छह दिन तक इलाज के लिए अस्पतालों में भटकता रहा प्रवासी कामगार, मौत

प्राइवेट अस्पताल ने 75 हजार वसूले , बीआरडी मेडिकल कालेज ने भर्ती नहीं किया

कुशीनगर। सूरत से लौटे एक प्रवासी कामगार मनोज कुशवाहा की 24 अप्रैल की रात जिला अस्पताल में सांस सम्बन्धी दिक्कत से मौत हो गई। कामगार की बीमारी के सभी लक्षण कोरोना से मिलते-जुलते थे। परिजन मनोज कुशवाहा को लेकर छह दिन तक छितौनी, पडरौना से लेकर गोरखपुर तक अस्पतालों का चक्कर लगाते रहे लेकिन उसकी जान बचाने में कामयाब नहीं हो सके। मनोज कुशवाहा के भाई ने कहा कि उसके भाई की जान इलाज में लापरवाही से हुई है। सरकारी अस्पातल में ठीक से इलाज नहीं हो रहा है और प्राइवेट अस्पताल खून चूस ले रहे हैं।

छितौनी नगर पंचायत क्षेत्र के बडहरवा टोला निवासी 35 वर्षीय मनोज कुशवाहा सूरत में टक चलाने का काम करते थे। वह 18 अप्रैल को सूरत से घर लौटे। उस समय उन्हें बुखार था और सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।

मनोज कुशवाहा के छोटे भाई संजय कुशवाहा ने बताया कि बुखार और सांस लेने में दिक्कत को देखते हुए घर पहुंचने के एक घंटे बाद ही हम लोग तुर्कहा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले गए। वहां मौजूद चिकित्सक ने मनोज को जिला अस्पताल ले जाने को कहा। परिजन रात में जिला अस्पताल पहुुचे। वहां मनोज कुशवाहा को भर्ती कर लिया गया लेकिन कई घंटे तक उन्हें कोई चिकित्सकीय सहायता नहीं मिली। हालत बिगड़ते देख परिजन मनोज को पडरौना के एक प्राइवेट अस्पताल में लेकर चले गए। वहां 24 अप्रैल तक मनोज का इलाज चला। अस्पताल मेें कई बार आक्सीजन की दिक्कत हुई। संजय के अनुसार वे लोग कई बार आक्सीजन का किसी तरह इंतजाम किया।

संजय ने बताया कि प्राइवेट अस्पताल ने छह दिन के इलाज में 75 हजार रूपए ले लिए। इसके बावजूद भाई की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अस्पताल ने मनोज को बीआरडी मेडिकल कालेज गोरखपुर ले जाने को कहा। हम लोग मनोज को लेकर 24 अप्रैल की शाम को बीआरडी मेडिकल कालेज पहुंचे। बीआरडी मेडिकल कालेज में मनोज कुशवाहा को भर्ती नहीं किया। वे लोग पूरी रात गोरखपुर के कई निजी अस्पतालों में मनोज को भर्ती कराने के लिए दौड़ते रहे लेकिन किसी भी अस्पताल ने भर्ती नहीं किया। वे लौटकर फिर पडरौना आ गए और जिला अस्पताल लेकर गए। जिला अस्पताल में भर्ती होने के कुछ घंटे बाद मनोज कुशवाहा की मौत हो गई।

संजय का कहना है कि यदि जिला अस्पताल में भाई का ठीक से इलाज हुआ होता तो उसकी जान बच सकती थी। जिला अस्पताल में लापरवाही हुई और प्राइवेट अस्पताल ने उन्हें चूस लिया। रोज तमाम जांच कराते, दवा खरीदवाते लेकिन यह नहीं बताते कि मनोज की स्थिति क्या है ? संजय ने कहा कि हालात बहुत खाराब हैं। प्राइवेट अस्पताल ‘ गब्बर द बैक ’ फिल्म की तरह मृतकों से भी पैसा बना रहे हैं। वे सामान्य लोग हैं। उनके पास कोई सोर्स नहीं है, इस कारण सरकारी अस्पताल में भाई को इलाज नहीं मिला।

संजय कुशवहा ने बताया कि सरकारी और निजी अस्पताल ने भाई की कोराना जांच नहीं की। कभी वे सांस की बीमारी बताते तो कभी मलेरिया की। मौत के बाद सरकारी कर्मचारी घर आए और घर के आस-पास सैनिटाइजेशन किया।