कुशीनगर जनपद महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली के कारण दुनिया में मशहूर है लेकिन स्थानीय तौर पर यह जिला समय-समय पर अलग-अलग कारणों से भी जाना जाता रहा है। चार दशक पहले इसकी गंडक, गन्ना और गुंडा के नाम से पहचान रही।
नेपाल से निकलकर बड़ी गंडक नदी महराजगंज के निचलौल इलाके से होते हुए कुशीनगर जनपद में प्रवेश करती है और खड्डा, पनियहवा, तमकुहीराज होते हुए बिहार में चली जाती है। बड़ी गंडक की बाढ़ से होने वाली बर्बादी की एक अलग कहानी है।

कुशीनगगर दो दशक पहले मैत्रेय प्रोजेक्ट और इंटरनेशनल एयरपोर्ट की वजह से चर्चा में आया। दो दशक तक चले किसान आंदोलन के कारण मैत्रेय प्रोजेक्ट की यहां से विदाई हो गई लेकिन सरकार ने अभी तक 750 एकड़ जमीन किसानों को वापस नहीं की है। छह सौ एकड़ से आधिक जमीन लेकर एयरपोर्ट तो किसी तरह बन गया और पिछले विधान सभा चुनाव के पहले इसका उद्घाटन भी हो गया लेकिन विधिवत उड़ान अभी तक शुरू नहीं हो पायी है।
लेकिन बुद्ध की यह धरती अब एक नए सांस्कृतिक पहचान के कारण भी जाने जानी लगी है। यह नई पहचान है ‘लोकरंग’। ‘ लोकरंग ‘ लोक कला की विभिन्न विधाओं के प्रदर्शन का मंच है जो इस जिले के जोगिया गांव में होता है। कथाकार ओर अब इतिहास की किताबें लिखने के कारण इतिहासकार कहलाने वाले सुभाष कुशवाहा के जोगिया गांव में 2008 में लोकरंग की शुरूआत एक प्रयोग के बतौर हुई। यह प्रयोग था कि सैकड़ों वर्षों से पुरानी लोककलाओं के विविध रूपों से जन समान्य को परिचित कराने के साथ-साथ उनमें युगानुरूप बदलाव तथा फूहड़पन, अश्लीलता, हिंसा, विरूदावली को लोक संस्कृति की पहचान बनाने के खिलाफ संघर्ष करते हुए, लोक कलाओं के संरक्षण और विकास के जरूरी कोशिश करना।
इस प्रयोग को उस समय ही एक बड़ी चुनौती मिली जब मानसिक रूप से अस्वस्थ एक महिला को देवी घोषित कर उसके हाथ से पानी पीने के चमत्कारिक प्रभाव को प्रचारित किया गया। हालात यह हो गए कि वहाँ हजारों लोग आने लगे और ‘चमत्कारिक पानी’ उपलब्ध कराने के लिए इस बड़े तमाशे को नियोजित करने वालों ने बोरिंग करा दी।
अंधविश्वास के इस संगठित खेल की पृष्ठभूमि में 23-24 मई 2008 को पहला लोकरंग का आयोजन हुआ।

शहीद भगत सिंह पूर्वांचल सेवा संस्थान ने जनसंस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ के सहयोग से इस आयोजन को किया। तभी से यह सिलसिला जारी है। आगे बढ़ते हुए इस आयोजन ने अब खुद को संस्थाबद्ध कर लिया। अब इसे गांव के लोगों की संस्था लोकरंग सांस्कृतिक समिति कराती है और इसके पास अपना सांस्कृतिक परिसर, मंच, कलाकारों के ठहरने और रिहर्सल करने के कमरे हैं। इस आयोजन के खर्च स्थानीय लोगों के साथ-साथ आयोजन के समर्थक जुटाते हैं। हर वर्ष आयोजन में लोकरंग नाम से पत्रिका प्रकाशित होती है जिसमें लोक संस्कृति के विविध पहलुओं पर शोधपरक लेख होते है।
लोकरंग के शुरूआती आयोजनों में भोजपुरी क्षेत्र की लोक कलाओं को मंच मिला जो बाद में विस्तारित होते हुए देश के अन्य राज्यों की लोक नृत्य, गायक व लोक नाट्य से जुड़ा। इन राज्यों में झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश प्रमुख हैं। हर वर्ष इन राज्यों से लोक कलाकार अपने कलाओं का प्रदर्शन करने आते हैं। अब इंडियन डायस्पोरा की लोक कलाएं भी लोकरंग से जुड़ गई हैं। दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैण्ड, मारीशस से आये कलाकार अपने देश के भोजपुरी भाषी लोगों के गायन, नृत्य का प्रदर्शन कर चुके हैं। लोक संस्कृति में रूचि रखने वाले लेखक, साहित्यकार, रंगकर्मी और बुद्धिजीवी भी बड़ी संख्या में लोकरंग में शामिल होने आते हैं।
इस वर्ष ‘ लोकरंग ’ का आयोजन 15-16 अप्रैल को हुआ। इस बार झारखंड का खड़िया आदिवासी नृत्य, बिहार का थारु नृत्य और मध्य प्रदेश का भगोरिया, बधाई व नौरता लोकनृत्य प्रमुख आकर्षण रहा। पश्चिमी चम्पारण के कलाकारों ने थारू नृत्य व गीत से खेती किसानी की संस्कृति को जीवंत किया। सुल्तानपुर के लखराज लोककला मंच का अवधी बिरहा गायन में अलग प्रयोग दिखा। बृजेश यादव ने बिरहा गायन के जरिये जातिभेद, अधविश्वास व अंधभक्ति पर करारी चोट की।

