देवरिया। समान शिक्षा आंदोलन, उत्तर प्रदेश के सह संयोजक डॉ चतुरानन ओझा ने कहा है कि शिक्षा के लिए बजट आवंटन में मामूली वृद्धि केंद्र सरकार की शिक्षा के प्रति उदासीनता को उजागर करती है।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष से भारत की जीडीपी लगभग 9.8 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन केंद्रीय बजट में शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश में चिंताजनक गिरावट दिखती है। वर्ष 2026 के बजट में शिक्षा के लिए आवंटन में केवल 8.3 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जो स्वयं अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर से भी कम है। परिणामस्वरूप, नाममात्र जीडीपी के अनुपात में शिक्षा पर खर्च घट गया है और 0.35–0.4 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर ही अटका हुआ है।
यह साफ दिखाता है कि “ज्ञान अर्थव्यवस्था” बनाने, “जनसांख्यिकीय लाभांश” का उपयोग करने आदि के दावों के बावजूद शिक्षा सरकार की वास्तविक प्राथमिकता नहीं है। जब कोई क्षेत्र अर्थव्यवस्था की तुलना में धीमी गति से बढ़ता है, तो वस्तुतः उसे राष्ट्रीय संसाधनों का घटता हुआ हिस्सा मिलता है। दशकों की ऊँची-ऊँची बयानबाज़ी के बाद भी शिक्षा आज भी कुल केंद्रीय बजट का लगभग 2.5% ही पाती है। यह एक राजनीतिक संदेश है—जब कोई देश ज्ञान, नवाचार और युवाओं को अपनी प्राथमिकता बताता है पर शिक्षा पर बेहद कम खर्च करता है, तो यह विरोधाभास साफ़ दिखता है।
स्थिति को और गंभीर बनाता है ऐतिहासिक संदर्भ। कोठारी आयोग (1966) के समय से ही सरकारें शिक्षा पर जीडीपी के 6% खर्च का वादा करती रही हैं। “बजट का 10% शिक्षा पर” — यह जनता की एक प्रमुख माँग रही है। छह दशक बाद शिक्षा की हिस्सेदारी और भी घट गई है। इस बीच नामांकन बढ़ा है, बुनियादी ढाँचे की ज़रूरतें बढ़ी हैं, शिक्षक की कमी बदतर हुई है, और निजीकरण तेज़ी से बढ़ा है। बजट भाषणों में “विश्व-स्तरीय संस्थान” बनाने की बातें होती हैं, लेकिन आँकड़े बताते हैं कि आम स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की उपेक्षा जारी है—यही वे स्थान हैं जहाँ अधिकतर छात्र पढ़ते हैं।
सरकार की बयानबाज़ी और उसके वास्तविक राजकोषीय विकल्पों में गहरा अंतर है। यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्रीय प्राथमिकता होती, तो आवंटन जीडीपी से तेज़ गति से बढ़ता, न कि उससे धीमा। लगातार कम निवेश सरकार की सार्वजनिक शिक्षा के प्रति गहरी उपेक्षा को उजागर करता है और इसका बोझ धीरे-धीरे परिवारों पर डाल देता है। इस प्रकार की उपेक्षा के दीर्घकालिक दुष्परिणाम होंगे।
