गोरखपुर। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर आज शाम पाँच बजे प्रेमचंद पार्क में प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा ‘ प्रेमचंद की दुनिया’ शीर्षक संवाद का आयोजन किया गया।
संवाद में बोलते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल कुमार राय ने कहा कि प्रेमचंद साहित्य संस्थान तीन दशक से अधिक समय से प्रेमचंद के विचारों को समाज के बीच ले जाने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने भारतीय समाज के वर्चस्व की संरचनाओं की ठीक से पहचान की थी और अपने लेखनी से उसको समाज के सामने उजागर किया। उन्होंने धर्म, संस्कृति, दलित अस्मिता, स्त्री अस्मिता, शिक्षा, राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता के सवालों से मुठभेड़ करते हुए आज़ादी के साथ बनने वाले नये भारत का खाका खींचा। उनकी सभी रचनाओं में देश-समाज के यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति है।
संगोष्ठी के अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लेखक एवं व्यंग्यकर रणविजय सिंह ने कहा कि प्रेमचंद साहसी लेखक थे। उन्होंने सत्ता से आँख से आँख मिलाकर समाज की सचाई को बयान किया।

संवाद की प्रस्तावना रखते हुए युवा आलोचक डॉ. राम नरेश राम ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में उनकी भविष्य की दृष्टि उन्हें आज के दौर में प्रासंगिक बनाती है। उनका साहित्यक, सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टिकोण हम सभी को एक नया राह दिखाता है।
लेखक जयप्रकाश मल्ल ने अपने अपनी साहित्य की यात्रा के बारे में विचार साझा करते हुए कहा कि प्रेमचंद के उपन्यास कर्मभूमि ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। प्रेमचंद की रचनाओं से आज की समस्याओं को गहराई से समझने में सहायता मिलती
वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा की प्रेमचंद ने अपने समय में राष्ट्र निर्माण में बाधक वर्ण व्यवस्था, सांप्रदायिकता और स्त्री की पराधीनता पर स्पष्ट विचार रखे और इसे पोषित करने वाली ताकतों पर करारी चोट की। आज ये तीनों प्रश्न नए स्वरूप में हमारे सामने खड़े हैं। प्रेमचन्द जानते थे कि देश-समाज की नई रचना के नायक किसान, मजदूर, स्त्री, दलित और युवा होंगे, इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं का मुख्य पात्र इन्हें ही बनाया। आज जाति, धर्म, भाषा, जेंडर और संस्कृति के नाम पर देश-समाज में विभाजन को गहरी करने वाली ताकतों के खिलाफ लेखकों को उसी तरह अपनी कलम उठानी होगी जैसा अपने समय में प्रेमचंद ने किया।

वरिष्ठ आलोचक और लेखक कपिलदेव ने कहा कि प्रेमचंद ने हमारे सामने साहित्य के नए मानदंड रखे। हमने प्रेमचंद को महान तो बनाया पर उनको ठीक से गहन नहीं कर पाए।
संवाद का संचालन कर रहे प्रेमचंद साहित्य संस्थान के सचिव प्रोफ़ेसर राजेश मल्ल ने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी लेखनी से सत्ता, धर्म और समाज में मौजूद जड़ताओ पर कठोर प्रहार किया।
धन्यवाद ज्ञापन लेखक-नाटककार आनंद पांडेय ने किया।

कार्यक्रम में पत्रकार अशोक चौधरी, डॉ सुजीत कुमार सिंह, कामिल ख़ान, सुनीता अबाबील, श्रवण कुमार, जे जे एन शाह, रामू सिद्धार्थ ,डॉ. नरगिस बानो, अभय शुक्ल, शोधार्थी पवन कुमार, राजू मौर्य, रणजीत कुमार, आशीष मिश्र, रिंकी प्रजापति, पद्मिनी मल्ल, नीतू, हरिश्चंद्र, आकाश यादव, अखिलेश्वेर पांडेय अभिषेक कुमार आदि शोधार्थियों की उपस्थिति रही।
