आध्यात्मिक साम्राज्यवाद की भावना है। लेकिन यह खराब भावना मुसलमानों के संबंध में अधिक स्पष्ट है। अरब मसीहा हजरत मुहम्मद के उपदेशों के संबंध में यहां सबसे अधिक अज्ञान है। सामान्य रूप से हिंदू को इस्लाम के अत्यंत क्रांतिकारी महत्त्व की जानकारी नहीं है, न ही उसकी समझ है।” (पृ. 17)

वह हिंदू धर्म के प्रमुख पहलू ‘आध्यात्मिक साम्राज्यवाद’ का जिक्र करते हैं जो मुस्लिमों के खिलाफ ज्यादा है और इसे वह राष्ट्रवाद के लिए खतरा मानते हैं। यहां हम पुस्तक के आलोक में एम.एन. रॉय के इस्लाम धर्म के विचारों का सिलसिलेवार ढंग से उल्लेख करेंगे।

इस्लाम धर्म सैनिक सफलताओं का परिणाम नहीं था

एम.एन. रॉय इस बात का खंडन करते हैं कि इस्लाम सैनिक सफलताओं का परिणाम है। इतिहासकारों-व्याख्याकारों ने इस्लाम के क्रांतिकारी दृष्टिकोण को कम करके आंकने की दृष्टि से ऐसा किया है। वह लिखते हैं कि ‘ यदि सरासेनी योद्धाओं की उत्कृष्ट सैनिक विजय से इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका का अनुमान लगाना हो तो उसको अनुपम ऐतिहासिक घटना नहीं कहा जा सकता। तातारी और सीथियाई बर्बर लोगों की, जिनमें गोथ, हूण, वनडल, अवार, मंगोल आदि शामिल हैं, सैनिक विजय इस्लाम के अनुयायियों की सैनिक विजयों के यदि बराबर अथवा उनसे अच्छी नहीं थी तो भी महान उपलब्धियां थीं।’ (पृ. 21) अल्लाह की फौजें प्राचीन समाज के मूर्तियों-स्मार्कों और पुस्तकालयों को तोड़ने वाली नहीं थीं।

एम.एन. रॉय लिखते हैं- प्राचीन धर्मों के गौरवशाली भवनों को इस्लाम की तलवार ने नष्ट नहीं किया, वरन् उनके अनुयायियों द्वारा उनको छोड़ देने के कारण उपेक्षा से वे नष्ट हुए। कितना ही दमन और अत्याचार पूरे राष्ट्र को अपने परंपरावादी धर्म को छोड़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। बिना किसी प्रतिरोध के फारस के लोगों ने विजेताओं के धर्म को स्वीकार कर लिया और तिगरिस से ओक्सस नदी के किनारों तक इस्लाम फैल गया। वहां का प्राचीन धर्म जर्जर हो गया था और उससे सभ्य लोगों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को संतोष नहीं मिलता था। (पृ. 57) … उत्तरी अफ्रीका में सिकंदरिया से कार्थेज तक का क्षेत्र ऐसा था जहां इस्लाम के प्रचार से ईसाई धर्म नष्ट हो गया था। वहां की धार्मिक क्रांति के लिए इस्लाम की असहशीलता उतनी जिम्मेदार नहीं थी जितना उस धर्म का स्वतः अधःपतन…। (पृ.57)

राजनीतिक आंदोलन के रूप में इस्लाम का जन्म हुआ

एम.एन. रॉय इस्लाम के अभ्युदय के पीछे शुरुआती कारण राजनीतिक मानते हैं, जो आगे चलकर एक धार्मिक आंदोलन के रूप में स्थापित हुआ। इस्लाम ने आरंभिक चरणों में अरब के रेगिस्तान में रहने वाले घूमंतू जनजातियों-बद्दुओं में एकता स्थापित की। इस लक्ष्य की प्राप्ति के बाद ही उन्होंने राजनीति और धर्म का मिश्रण कर एकता का सिद्धांत निर्मित किया। क्योंकि उस समय किसी भी राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति के लिए धर्म जैसे पहलू की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। एम.एन. रॉय लिखते हैं, ‘राष्ट्रीय एकता के आदर्श के विचारक के रूप में हजरत मुहम्मद ने यह अनुभव किया कि युद्धरत कबीलों को उस बात पर तब तक राजी नहीं किया जा सकेगा जब तक कि उसका समर्थन अलौकिक रूप से न हो।’ (पृ.66)

हजरत मुहम्मद के अभ्युदय के पीछे उन कबीलों का एक होना था, जो कुरैश कबीलों के झंडे तले एकजुट हुए, इनमें हजरत मुहम्मद का बड़ा योगदान था। एम. एन. रॉय हजरत मुहम्मद के व्यक्तित्व की व्याख्या में कहते हैं- ‘जब तक हजरत मुहम्मद ने अपने को रसूल घोषित नहीं किया तब तक उनके व्यक्तित्व में कोई विशेष बात नहीं थी। उनके उस कथित दावे की नींव अन्य सभी धर्मों के मसीहाओं, धर्मगुरुओं और संतों के दावों से अधिक भिन्न नहीं थी।’ (पृ.65)

उनके व्यक्तित्व को परखने में उनकी पत्नी खदीजा की प्रमुख भूमिका थी ‘यदि कुशाग्र बुद्धिसंपन्न चतुर पत्नी ने ऐन मौके पर उनके जीवन में प्रवेश न किया होता। खदीजा स्वयं धनी व्यापारी थी और उसमें अलौकिक चतुराई थी, जिसने अपने पति के मानसिक तनाव के आध्यात्मिक मूल्य को समझा था। उसने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनके मानसिक तनाव और प्रचलित बातों से भिन्न सत्य पागलपन के लक्षण नहीं हैं, वरन वह अल्लाह के आदेश अथवा आयतें हैं।’ (पृ.69) इस्लाम दूसरे धर्मों से इस रूप में अलग है क्योंकि इसने धर्म के लिए दैवीय आधार की खोज कर ली थी जिसमें धार्मिक अंधविश्वास और आध्यात्मिक अनुमान कम थे, नैतिक आचरणों में दूसरे धर्मों की तुलना में प्रगतिशीलता ज्यादा थी। उन्होंने अपने लोगों में सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए विशेष जोर दिया, लोगों को शारीरिक साफ-सफाई, रोजा, जकात और इबादत के नियमों पर जोर दिया। इस्लाम ने दान और पुण्य को ज्यादा अहमियत दी है। उनके बाद के खलीफाओं ने भी इस क्रांतिकारी धर्म को फैलाने में महती भूमिका निभाई। जिनमें अबू बकर, उमर और खालिद थे।
एम.एन. रॉय इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का जिक्र करते हैं। जिन्होंने अपनी सादगी, विनम्रता, वफादारी और ईमानदारी से इस्लाम को फैलाया। अबू बकर ने ‘ अल्लाह की फौज’ को यादगार आदेश दिया था-ईमानदार रहो, बेईमान कभी उन्नति नहीं करता। बहादुर बनो, आत्मसमर्पण करने से अच्छा है कि युद्ध में वीरगति प्राप्त करो। दयावान बनो, बूढ़ों, औरतों और बच्चों की कभी हत्या मत करो। फलदार वृक्षों को, अनाज और पशुओं को नष्ट मत करो। दुश्मन को दिए गए अपने वचन का पालन करो। जो लोग संसार से अलग होकर रहते हैं। उनको मत सताओ।” (पृ.26) आगे के खलीफाओं ने भी नैतिक आदर्शों पर जोर दिया। हजरत मुहम्मद ने अंतरजातीय विवाहों को भी महत्त्व दिया, विभिन्न कबीलों से वैवाहिक संबंधों को स्थापित कर। लेकिन इस बात की ओर एम. एन. रॉय रोशनी नहीं डालते। लोगों में गैरबराबरी और निजी स्वामित्व के उन्मूलन के लिए यह सबसे जरूरी था।

इस्लाम धर्म और अरब व्यापारी

रॉय अरब समाज को रोम और यूनान के समाज से भिन्न मानते हैं। पूरे समाज पर इस्लामी राज्य के आधिपत्य से अरब के आर्थिक जीवन अर्थात कृषि और उद्योग को प्रोत्साहन मिला। इस्लामी राज्य की नीति-निर्धारण में अरब के व्यापारियों ने विशेष भूमिका अदा की थी, उनकी भावनाओं को विशेष रूप से महत्त्व दिया जाता था। खुद हजरत मुहम्मद और उनके उत्तराधिकारी एक व्यापारी थे। यहां रोम, यूनान और भारत की तरह श्रम करने वाले लोगों को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। इस्लामी राज्य प्राचीन व्यवस्थाओं की अपेक्षा नवीन सामाजिक संबंधों पर आधारित था। इसके प्रगतिशीलता का प्रमुख भौतिक कारक श्रमिकों (जो व्यापारी भी थे) की राज-काज से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में आधिकारिक हस्तक्षेप था। श्रम करने वाले ऐसे व्यापारी थे जो अपने सामान बेचने के लिए पूरी दुनिया में भ्रमण करते थे। इसलिए उनकी समझ, विवेक क्षमता, विभिन्न समाजों के क्रियाकलापों-व्यवहार के बारे में परिपूर्ण थी। व्यापार के लिए दुर्गम मार्गों से गुजरते समय उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी। रेगिस्तान के कठिन जीवन ने उन्हें श्रमिक संस्कृति से प्रेम करना सिखा दिया था। उस समाज में व्यापार को प्रतिष्ठा के नजर से देखा जाता था। व्यापार और व्यवसाय मुक्त थे और उनमें संलग्न लोगों को राज्य कर्मचारियों की भांति सम्मान प्राप्त था।

एम.एन. रॉय हजरत मुहम्मद के एकेश्वरवाद के सिद्धात की पृष्ठभूमि में व्यापार आधारित उत्पादक संबंधों को प्रधान मानते हैं, जिससे उनके धार्मिक और नैतिक नियम निर्धारित हुए। व्यापार के लिए शांति, सुरक्षा और स्वतंत्रता का होना नितांत आवश्यक है। इस्लाम ने पूरी दुनिया में इस बात को फैलाया की सभी इंसान खुदा के नजर में बराबर हैं, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। उस समय दास प्रथा भी विद्यमान थी, गुलामों पर उनके मालिकों द्वारा जघन्य अत्याचार किया जाता था।

मिस्र विजेता ओमरू अपने जमाने का समाजवादी मालूम पड़ता है जब वह यह कहता है- ‘इस देश के पशुपालकों की, जो जमीन की सतह को काला किए हुए हैं, तुलना मेहनती चीटियों के समूह से की जा सकती है और उन लोगों के आलस्य को उनके मालिकों के कोड़ों से दूर किया जाता है। लेकिन वे लोग, जो संपत्ति अथवा धन उत्पन्न करते हैं, उसका बंटवारा मजदूरों और मालिकों के बीच समान रूप से नहीं किया जाता है।’

अरब में ज्ञान-विज्ञान का युग

मुहम्मद के अनुयायियों द्वारा अरब में शांति और एकता का राज कायम होने के बाद दर्शन और विज्ञान का युग प्रारंभ होता है जो लगभग 500 वर्षों तक रहा। अरब के इतिहासकार, वैज्ञानिक, चिकित्साशास्त्री, दार्शनिक, खगोलशास्त्री आदि व्यापार और श्रम से जुड़े होते थे। बगदाद इसका केंद्र हुआ करता था। बगदाद के अधिकांश अब्बासी खलीफाओं ने विज्ञान के अध्ययन और विचारों की स्वतंत्रता पर जोर दिया। वहां विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित किया गया था। वहां विश्व के विद्वतजनों का जमघट लगा रहता था, स्वतंत्र विचारों के लिए यह उर्वर केंद्र था। उन दिनों योरोपीय समाज अंधकार युग में था। पुनर्जागरण की शुरुआत नहीं हुई थी। अलकाजी, अलहसन, अलफराकी, अबेसीना, अलगजाली, अवेमपाक, अलफेटराजियम, महान अबेरोस आदि अरब में ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के प्रमुख पुरोधाओं में से थे।

अबेरोस को अरब का अरस्तू कहा जाता था। अलकाजी गणितशास्त्री थे। उनका कहना था- दर्शन का आधार गणितशास्त्र होना चाहिए और उसे केवल आलसी कल्पनाओं से मुक्त किया जाना चाहिए। अमूर्त दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन तर्क के आधार पर किया जाना चाहिए। उनको ठोस तथ्यों और नियमों के आधार पर होना चाहिए जिससे उनसे निश्चित निष्कर्ष निकाले जा सकें। अलफराबी, जो एक व्यापारी थे बगदाद, में अध्यापन का कार्य करते थे। उन्होंने चिकित्साशास्त्र में महारथ हासिल कर ली थी। अरस्तू की रचनाओं की व्याख्या की। अबेसीना ने गणित और भौतिक शास्त्र की पुस्तकें लिखीं, उन्हें एक चिकित्साविज्ञानी के रूप में ख्याति प्राप्त है। अलहसन ने नेत्र चिकित्सा में योगदान दिया।

अलगजाली एक दार्शनिक हुए जिन्होंने देकार्त से पहले आत्मचेतना के सत्य का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने प्राचीन और आधुनिक संशयवाद के बीच कड़ी स्थापित की। वह कहते हैं धर्म से संतोष न मिलने पर मैंने सभी अधिकृत बातों को छोड़ने का निश्चय किया। इसका उल्लेख उन्हीं के शब्दों में मिलता है: ‘धर्म से संतोष न मिलने पर मैंने सभी अधिकृत बातों को छोड़ने का निश्चय किया और उन सभी बातों से अपने को अलग कर लिया जिन्हें मैंने बचपन में सीखा था। मेरा उद्देश्य सत्यता की खोज करना है।’ (पृ.95)

भारत में इस्लाम

एम.एन. रॉय ब्राह्मणवाद को भारत के सामाजिक विघटन के लिए जिम्मेदार मानते हैं और बौद्ध क्रांति को सामाजिक एकता का कारक। वह लिखते हैं कि ‘ब्राह्मण व्यवस्था की कठोरता ने बौद्ध क्रांति को भारत में 11वीं और 12वीं शताब्दी में अभिभूत कर दिया था और बहुत से लोगों को नास्तिक और धर्म विरोधी मानकर उन्हें समाज से निकालकर उनको पदच्युत कर दिया था, उन लोगों ने इस्लाम के संदेश का स्वागत किया।’ यहां वह सीधे डॉ. आंबेडकर की भाषा बोलते हैं। एम. एन. रॉय शायद इस बात से अवगत मालूम पड़ते हैं कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा बौद्धों के नरसंहार के बाद बौद्धों के पतन की शुरुआत हो गई थी। क्योंकि डॉ. आंबेडकर उनसे एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ब्राह्मणों ने बाहरी विदेशियों से मिलकर बौद्धों के भौतिक आधारों को नष्ट कर दिया। एम. एन. रॉय. बौद्ध धर्म के पतन के लिए उसके आंतरिक कारणों को भी जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन उनके पतन के आंतरिक कारणों के विश्लेषण में जाने की उन्होंने ज्यादा कोशिश नहीं की है। न ही बौद्ध धर्म के प्रगतिशील तत्वों पर ज्यादा रोशनी डाली है। रॉय ने भारत में भक्ति आंदोलन के शुरुआत के लिए मुस्लिम शासन की सराहना की है जिसकी छाया तले कबीर, नानक, तुकाराम, चैतन्य आदि प्रमुख संत उभरे और जिन्होंने कठोरता से ब्राह्मणवाद पर प्रहार किया। रॉय ब्राह्मणों की उस नाकाबलियत और जुल्मों को नहीं छिपाते हैं जो वे शूद्रों के साथ करते हैं- ‘मुहम्मद बिन कासिम ने ब्राह्मण शासकों द्वारा पीड़ित जाटों और अन्य जातियों की सहायता से सिंध को जीता था। सिंध को जीतने के बाद उसने आरंभिक विजेताओं की नीति का अनुसरण किया था। उसने देश में शांति स्थापना के उद्देश्य से ब्राह्मणों को सरकारी नौकरियों में नियुक्त किया था।’ (पृ. 101)

वह इस बात का खुलासा करते हैं कि मुस्लिम शासकों ने राजनीतिक सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों से सांठ-गांठ की। अर्थात् उन्होंने भी ब्राह्मणों की शोषक छवि को मान्यता दे दी। शुरुआत में भले ही इस्लाम के आक्रमणकारियों ने असहिष्णुता का परिचय दिया हो लेकिन जल्द ही यहां के लोगों से वे घुल-मिल गए। यहां के लोगों का सहानुभूति पूर्ण रुख देखकर उन्होंने अपने आचरण में बदलाव लाया। भारी पैमाने पर लोगों ने इस्लाम धर्म ग्रहण किया। रॉय ऐसे लोगों को शूद्र कहते हैं। इस बात के लिए वह हावेल को उद्धृत करते हैं- जिन लोगों ने इस्लाम धर्म स्वीकार लिया उन्हें नागरिकों के सभी अधिकार अदालतों में मिले, जिनमें कुरान के आधार पर नियम-कानून चलते थे और उनमें आर्यों के कानून और परंपराओं के आधार पर विवादों पर विचार नहीं किया जाता था। हिंदुओं की उन नीची जातियों में इन बातों का बड़ा प्रभाव पड़ा, जिन्हें ब्राह्मण व्यवस्था के कानूनों के द्वारा पीड़ित किया गया था और उन जातियों को अस्पृश्य, अपवित्र और शूद्र कहकर तिरस्कृत किया जाता था। (पृ.111)

भारत के संदर्भ में इस्लाम को देखने की दृष्टि एम.एन. रॉय ने हावेल से ली है- ‘ मुसलमानों के राजनीतिक विचारों का प्रभाव हिंदू सामाजिक जीवन पर दो प्रकार से पड़ा। उसके कारण हिंदुओं की जाति-व्यवस्था अधिक जड़वत हो गई और दूसरी ओर उसके प्रति विद्रोह की भावना अधिक तीव्र हो गई। उसने हिंदू समाज की नीची जातियों के लोगों को उसी प्रकार आकर्षित किया जैसे रेगिस्तान के बद्दुओं को किया था… उसे स्वीकार करके शूद्र भी स्वतंत्र व्यक्ति हो गया और शासक के धर्म में जाने से उसकी स्थिति ब्राह्मण मालिकों के समान हो गई। योरोप के नवजागरण की भांति बौद्धिक मंथन शुरू हुआ और बहुत-से ऐसे लोग उत्पन्न हुए जो अपने मौलिक विचारों के लिए प्रसिद्ध हुए। नवजागरण की भांति यह बौद्धिक मंथन अधिकतर नगरों में हुआ। उसके प्रभाव में बद्दुओं ने तंबुओं में रहना छोड़ दिया था, उसी भांति शूद्रों ने अपने गांवों को छोड़ दिया…।’

रॉय का यह कथन कि जाति व्यवस्था से मुक्त होकर शूद्रों ने अपने गांवों को छोड़ दिया, इसलिए पर्याप्त नहीं हो सकता क्योंकि मजहब बदलने से जातियां नहीं बदलती। क्योंकि उनके पेशे परस्पर एक-दूसरे के सहयोग पर आधारित होते हैं, जिसे धार्मिक आस्था से पिरोया गया है। धर्म और जातीय श्रेणीक्रम को चुनौती देने वाला व्यक्ति दूसरों से कोई सहानुभूति प्राप्त नहीं कर सकता। शायद यही कारण है कि भारत में मुस्लिम टोलों के निर्माण शुरू हुए। उनमें जातीय व्यवस्था हिंदू धर्म के जातीय व्यवस्था के समान ही उपजी। उसी दंश और पीड़ा के साथ। ब्राह्मणवाद कोई एकांगी विचारधारा नहीं है जो सिर्फ हिंदुओं पर ही लागू होती है बल्कि यह एक सर्वव्यापी सोच है जो सब पर लागू होती है। इससे मुस्लिम अछूता नहीं है। रॉय शायद यह बात कहने का साहस जुटाते तो ज्यादा अच्छा रहता- अशराफों द्वारा अजलाफों और अरजालों (मुस्लिम शूद्र-अतिशूद्र) पर कहर बरपा किया जाता है, तो उससे हिंदू मुस्लिमों की एकता राष्ट्रीय एकता के लिए संजीवनी का काम करती। आंबेडकर की भांति वह भी कहते कि हिंदू-मुस्लिम एकता जातियों की चिताओं पर ही होगी तो उनके विचार एक पक्षीय नहीं, दोनों के लिए समान रूप से लागू होते।

बहरहाल उन्होंने इस बात का साहस तो जुटाया कि भारत में सामाजिक विघटन के लिए ब्राह्मणवाद, बौद्ध क्रांति का पतन, शूद्रों की अवस्था और हिंदू-मुस्लिमों में वैमनस्यता जिम्मेदार है। एम. एन. रॉय को मानवतादी कहकर उनके विचारों को सिरे से खारिज कर देना सही नहीं होगा। वह सभी उत्पीड़ित जनता के आंदोलनों को ऊर्जा प्रदान करते हैं। इस किताब के छोटे साइज एवं कम पृष्ठों से मालूम पड़ता है कि उन्होंने यह किताब व्यापक जनता तक पहुंचाने की उद्देश्य से लिखी।

 

( इमानुद्दीन पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। सावित्रीबाई फुले जन साहित्य केन्द्र नाम से प्रकाशन भी है। वर्तमान समय में वे गोरखपुर में रहते हैं। संपर्क-मो.नं. 7071487233)

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