विचार

गोरखनाथ : धीरे धरिबा पाँव

सदानंद शाही

अठवीं से लेके बरहवी शताब्दी ले चौरासी सिद्ध लोग अपभ्रंश में कविता करत रहे.  सिद्ध लोगन के कविता में भोजपुरी शब्द आ क्रिया रूप मिलल शुरू हो गईल रहे. चौरासी सिद्धन में सबसे प्रसिद्ध रहलें सरहपा.

उन कर एगो कविता देखल जाँ –नगर बाहर रे डोंबि तोहारि कुडिया/छोड़- छोड़ जाई सो बाभन नाड़िया /आलो डोंबि तो सम करबि मो संग /जाम मरण भाव कइसन होई/जीवन्ते भले नाहि विसेस .‘ एमे ‘छोड़ि छोड़ि जाई’ आ ‘कइसन होई’ भोजपुरी प्रयोग हवे. सिद्ध लोगन के कविता में एह तारे के बहुत उदाहरण मिलेला. बाक़िर ठीक ठीक भोजपुरी कविता के रूप गोरखनाथ कींहा से मिलल शुरू होला. गोरखनाथ के समय नउवीं से लेके एगारहवीं शताब्दी के बीच मानल जाला. एह तरे देखल जा त भोजपुरी कविता के इतिहास हजार साल से उप्पर के बा.

बौद्ध धर्म के बजरयान शाखा जब भोग विलास में डूबि गयल तब गोरखनाथ जी अपने हठयोग से समाज के नया रस्ता देखवनी. समाज के गिरल दशा से उबरले में गोरखनाथ जी बड़ा सहजोग बा. भोजपुरी इलाका में गोरखनाथ जी जेतना प्रसिद्ध हवें ओतने उनके गुरु मछिंदर नाथो हवें. मछिंदर नाथ जी कवनों जोगिनी के फेरा में परल रहलीं.कवनों तरे एह फंदा से निकलि ना पावत रहलीं. गोरखनाथ जी के पता चलल कि गुरु के ई हाल हो गईल बा . उहाँ के तुरते चली देहलीं गुरु के जगावे. गोरखनाथ कवनों कवनों तरे गुरु के जगवले. गोरखनाथ आ मछिंदर नाथ के ई किस्सा भोजपुरी इलाका में बहुत चाव से कहल आ सुनल जाला. एह कहानी प गाँव गाँव मे नाटक नौटंकी होत रहे. जाग मछन्दर गोरख आया एगो रूपक के तरे हमन के सामने आवेला. कहानी में जवने तरे मछन्दर माया-मोह आ भोग विलास में फसल रहलें ओहि तरे ओ समय के लोगवो फंसल रहे. गोरख नाथ ओह समय लोग के जगवले. उनके ‘अलख निरंजन’ आ ‘जाग मछन्दर गोरख आया ’ सुनते आजो जगले के अनुभव होला .

गोरख नाथ जी के नाव प चालीस गो किताबिन के चर्चा होला. एमे से अधिकांश किताबि संस्कृत में लिखल गईल बाड़ी स. बाक़िर उ कुलि जोगी जाती आ पंडितन खातिर बा . गौतम बुद्ध लेखां जनता के भासा मेंजवान लिखलीं भ कहलीं उहे ढेर प्रसिद्ध भईल. गोरखनाथ जी के घूमन्तू जीवन रहे एसे उनकरे भासा मे कई भासन के रूप मिलेला. बाक़िर निखालिस भोजपुरी में उहाँ के कई गो रचना मिलेली –

हंसिबा षेलिबा रहिबा संग । काम क्रोध न करिबा संग।

हंसिबा षेलिबा गाइबा गीत । दीढ़ करी राखीबा आपना चीत॥

गगन मण्डल में ऊंचा कूंवा तहां अमृत का वासा ।

सगुरा होई सु भरि भरि पिवे ,निगुरा जाई पियासा ॥

गोरखनाथ के भोजपुरी कविता भले बहुत ढेर न होखो बाक़िर भोजपुरी मन मिजाज प उनकर असर बहुत बा। एकर वजह ई बा कि गोरखनाथ जी घूमन्तू सिद्ध रहली. ऊंहाँ के पूरा भारत घूमत रहीं . गुजरात से लेके बंगाल आ उड़ीसा ले आवत जात रहलीं. बाक़िर उन कर ढेर समय गोरखपुर धइले पूरब में बीतल. जवने में भोजपुरी इलाका ढेर बा .गोरखपुर में आजुओ गोरखनाथ पीठ एकर भारी प्रमाण बा. एकरे अलावा गोरखनाथ के कहानी अपना के गोरखपंथी माने वाला जोगी लोगन के उपस्थिति कहि रहल बा.

गोरखपुर से लेके नेपाल धईले देवरिया आ कुशीनगर के इलाका मे जोगिन के गाँव के गाँव मिलेला. ई जोगी लोग हिन्दू आ मुसलमान दूनों धरम से जुडल बा. बाक़िर ई लोग गोरखनाथ आ कबीर के आपन गुरु बतावेला – ‘गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ/मगहर में संत कबीर/आजमगढ़ में बाबा भैरवनाथ/तीनों एक तपस्वी जीव/ले ल गुरू जी का नाम ’. गोरख नाथ के परंपरा ई जोगी लोग गाँव-गाँव एक तारा प गोपीचन्द आ राजा भरथरी के गीत गावत घूमेला. जोग बैराग के एह गीतिन में दर्द के आ ई सान तीस रहेला कि सुनवइया के लोर छुवे लगेला. बंगाल के बाउल गीति के चर्चा बहुत होला ,बाक़िर ठेठ भोजपुरी के ई जोगिया गीति कवनों तरे ओसे कम नइखे. गोपीचन्द से जुडल एगो गीति देखल जाँ-‘केहू ना चीन्ही गोपीचन्द/केहू ना चीन्ही /माई न चीन्ही/बहिना ना चीन्ही/जोगी क सुरतिया नाहीं विरना/बहिनिया नाहीं चिन्हेले’. गोपीचन्द के कहानी क़हत क़हत कवने तरे ई जोगी लोग राम वनगमन के करूण कहानी प आ जाला ई कहल मुश्किल बा । अरे राम के माई बनवा भेजवलू/भरत के देहलू राजगद्दी/बताव माई राम कहिया ले अइयन/अरे पतझर बगिया में फूलवो न फूलेला/भंवरों ने खिलेला फूलवो न फूलेला/बताव माई राम कहिया ले अइहन’।

एही माहौल मे गोपीचन्द के महतारी मयनावती दर्द जोगी लोग के कंठ से फूटि परेला –‘अरे इतना बचनिया हो माई /भर-भर माई रोयेली/फटही गुदरिया हो माई/झरि-झरि रोयेली/कौने करनिया हो बचवा/बनल तू जोगी हो/अरे जनम देहलू हो माई/अरे करम न देहलू हो माई/अरे बारह बरसवे हो बचवा बन गइल जोगी हो/अरे बड़-बड़ तपस्या हो बचवा/बड़-बड़ पूजवा हो गोपीचन्द’. केतना पूजा पाठ आ केतना तपस्या से गोपीचन्द के जनम भईल बाक़िर घर दुवार छोड़ी के जोगी हो जा ताने. एही तरे राजा भरथरी के जोगी भइले के कहानी भी बहुत करुण बा. आपन राज पाठ छोड़ि के भरथरी जोगी हो जा ताने -अमर राजा भरथरी /छोड़े गढ़ उज्जैन का राज/ हथवा लिये संरगिया /बना है राजा भिखरिेया हो/गुदरिया गला में डाले भरथरी /राजा भरथरी बना भिखारी/राजपाट बिसराई’. जोगिया गीतिन मे ई सवाल बहुत भीतर से उभर रहल बा कि कवने कारण इसन राजा लोग जोगी हो जाता । ओकर एगो जवाब ब कि –‘गोरख के अजब/तन में भस्म रमाई/राजा बना भिखरिया हो ’. गोरख के भस्म लगा के लोग जोगी हो जा ता । जोगिन ई गीति कब लिखा ईल ,के लिखल कहल मुश्किल बा । बाक़िर ई बाति एकदम साफ बा कि भोजपुरी कविता के ई जोगिया रूप गोरखनाथ के समय से चलल चलि आवत बा. एह जोगिया कविता के अलगा से देखल जाँ त भोजपुरी जीवन के मोह छोह आ सथही माया मोह से ऊपर उठला के क्षमता , दूनहूँ मिलेला. हमके त ई बुझाला जे गोरख बानी के मर्म ए जोगी लोग के गीतिन के जरिये भोजपुरी मन आ समाज में बसि गईल. भोजपुरी में गोरख बानी के अर्क परि गईल बा . एसे इहो पता चलेला कि भोजपुरी कविता में जीवन के दार्शनिक सच्चाई के गवलेके क्षमता बा. ई क्षमता कवनों एक दू दिन से नाही गोरखनाथ के समय से बा । भोजपुरी के ई दार्शनिक गहराई शास्त्र के चुनौती दे रहल बा. हर तरह के पाखंड के चुनौती दे रहल बा. प्रभुता आ प्रभुताई के चुनौती दे रहल बा. ई बता रहल बा कि कवनों अइसन चीज नइखे जवने के गरब कईल जा.  न बेद ,न शास्त्र ,न जाति, न वर्ण । सब असही बा । एसे भलाई धीरे धीरे चलला में बा । सहजे रहला मे बा । भोजपुरी कविता शुरुवे से जीवन मे सहजता के आ ओकरे सुंदरता के बता रहल बा आ हर ओ चीज के खारिज कई रहलिबा जवान आदमी के कवानों भी तारे छोत बनवाले के कोशिश कर रहल बा .

हबकि न बोलिबा ,ठबकि न चलिबा धीरे धरिबा पाँव ।

गरब न करिबा सहजै रहिबा भनत गोरख राव । ।

(जोगिया गीत के उद्धरण श्री मनोज कुमार सिंह के लेख से मिलल बा।)

 

 

प्रो सदानन्द शाही

प्रो सदानन्द शाही

 

 

सदानंद शाही बीएचयू में हिंदी के प्रोफेसर हैं

 

 

 

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