साहित्य - संस्कृति

अकादमिक इतिहास को आम जनता की भाषा में उपलब्ध होना चाहिए : नज़ीर मलिक

गोरखपुर। गोरखपुर जर्नलिस्टस प्रेस क्लब में 30 नवंबर को ग़ैर अकादमिक इतिहासकार-पत्रकार  नज़ीर मलिक ने विमर्श केंद्रित संस्था ‘आयाम’ द्वारा ” इतिहास का सच और वर्तमान साम्प्रदायिकता ” विषय पर व्याख्यान दिया।

उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के हवाले से कहा कि पूरे मध्यकाल का इतिहास सामंतों, ओहदेदार, और राजाओं के ‘ साम्राज्य बचाओ और विस्तार करो ‘ की आपसी लड़ाई का दस्तावेज़ है जिसके पीछे कहीं से हिन्दू-मुसलमान या हिन्दुत्व और इस्लाम का कोई मुद्दा था ही नही। राजाओं के इस निजी स्वार्थ की जंग को राष्ट्रवादी, ग़ैर राष्ट्रवादी स्वरूप 19 वीं, 20 वीं शताब्दी के बीच अंग्रजों की सुनियोजित नीति के तहत दक्षिणपंथी इतिहासकारों द्वारा दिया गया जिसमें वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। वास्तव में पापुलर हिस्ट्री ही नहीं अकादमिक इतिहास को भी आम जनता की भाषा में उपलब्ध होना चाहिए।

कार्यक्रम की शुरुआत में नौगढ़ (सिद्धार्थ नगर) से पधारे वरिष्ठ लेखक-पत्रकार नज़ीर मलिक का उत्तरीय और स्मृति चिन्ह देकर ‘आयाम’ के संयोजक देवेन्द्र आर्य ने अभिनन्दन किया ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ विचारक प्रोफेसर चितरंजन मिश्र ने कहा कि इतिहासकार के रूप में नज़ीर मलिक का नज़रिया भारतीय नज़रिया है। इतिहास के प्रतिशोध पूर्ण चरित्र की चर्चा करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि आज के समय में इतिहास की चर्चा करने से बेहतर है, महान परम्पराओं की चर्चा की जाए जिसमें मानवीय विवेक रचा बसा है। महानताओं का झगड़ा अंग्रेजों का लगाया-कराया है। आम जनता नही बल्कि सत्ता व्यवस्था को धर्म निरपेक्ष होना चाहिए।

पूर्व प्राचार्य एवं सोशल एक्टिविस्ट असीम सत्यदेव ने कहा कि जहाँ 15 अगस्त अंग्रेज़ी साम्राज्य से आज़ादी का दिन है वहीं 26 जनवरी राजशाही से मुक्ति का दिन है जिसकी व्यापक चर्चा नहीं की जाती।

हिन्दी के चर्चित आलोचक डा. अरविंद त्रिपाठी ने जायसी के पद्मावत का उल्लेख करते हुए नज़ीर मलिक की बात को रेखांकित किया कि न केवल इतिहास बल्कि मध्यकाल के साहित्य में भी साम्प्रदायिकता का रोग नहीं दिखाई पड़ता है।

फिल्म उद्योग से जुड़े लेखक-रंगकर्मी नन्दलाल सिंह ने बालीवुड के भीतर घर करती जा रही साम्प्रदायिकता के अपने अनुभव से सभागार को सचेत किया।

अंग्रेजी के प्रोफेसर डा. गौर हरि बेहरा ने इतिहास लेखन को लेकर हिन्दी-अंग्रेजी भाषा की बाइनरी के ख़तरे का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमें इतिहास लेखन में सत्ता के नैरिटिव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

विमर्श के विभिन्न पहलुओं पर मध्यकालीन इतिहास के विद्वान डा. चन्द्र भूषण अंकुर तथा उर्दू में इतिहास लेखन के लिए चर्चित-पुरस्कृत डा. दरक्शां ताजवर और इमामुद्दीन मंसूरी ने सभागार का ध्यान आकृष्ट किया।

कार्यक्रम का संचालक अजय कुमार सिंह ने किया। सभागार में डा. भारत भूषण, कलीमुल हक़, शैलेन्द्र कबीर, सुभाष चौधरी, पत्रकार जगदीश लाल, नितिन अग्रवाल, कवि पत्रकार ओंकार सिंह, दिवाकर गुप्ता, मनोज कुमार, महेन्द्र कुमार, प्रदीप विश्वकर्मा, विकास दुबे, अम्बरीष आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।

Related posts