साहित्य - संस्कृति

श्रद्धांजलि सभा में उर्दू के प्रख्यात अदीब प्रो शाहिद हुसैन को याद किया गया

गोरखपुर। उर्दू के नामवर स्कॉलर और प्रोफेसर मुहम्मद शाहिद हुसैन के निधन पर यासमीन शरीफ वेलफेयर सोसाइटी गोरखपुर की तरफ से डॉ अज़ीज़ अहमद के आवास पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित हुई। श्रद्धांजलि सभा में गोरखपुर शहर के कई प्रमुख शख्सियात ने शिरकत की। इस अवसर पर सभी ने प्रोफेसर शहीद हुसैन के व्यक्तित्व और उन के साहित्यिक योगदान पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रो शाहिद हुसैन का संबंध गोरखपुर शहर से रहा है। उन्होंने देश की प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्था जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली के भारतीय भाषा केंद्र में एक लंबे कार्यकाल तक अध्यापन कार्य किया। शैक्षिक दायित्वों के साथ साथ प्रो शाहिद हुसैन ने उर्दू भाषा और साहित्य की दुनिया में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। खास तौर पर उर्दू ड्रामा और मास कम्युनिकेशन के क्षेत्र में उन की ख़ास प्रसिद्धि रही है। उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इंद्र सभा की परंपरा, ड्रामा: फन और रिवायत, आवामी रिवायत और उर्दू ड्रामा, जनसंचार परंपरा और प्रयोग, अबलागीयात, इम्तियाज़ अली ताज जैसी पुस्तकें उन के विद्वत्ता का प्रमाण हैं। उर्दू के साथ साथ उन की कई पुस्तकें हिंदी में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके साहित्यिक उपलब्धि और अध्यापन कार्यों से प्रभावित होकर केंद्र सरकार ने इन्हें प्रोफेसर आफ एमिरेट्स जैसे एजाज से भी नवाजा। वे कई सरकारी और अर्ध सरकारी अकादमियो के मेंबर भी रहे और अवार्ड से सम्मानित किए गए।

श्रद्धांजलि सभा में  डॉ अज़ीज़ अहमद ने कहा प्रो शाहिद हुसैन का दुनिया से जाना अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपनी कृतियों के माध्यम से उर्दू साहित्य को नए आयाम प्रदान किए। उन के महत्वपूर्ण योगदान को कभी फरामोश नहीं किया जा सकता। प्रोफेसर शहीद की कृतियाँ उन्हें उन्हें साहित्य जगत में हमेशा जीवित रखेगा।

एम एस आई, इंटर कॉलेज के मैनेजर महबूब सईद हारिस ने प्रो शाहिद हुसैन से अपने व्यक्तिगत संबंधों का ज़िक्र करते हुए कहा कि मरहूम बेहद नेक दिल इंसान थे। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने हमेशा गोरखपुर को याद रखा। जब कभी वह गोरखपुर आते तो मेरे आवास पर बनी हुई लाइब्रेरी में मदीना अखबार की फाइलों को देखने जरूर आते वह पत्रकारिता के इतिहास के संबंध में एक किताब लिख रहे थे जिसके लिए वह मदीना अखबार की फाइलों को देखते मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया।

दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर महबूब हसन ने कहा कि हर दिल अज़ीज़ उस्ताज़ प्रो शाहिद हुसैन उर्दू शोध और आलोचना की दुनियां में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किये जाएंगे। उन्हें साहित्यिक कार्यों से बेहद रुचि थी। प्रो शाहिद हुसैन ने अध्यापन और साहित्य की एक आदर्श परंपरा स्थापित की: सेवानिवृत्ति के बाद भी उन की पुस्तकें और रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहीं। उन्होंने कभी भी कलम और किताब से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा।

सेंट एंड्रूज कॉलेज के उर्दू विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर अशफ़ाक़ अहमद उमर ने कहा की प्रो शाहिद हुसैन जैसा उस्ताद  मिलना मुश्किल है। उन्होंने हमेशा अभिभावक के तौर पर अपने शागिर्दों का मार्गदर्शन किया। उन के निधन के बाद पूरा साहित्य जगत शोक और ग़म में डूबा हुआ है। मैं उनके अधूरे सपनों को पूरा करूंगा और उन की शख्सियत और साहित्यिक कार्यों पर निर्भर एक भरपूर किताब लाकर उन्हें खूबसूरत खिराज पेश करना मेरा प्रथम प्रयास होगा। इस संबंध में मेरा प्रयास होगा कि यास्मीन शरीफ वेलफेयर सोसाइटी के बैनर तले हर वर्ष प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद हुसैन अवार्ड दिया जाए। उर्दू पत्रकारिता या ड्रामा जगत में शाहिद हुसैन के कार्यो की बराबरी कर पाना मुमकिन नहीं उनकी किताब अबलागियात, ड्रामा फन और रिवायत, अनारकली, इंद्रसभा की रिवायत उर्दू साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर है।

प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद हुसैन के साथ पढ़ने वाले डॉक्टर ओबैदुल्ला चौधरी ने कहा कि हमने एक खूबसूरत साहित्यकार, शानदार ड्रामा निगार, ईमानदार पत्रकार, बेहतरीन इंसान ही नहीं खोया है बल्कि एक अच्छा दोस्त भी खो दिया।

प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद हुसैन के भतीजे शहर के दिमागी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मुकर्रम हुसैन ने कहा की मैं अपने पठन-पाठन के संबंध में चाचा जी के पास जेएनयू जरूर जाता था और वहां पर उनकी साहित्यिक गतिविधियों और पठन-पाठन को देखकर मैं उनसे बड़ा प्रभावित हुआ मेरा जीवन अच्छा बनाने में उनका बड़ा रोल रहा है।

इस खास मौके पर शाहिद हुसैन के सम्बन्धि भाई सैयद पीर जादा मोहम्मद मेहंदी सेवानिवृत अध्यापक मियां साहब इस्लामिया इंटर कॉलेज ने कहा की शाहिद भाई बहुत ही शरीफ इंसान थे उन्होंने अपने जीवन काल में कभी किसी को हानि नहीं पहुंचाई वह जब भी गोरखपुर आते तो माता जी से मिलने घर पर जरूर आते उनके आचरण और कर्तव्य को देखकर मैं बडा प्रभावित रहता उनके जाने से हम सभी को बड़ा सदमा लगा है

शाहिद हुसैन को याद करते हुए मोहम्मद शागिल ने कहा कि शाहिद से मेरा रिश्ता बचपन का है।शाहिद हुसैन जब तक गोरखपुर में रहे तब तक हम लोग एक साथ हर खेल कूद में और पढ़ने लिखने में साथ रहते थे। शाहिद के जाने से मेरा जीवन कोरे कागज की तरह हो गया है भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और स्वर्ग में उन्हें शानदार स्थान प्रदान करें।

अंसार स्कूल के प्रिंसिपल मोहम्मद सिद्दीक मजाज ने कहा शाहिद हुसैन एक बेहतरीन उस्ताद थे शिष्यों के बीच उनका बड़ा स्थान था उनका चला जाना सिर्फ गोरखपुर ही नहीं बल्कि उर्दू अदब के लिए एक ऐसी छति है जो कभी पूरी नहीं की जा सकती।

दूसरे शहरों में रहने वाले प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद हुसैन के शिष्यों में दिल्ली से डॉक्टर मुशीर अहमद वा डॉक्टर शफी अयूब, हैदराबाद से डॉक्टर मोहम्मद अख्तर, बंगाल से डॉक्टर सईद अहमद, कोलकाता से डॉक्टर रजी शहाब, लखनऊ से डॉक्टर अकबर बिलग्रामी, दरभंगा से डॉक्टर नौशाद आलम कासमी व डॉक्टर फारूक आजम कासमी ने भी उनके जाने पर गम का इजहार किया।

शहर के साहित्यकारों में डॉक्टर मोहम्मद अशरफ वा डॉक्टर दरख्शा ताज्वर वा कलीम उल हक और डॉक्टर अब्दुल रहमान ने अफसोस का इजहार करते हुए मरहूम के कारनामों को याद किया।

श्रद्धांजलि सभा में सम्मिलित होने वालों में डॉ उबैदुल्लाह चौधरी, सिद्दीक मजाज़, पीर ज़ादा मेहदी हसन, पत्रकार सैयद रिहान, अजमत उबेद, मोहम्मद शागिल, मसरूर जमाल, मोहम्मद उमैर, मुन्ना और फुरकान फरहत आदि शामिल रहे।

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