साहित्य - संस्कृति

चरथ भिक्खवे-2 : विश्व शांति के लिए बुद्ध की नदी रोहिन की यात्रा करेंगे लेखक-कलाकार

 गोरखपुर। बुद्ध की करुणा, मैत्री, विश्व शांति के लिए साहित्यिक सांस्कृतिक यात्रा ‘ चरथ भिक्खवे ’ का दूसरा चरण 5-12 अक्टूबर को शुरू हो रहा है। यह यात्रा बुद्ध की नदी रोहिन के उद्गम स्थान नेपाल के देवदह से शुरू होकर गोरखपुर तक होगी जहां रोहिन और राप्ती नदी का मिलन होता है। इस यात्रा में पिछले वर्ष की तरह कवि, लेखक, कलाकार, इतिहासविद् और समाजशास्त्रियों का समूह शामिल हो रहा है।

साखी शोध कार्यशाला द्वारा आयोजित इस यात्रा में बौद्ध स्थलों का भ्रमण, स्थानीय लोगों से संवाद के साथ-साथ विचार गोष्ठी व काव्य पाठ के कार्यक्रम भी होंगे।

यह जानकारी यात्रा के संयोजक प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक और बीएचयू के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो सदानंद शाही ने एक विज्ञप्ति में दी। प्रो शाही ने बताया कि ‘ चरथ भिक्खवे ’ की शुरुआत पिछले वर्ष 15-24 अक्टूबर2024 को बौद्ध स्थलों के भ्रमण से हुई थी। यह यात्रा सारनाथ से बोधगया, नालंदा, राजगीर, वैशाली, कुशीनगर, लुम्बिनी, कपिलवस्तु, श्रावस्ती, कौशाम्बी होते हुए सारनाथ पर सम्पन्न हुई थी।

‘ चरथ भिक्खवे ‘ की पृष्ठभूमि में ‘बुद्ध की धरती पर कविता ’ शीर्षक यात्रा- कुशीनगर (2019), लुम्बिनी (2020),बोधगया (2022), सारनाथ (2023) और कुशीनगर (2023) है।

उन्होंने कहा कि रोहिन नदी का बुद्ध के जीवन से गहरा संबंध है। बुद्ध के वैराग्य के मूल में रोहिन नदी के जल को लेकर शाक्य और कोलिय लोगों के बीच होता आया विवाद था। पालि ग्रंथ में इसके प्रमाण मौजूद हैं। जिनके आधार पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर (बुद्ध और उनका धम्म, पृष्ठ73-80) और धर्मानंद कोसंबी जैसे बौद्ध साहित्य के अध्येता ने बुद्ध के वैराग्य के मूल में रोहिन नदी जल विवाद को कारण माना है। रामग्राम के कोलिय और कपिलवस्तु के शाक्यों के बीच रोहिन के पानी के लिए युद्ध की नौबत आ गयी थी जिसे बुद्ध ने संवाद और पंचायत के जरिए रोका।

चरथ भिक्खवे-दो में रोहिन नदी के तट की यात्रा की पहली वजह बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण के पीछे की इस सच्चाई को जानना और इसे लोग तक पहुंचाना है। दूसरी बात यह कि नदियों के साथ बुद्ध के रिश्ते को समझना है। साथ ही नदियों के हवाले से देश के सांस्कृतिक भूगोल को जानना। भारत नदियों का देश है। हजारों नदियां इस देशको रूप देती हैं। इस यात्रा में हम रोहिन नदी जो न केवल बुद्ध से बल्कि हमारे निकटतम पड़ोसी नेपाल से भी जोड़ती है, का हाल जान सकेंगे। केदारनाथ सिंह की कविता ‘ बिना नाम की नदी ’ हमें बताती है कि हमारा जीवन नदियों से और नदियों का जीवन हमसे किस तरह जुड़ा है। यह जुड़ाव जैसे-जैसे विच्छिन्न होता गया है, हमारे जीवन से नमी लुप्त होती गयी है। रोहिन नदी के साथ चलते हुए हम उस लुप्त हुई नमी का पुनराविष्कार करेंगे और बुद्ध की महाकरुणा का अवगाहन भी।

प्रो शाही ने बताया कि यात्रा में शामिल होने वाले कवि, लेखक, कलाकार, इतिहासविद् और समाजशास्त्री चार अक्टूबर को गोरखपुर से चलकर लुम्बिनी में एकत्र होंगे। लुम्बिनी और कपिलवस्तु के भ्रमण के बाद छह अक्तूबर को देवदह में रोहिन नदी के साथ यात्रा प्रारम्भ होगी जो महराजगंज जनपद के रतनपुर, चौक, टेढ़ीघाट, तीनमुहानी, कांधपुर, भौराबारी, गायघाट, दौलतपुर, बालापार, महेसरा होते हुए गोरखपुर में सम्पन्न होगी। गोरखपुर में यात्रा के समापन मौके पर 12 अक्टूबर को रामगढ़ ताल स्थित बौद्ध संग्रहालय में संगोष्ठी और कविता पाठ का आयोजन होगा।