Spread the love

इल्म का दरिया थे हुज़ूर ताजुश्शरिया – रईसुल कादरी

 

गोरखपुर। हुज़ूर ताजुश्शरिया मुफ़्ती मो. अख़्तर रज़ा खां अजहरी मियां अलैहिर्रहमां की गिनती विश्व के प्रसिद्ध आलिमों में होती है। इल्म का दरिया थे हुजूर ताजुश्शरिया जिनके फैसले पर अहले सुन्नत व जमात के तमाम उलेमा अपने इत्मिनान का इज़हार करते थे। भारत, मिस्र, साउथ अफ्रीका, ब्रिटेन, अमेरिका, सऊदी अरब, नेपाल, मॉरीशस, पाकिस्तान, बांग्लादेश के अलावा दुनिया भर मे आपके करोड़ों की तादाद में मुरीद हैं।

यह बातें कारी रईसुल कादरी ने मंगलवार को दारुल उलूम अहले सुन्नत मजहरुल उलूम घोसीपुरवा (शाहपुर) में हुजूर ताजुश्शरिया के इसाले सवाब के लिए आयोजित फातिहा ख्वानी व दुआ ख्वानी की महफ़िल में तकरीर करते हुए कही। उन्होंने कहा कि हुजू़र ताजुश्शरिया पेचीदा मसलों के हल निकाला करते थे। आपके इल्म का लोहा बातिल भी मानते थे। आपकी मक़बूलियत और इल्मी मज़बूती का इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सन् 2012 में सऊदी सरकार ने खुद दावत देकर आपको ग़ुस्ल काबा शरीफ की रस्म अदायगी में शामिल किया था ।

कारी मो. तनवीर अहमद ने  हुजूर ताजुश्शरिया के इंतकाल को अहले सुन्नत व जमात की एक ऐसी अपूरणीय क्षति बताया जिसकी भरपाई मौजूदा समय में नामुमकिन है। हुजूर ताजुश्शरिया सन् 2011 में अमेरिका की जार्ज टॉउन यूनिवर्सिटी के इस्लामिक क्रिश्चियन अंडरस्टेंडिंग सेंटर की ओर से किये जाने वाले सर्वे में 28वां स्थान पर आए। इसके अलावा जॉर्डन की रॉयल इस्लामी स्ट्रेजिक स्टडीज़ सेंटर के सन् 2014-15 के सर्वे में उन्हें 22वें स्थान पर रखा गया। उन्होंने सन् 2000 में बरेली में इस्लामिक स्टडीज जमीयतुर रजा के नाम से एक इस्लामी धर्मशास्त्र केंद्र की स्थापना की थी। उन्होंने विज्ञान, धर्म और दर्शन सहित कई विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला पर कई किताबें लिखी हैं। अज़हरुल फतवा के खिताब से फतवा का संग्रह उनका विशाल कार्य है। उन्होंने कई किताबों का अनुवाद भी किए। उन्हें अरबी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ थी। दीनी तब्लीग के लिए विश्व के हर देश में तशरीफ ले गए।

मौलाना मो. जाहिद मिस्बाही ने कहा कि हुज़ूर ताजुश्शरिया अल अजहर यूनिवर्सिटी मिस्र के टॉपर थे। सन् 1966 में जब अल अज़हर यूनिवर्सिटी मिस्र से फ़ारिग हुए तो कर्नल अब्दुल नासिर ने आपको बतौर इनाम ज़ामे अज़हर अवार्ड पेश किया साथ ही साथ सनद से भी नवाज़ा। हुजूर ताजुश्शरिया ने आला हज़रत की अरबी ज़बान में लिखी कई किताबों को उर्दू में अनुवाद करके अवाम तक पहुँचया। वहीं स्वयं लिखी किताबों से तमाम मसलों का हल निकालकर रहनुमाई फरमाई। आपने नबी-ए-पाक की बारगाह में नात शरीफ के नज़राने पेश किये। जिसमें मुनव्वर मेरी आँखों को मेरे शम्सुद्दुहा कर दें, ने खूब शोहरत पाई। कुल मिलाकर एक वली की सारी खूबियां हुजूर ताजुश्शरिया में कूट-कूट कर भरी हुई थीं ।

अंत मे फातिहा ख्वानी के बाद मौलाना अब्दुर्रब की दुआ पर महफिल समाप्त हुई। सलातो सलाम पढ़ा गया।। इस मौके पर हाफिज अब्दुर्रहीम, हाफिज मो. अय्यूब, कारी नसीरुद्दीन, अब्दुल जब्बार, खुर्शीद, कासिम सहित तमाम शिक्षक व छात्र मौजूद रहे। गाजी मकतब गाजी रौजा में भी काजी इनामुर्रहमान की अध्यक्षता में इसाले सवाब की महफिल हुई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *