लोकरंग

‘लोकरंग ’ का डेढ़ दशक का सफर

गोरखपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर कुशीनगर जिले के एक गांव जोगिया जनूबी पट्टी में हर वर्ष आयोजित होने वाला लोक संस्कृति का उत्सव ‘ लोकरंग ’ इस बार 14-15 अप्रैल को आयोजित हुआ। इस वर्ष के आयोजन के साथ ही वर्ष 2008 से शुरू हुई इस यात्रा ने डेढ़ दशक का सफर पूरा कर लिया।

इस आयोजन ने देश ही नहीं विदेश में भी लोक संस्कृति में रूचि लेने वालों का ध्यान आकर्षित किया है। हर वर्ष आयोजन में दूर-दूर से सांस्कृतिक टीमों के अलावा लेखक, साहित्यकार, रंगकर्मी और बुद्धिजीवी इसे जानने-समझने आते हैं।

लोकरंग की यात्रा 2008 में जोगिया गांव शुरू हुई थी। इसी गांव के निवासी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा और उनके साथियों ने महसूस किया कि लोक संस्कृति के नाम पर फूहड़पन, भड़ैंती के विरूद्ध एक ऐसा मंच तैयार किया जाए जहां लोग अपनी लोक संस्कृति, लोक कला से परिचित हों, लोक कलाओं के संरक्षण और विकास के लिए आगे आएं। इसी उद्देश्य से लोक रंग सांस्कृतिक समिति की स्थापना की गयी और इसके जरिए लोकरंग का आयोजन शुरू हुआ।

पहला लोकरंग कार्यक्रम वर्ष 2008 में हुआ। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के उन लोक गीतों, लोक नृत्यों, लोक कलाओं को मंच दिया गया जो अब गायब हो रहे हैं। साथ ही इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से जनवादी चेतना से लैस सांस्कृतिक टीमों को भी बुलाया गया। यह कार्यक्रम गांव के ही एक नौजवान मंजूर आलम के घर के अहाते में हुआ था।

तीन आयोजनों के बाद ही कार्यक्रम स्थल छोटा पड़ने लगा तो सुभाष कुशवाहा ने गांव के किनारे अपनी जमीन इस काम के लिए दे दी और यहां पर एक विशाल मुककाशी मंच और कलाकारों के ठहरने के लिए दो हाल भी बन गए। इस जगह पर हर वर्ष अप्रैल के महीने में दो दिवसीय लोकरंग का आयोजन होता है जिसमें हिस्सेदारी के लिए कई प्रदेशों से रंगकर्मियों-कलाकारों की टीम आती है। दोनों रात सांस्कृतिक दल अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। दिन में संगोष्ठी होती है।

डेढ़ दशक में लोकरंग ने यूपी, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट आदि प्रदेशों के लोक नृत्य, लोक गीत, लोकनाट्य की तमाम विधाओं, शैली से इस इलाके के लोगों को परिचित कराया है। इसके साथ ही हर आयोजन के साथ प्रकाशित होने वाली स्मारिका/पुस्तक में भुला दिए गए विभिन्न लोक विधाओं, गीतों पर शोध परक लेख छापे हैं, लोक गीतों, बाल गीतों को संग्रहित किया है। बिसरा दिए रसूल मियां और उनके गीत को सामने लाने का भी महत्वपूर्ण कार्य ‘ लोकरंग ’ ने किया है।

इस वर्ष यह आयोजन 14-15 अप्रैल को हुआ। नागपुर से आयी आम्रपाली लावणी डांस ग्रुप ने पहली रात लावणी नृत्य तो दूसरी रात गोंधळ और कोली लोकनृत्य प्रस्तुत किया। राजस्थान के बाड़मेर से आए भुंगरखान मंगणियार और उनके साथियों ने दोनों रात राजस्थानी लोक नृत्य व गीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। भागलपुर बिहार की ‘ताल’ नृत्य संस्थान ने झिझिया, गोदना और जट-जटिन लोकनृत्य व डोमकच नृत्य नाटिका की प्रस्तुति दी।

पटना की नाद संस्था ने ‘ मृदंगिया ’ और आजमगढ़ की सूत्रधार संस्था ने 1857 विद्रोह के गुमनाम नायक ‘ बोधू सिंह अहीर ’ के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन किया।

स्थानीय टीमों द्वारा झूमर गीत, बांसुरी वादन, जांघिया और पंवरिया नृत्य प्रस्तुत किया किया गया।

 

नीदरलैंड के राजमोहन गीत, गजल, भजन, पाॅप गायक, कम्पोजर, कवि और लेखक हैं। वह 2017 में पहली बार लोकरंग में आए थे और गिरमिटिया मजदूरों की जीवन की कहानी को अपने गीत के जरिए प्रस्तुत किया। राजमोहन के पुरखे बस्ती जिले के एक गांव से 1908 में सूरीनाम गए थे। उनके गीतों में गिरमिटिया मजदूरों के दु:ख, संघर्ष और सपने हैं। इस वर्ष वह तीसरी बार लोकरंग में आए और अपनी प्रस्तुति दी।

लोकरंग के मंच पर पूर्वांचल की जांघिया, पवंरिया, अहिरउ नृत्य कई टीमों द्वारा प्रस्तुत किया गया है लेकिन इस बार आजमगढ़ की इप्टा ने जांघिया और पवंरिया लोक नृत्य की प्रस्तुति और कोरस में लड़कियों को शामिल कर लोक विधाओं में पुरूष वर्चस्व को तोड़ने का काम किया। इसके पहले भी लोकरंग में आल्हा गायन में पुरूषों का एकाधिकार तोड़ने वाली शीलू राजपूत ने अपनी प्रस्तुति दी थी। सही मायनों में लोकरंग को इसी तरह के बदलावों का मंच बनना चाहिए।

लोकरंग में गाजीपुर की चित्रकारों की संस्था संभावना कला मंच ने एक अलग रंग ही भरने का काम किया है। संभावना कला मंच के कलाकार अपने कविता पोस्टर, भित्ति चित्र और संस्थापन कला से पूरे गांव को एक कला गांव में तो बदल देते ही हैं, कला को सीधे गांव और लोक से जोड़ने का महत्वपूर्ण काम भी करते हैं।

इस बार संभावना कला मंच की 11 सदस्यीय टीम ने गाँव के बखारों और दीवारों पर आकर्षक लोकचित्र उकेरे। इन चित्रों में हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं के प्रतिरोध को भी दर्ज किया गया था।

लोकरंग में इस बार कई जाने-माने लेखक, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए जिनमें प्रो राम पुनियानी, प्रो चौथीराम, प्रो रतन लाल, प्रो संजय कुमार, प्रो दिनेश कुशवाह, प्रो सूरज बहादुर थापा, वरिष्ठ कवि बी आर विप्लवी, डॉक्टर राम प्रकाश कुशवाहा, गाँव के लोग पत्रिका के सम्पादक रामजी यादव, अपर्णा, नेपाल से आयीं उषा तितिक्षु, कथाकार श्याम साह के नाम उल्लेखनीय हैं।

लेखक, साहित्यकार, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने लोकरंग के दूसरे दिन ‘ लोक संस्कृति का जन जागरूकता से रिश्ता ’ विषयक गोष्ठी में अपने विचार रखे।

लोकरंग की गोष्ठियों पर विषय चाहे जो कुछ हो लेकिन घूम फिर कर बहस इसी पर केन्द्रित हो जाती है कि लोकरंग जैसे आयोजन कैसे विस्तारित और प्रभावी हों ? लोक संस्कृति में सब कुछ लोक पक्षधर नहीं होता है तो उसका परिष्कार कर कैसे जन संस्कृति का विकास करें ? लोक संस्कृति को जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, वर्चस्ववादी सांस्कृतिक मूल्य से कैसे मुक्त करें ? गहरे तक पैठी पिछड़ी चेतना जो अब आत्मघाती रूप लेती जा रही है उससे कैसे संघर्ष किया जाए ? इस बार की गोष्ठी में भी ये सवाल चिंतन के केन्द्र में रहे। इस बात पर पर भी गंभीर चर्चा हुई कि सत्ता, पूंजी और विभाजनकारी ताकतें सामाजिक चेतना बदलने के लिए लिए नियोजित तरीके से लोक कला-लोकसंस्कृति का इस्तेमाल कर रही हैं, उसका मुकाबला कैसे किया जाए ?

लोकरंग ने लोक कलाओं के प्रति एक हद तक लोगों के नजरिए में बदलाव लाने का काम किया है। इस तरह के कुछ आयोजन दूसरी जगहों पर भी होने लगे हैं और वहां लोक कलाकारों बुलाया जा रहा है। जन सहयोग से डेढ दशक तक किसी अभियान को जारी रखना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी लेकिन जिस तरह बाजार और सत्ता आपस में मिलकर लोक संस्कृति के नाम पर फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, मर्दवाद और विभाजन की संस्कृति परोस और प्रोत्साहित कर रहे हैं उसका मुकाबला अब साल के दो दिन के आयोजन और लोक कलाओं के प्रदर्शन मात्र से नहीं होने वाला है। अब यह 365 दिन की लड़ाई से ही संभव है और इसके लिए संगठित प्रयास ही फलीभूत होंगे।