कवि-लेखक-संस्कृतिकर्मी अजय कुमार की स्मृति में मऊ में विचार गोष्ठी और काव्य-संध्या का आयोजन
मऊ। राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ और जन संस्कृति मंच द्वारा संयुकर रूप से 24 अगस्त को कवि-लेखक-संस्कृतिकर्मी अजय कुमार की याद में सृजनपीठ के सभागार में ‘कविता का समाज और समाज की कविता’ विषय पर विचार गोष्ठी व काव्य-संध्या का आयोजन किया गया।
गोष्ठी के आरंभ में डॉ.राम शिरोमणि व उनके साथी तथा आँचल व जाह्नवी ने ‘तू जिंदा है तो जिंदगी पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर ‘ गीत प्रस्तुत किए।
विचार गोष्ठी के प्रथम सत्र में आधार वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए डॉ. जयप्रकाश ‘धूमकेतु’ ने बताया कि अजय कुमार एक कवि के साथ-साथ रंगकर्मी भी थे। उनका नाता राजनीति, साहित्य और संस्कृति तीनों से था। उन्होंने हिंदी और उर्दू की एकता पर बड़ा काम किया। प्रगतिशील आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

मुख्य वक्ता डॉ. दिनेश कुशवाह ने कहा कि कविता मनुष्यता की मातृभाषा है। कविता ने कथनी और करनी के भेद और एकता पर बहुत विचार किया है। आज विचार शून्यता के दौर में सवाल उठता है कि क्या कविता का समाज बचा है या समाज में कविता बची हुई है ? समाज की कविता वही कविता बनती है जो जीवन प्रसंग में काम आए । समाज में बड़ा आंदोलन होता है तो बड़ी कविता भी आती है। हमें विचार करना होगा कि कविता समाज को आकर्षित क्यों नहीं कर पा रही है ? आज समाज का नायक कोई कवि क्यों नहीं है जो कि एक समय हुआ करता था उन्होंने कविता की अपठनीयता का सवाल उठाते हुए कहा कि कविता शास्त्रीय जकड़न को तोड़ते रहन चाहिए और उसे छंद व मुक्त छंद के बीच आवाजाही करते रहना चाहिए। समकालीन कविता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह बदल रहे या बदल गए शब्दों के अर्थ को बचाए। शब्द और अर्थ की रक्षा करे।
कवि-आलोचक रघुवंश मणि ने कहा कि जब हम किसी समय के साहित्य का अध्ययन करते हैं तो हम उसके जरिए उस समाज और जीवन को जानते हैं। भाषा स्वयं में जीवनरूप है। कविता में जीवन ज्यादा संश्लिष्ट रूप में आता है। कविता पर समय की पारिस्थतिकी, काल खंड के साथ साथ कविता रच रहे लोग भी प्रभाव डालते हैं। कविता को पढ़ते हुए हम कवि की नागरिकता, राजनीति , समाज का आर्थिक स्वरूप , कवि की अपने समय में अवस्थिति सहित कई चीजों को देखते हैं। जटिल से जटिलतर होते जा रहे समय में समकालीन कविता का संबंध समाज और मनुष्य है। कवि की नागरिकता के साथ उसका प्रतिबद्ध दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण है। कविता में मिरर की तरह सीधे समाज का प्रतिविम्बन नहीं होता। कविता की टेक्निक उसे सीधा नहीं रहने देती। कविता सापेक्षिक स्वततंत्रा के साथ समय से आगे चलती हुई मानवीय सारतत्व तक पहुँचती है और इस तरह वह अपने समय के समाज को अतिक्रमित करते हुए नए मूल्य स्थापित करती है।
दिवाकर सिंह ने कहा कि वर्तमान में मानव जीवन बहुत त्रासदी भरा है। आज भी समाज का बहुत बड़ा हिस्सा बहुत दुःख भरा जीवन व्यतीत कर रहा है। कविता में समाज की दुःख-त्रासदी अभिव्यक्त होनी चाहिए।
सुप्रसिद्ध कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि कवि भविष्यद्रष्टा होता है। उसे सत्ता नहीं बल्कि समाज के लिए कविता लिखनी चाहिए। शिवकुमार पराग ने कविता की रचना प्रक्रिया के संदर्भ बात करते हुए बताया कि कविता तब बनती जब आप उसे हृदय से महसूस करते हैं। कविता हमें काभी नाउम्मीद नहीं करती।
कार्यक्रम के प्रारंभ में जन संस्कृति मंच के महासचिव ने कवि-लेखक एवं संस्कृतिकर्मी अजय कुमार की याद को साझा करते हुए जन सांस्कृतिक आंदोलन में उनके योगदान की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि साहित्य-कला की तमाम विधाओं में उनकी सृजनशीलता हमें अचंभित करती है। वे पूरे जीवन भर साझी संस्कृति और विरासत को जीते रहे और उसके लिए काम करते रहे। हिंदी भवन और तिलक पुस्तकालय के काम-काज को उन्होंने नई ऊँचाइयाँ दी। उनको याद करना समाज को विभाजित करने वाले ताकतों के खिलाफ एक बड़े सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने के लिए संकल्पबद्ध होना है। हमें ऐसा समाज और व्यवस्था बनाना है जिसमें मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र हो अपनी समूची सृजनशीलता को साकार कर सके।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र काव्य-संध्या में वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव, दिनेश कुशवाह, रघुवंश मणि, शिवकुमार पराग, विशाल श्रीवास्तव, राघवेंद्र सिंह, मनोज सिंह, सुनीता अबाबील, जितेंद्र मिश्र ‘काका’ ,धनञ्जय शर्मा, अनुपमा, पंडित राजेश, योगेंद्र पाण्डेय ,इम्तियाज तथा बृजेश ने कविता पाठ किया।
गोष्ठी का संचालन जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव डॉ. रामनरेश आज़मी तथा धन्यवाद ज्ञापन ओमप्रकाश सिंह ने किया।
गोष्ठी में मुख्य रूप से, अनुभवदास शास्त्री, बाबूराम पाल, रामावतार सिंह, अब्दुल अज़ीम खां, रामकुमार भारती, अरविन्द मूर्ति, डा. त्रिभुवन शर्मा, बसंत कुमार, डॉ.तेजभान, डॉ.प्रवीण यादव, रामजी सिंह, रामहर्ष मौर्य, ओमप्रकाश गुप्ता, साधु, विद्या कुशवाहा, नीतू यादव, निशा यादव,पुंजय, सुबाष चक्रदेवा, आदि उपस्थित रहे।




