विचार

मुस्लिम दलितों को तभी इंसाफ मिलेगा जब धारा 341 से धार्मिक पाबंदी खत्म होगी

इमानुद्दीन

भारतीय संविधान नागरिकों की समानता, भाषा, धर्म और संस्कृति जैसे मुद्दों पर अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करने, सुरक्षा तथा समानता का अधिकार दिलाने की देश की जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध है तथा संविधान की रचना करते समय भी अनेकता में एकता पर जोर दिया गया है। देश की जनता को किसी प्रकार की तकलीफ न हो, शासन सुचारू रूप से चले, सबके मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें, धर्म-जाति के नाम पर विवाद न हों, इन सभी बातों का ध्यान हमारे संविधान-निर्माताओं ने रखा परन्तु इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अनुच्छेद 341 के मामले में संविधान को न केवल मनमर्जी से तोड़ा-मरोड़ा गया बल्कि संविधान की भावना का उल्लंघन भी किया गया।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर, पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया में अर्ज़ाल मुसलमानों की बात करते हैं और बताते हैं कि यहाँ भी छुआछूत मौजूद है। नीची जातियों के अधिकांश मुसलमान वे हैं, जो हिन्दुओं के निचले सामाजिक तबके के विभिन्न पारंपरिक पेशागत समूहों से जुड़े हुए थे और हैं। धर्म परिवर्तन से उनका सामाजिक और आर्थिक दर्जा नहीं बदला। वे गरीब और उपेक्षित बने रहे।

लेकिन भारतीय संविधान में 341 का यह प्रावधान बाबा साहब के मूल भावना के विपरीत दिखाई देता है।

निःसन्देह आजादी के बाद से भारत ने काफी प्रगति की है, वृद्धि तथा विकास किया है। उसने गरीबी उन्मूलन, साक्षरता, शिक्षा तथा स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने में भी सफलता पाई है लेकिन भारत के मुस्लिम दलित (अरजाल) समान रूप से लाभ से वंचित रहे है। सच्चर और रंगनाथन मिश्रा की रिपोर्ट ने भी इनकी हालात को हिन्दू दलितों से भी बदतर बताया है।

1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ और 26 नवम्बर 1949 को जब यह अस्तित्व में आई, उस दौरान डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा अन्य सदस्य हिन्दू समाज में निचली जातियों (जिन्हें दलित भी कहा गया) के उत्थान के लिए संविधान में संशोधन के प्रयत्न करते रहे। संविधान के अनुच्छेद 341 में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वह विभिन्न जातियों और कबीलों के नाम एक सूची में शामिल कर दें। 1950 में राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश के जरिए एक अनुसूची जारी की, जिसमें पिछड़ी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों को विनिर्दिष्ट कर दिया गया। इन सूचीबद्ध जातियों और जनजातियों को ही अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति कहा गया।

राष्ट्रपति के अध्यादेश के पैरा (3) में लिखा गया कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जिसका सम्बन्ध हिन्दू धर्म से न हो, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का स्थान प्राप्त न हो सकेगा।

1956 में इस अध्यादेश में परिवर्तन करके सिक्खों और 1990 में बौद्धों को पैरा (3) में सम्मिलित कर दिया गया। अब परिदृश्य यह बना कि कोई भी व्यक्ति जिनका सम्बन्ध हिन्दू, सिक्ख या बौद्ध धर्म से न हो, अनुसूचित जाति की श्रेणी में सम्मिलित न होगा। इस प्रकार ईसाई, मुसलमान, जैन और पारसी इस श्रेणी से बाहर रहे।

यह साफ है कि इस आदेश के तहत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण केवल हिन्दुओं (सिक्ख या बौद्ध दलितों सहित) को उपलब्ध है, ईसाई या मुसलमान दलितों या किसी अन्य धर्म के दलितों को नहीं। इसका अर्थ यह है कि अनुसूचित जाति का हिन्दू केवल तब तक ही आरक्षण का लाभ ले सकता है, जब तक कि वह हिन्दू बना रहे। अगर वह अपना धर्म परिवर्तित कर लेता है, तो वह आरक्षण का पात्र नहीं होगा।

मुसलमानों में अस्पृश्यता

बाबासाहब अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ( पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया) में कहा है- कुछ स्थानों पर मुस्लिमों में तीसरा वर्ग (अशरफ, अजलफ के बाद) ‘अरजल’ भी है जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ काई भी मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है- जैसे- भानार, हलालखोर, हिजड़ा, कसबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।

बाबासाहेब ने 1901 में बंगाल प्रान्त के जनगणना के तथ्यों के अवलोकन में यह बात कही है जो कि हमारे लिए सबसे बड़ा तथ्य है।
अक्सर मुस्लिम समाज में अस्पृश्यता की बात की जाती है उनके अस्तित्व को ही सिरे से खारिज कर दिया जाता है मानो उस समस्या का अस्तिव ही नहीं है। वे भूल जाते हैं कि आरक्षण धार्मिक सिद्धान्तों पर नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहारों के आधार पर दिया जाता है। वर्ना इस्लाम की ही तरह बराबरी का दावा करने वाले सिख और बौद्ध धर्म को मानने वालों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जाता।

मुस्लिम समाज में अस्पृश्यता के बारे में विगत कुछ वर्ष पूर्व अक्टूबर 2014 से अप्रैल 2015 के बीच उत्तर प्रदेष के 14 जिलों के 7,000 से ज्यादा घरों का सर्वेक्षण किया गया था। उसमें प्रशांत के त्रिवेदी, श्रीनिवास गोली, फ़ाहिमुद्दीन और सुरेंद्र कुमार का नाम प्रमुख है। इनका संयुक्त लेख ‘इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में ‘क्या मुसलमानों छुआछूत प्रथा मौजूद है’ लेख प्रकाशित हुआ था। उनके रिपोर्ट को ‘बी.बी.सी हिन्दी’ ने 10 मई 2016 को प्रकाशित किया था।

उस रिपोर्ट कहा गया था कि ‘दलित मुसलमानों‘ के एक बड़े हिस्से का कहना है कि उन्हें गैर-दलितों की ओर से शादियों की दावत में निमंत्रण नहीं मिलता। यह संभवतः उनके सामाजिक रूप से अलग-थलग रखे जाने के इतिहास की वजह से है।  ‘दलित मुसलमानों’ के एक समूह ने कहा कि उन्हें गैर-दलितों की दावतों में अलग बैठाया जाता है। इसी संख्या के एक और समूह ने कहा कि वह लोग उच्च-जाति के लोगों के खा लेने के बाद ही खाते हैं। बहुत से लोगों ने यह भी कहा कि उन्हें अलग थाली में खाना दिया जाता है।
करीब 8 फीसदी ‘दलित मुसलमानों’ ने कहा कि उनके बच्चों को कक्षा में और खाने के दौरान अलग पंक्तियों में बैठाया जाता है।
कम से कम एक तिहाई ने कहा कि उन्हें उच्च जाति के कब्रिस्तानों में अपने मुर्दे नहीं दफनाने दिए जाते। वह या तो उन्हें अलग जगह दफनाते हैं या फिर मुख्य कब्रिस्तान के एक कोने में।  ज्यादातर मुसलमान एक ही मस्जिद में नमाज पढ़ते हैं लेकिन कुछ जगहों पर ‘दलित मुसलमानों’ को महसूस होता है कि मुख्य मस्जिद में उनसे भेदभाव होता है।

रिपोर्ट के अनुसार ‘दलित मुसलमानों’ के एक उल्लेखनीय तबके ने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनके समुदाय को छोटे काम करने वाला समझा जाता है।

 ‘दलित मुसलमानों’ से जब उच्च जाति के हिंदू और मुसलमानों के घरों के अंदर अपने अनुभव साझा करने को कहा गया तो करीब 13 फीसदी ने कहा कि उन्हें उच्च जाति के मुसलमानों के घरों में अलग बर्तनों में खाना/पानी दिया गया। उच्च जाति के हिंदू घरों की तुलना में यह अनुपात करीब 46 फीसदी है।
इसी तरह करीब 20 फीसदी प्रतिभागियों को लगा कि उच्च जाति के मुसलमान उनसे दूरी बनाकर रखते हैं और 25 फीसदी ‘दलित मुसलमानों’ के साथ को उच्च जाति के हिंदुओं ने ऐसा बर्ताव किया।
जिन गैर-दलित मुसलमानों से बात की गई उनमें से करीब 27 फीसदी की आबादी में कोई ‘दलित मुसलमान’ परिवार नहीं रहता था।

 20 फीसदी ने दलित मुसलमानों के साथ किसी तरह की सामाजिक संबंध होने से इनकार किया। और जो लोग ‘दलित मुसलमानों’ के घर जाते भी हैं उनमें से 20 फीसदी उनके घरों में बैठते नहीं और 27 फीसदी उनकी दी खाने की कोई चीज ग्रहण नहीं करते।
गैर-दलित मुसलमानों से पूछा गया था कि वह जब कोई दलित मुसलमान उनके घर आता है तो क्या होता है। इस पर 20 फीसदी ने कहा कि कोई ‘दलित मुसलमान’ उनके घर नहीं आता। और जिनके घर ‘दलित मुसलमान’ आते भी हैं उनमें से कम से कम एक तिहाई ने कहा कि ‘दलित मुसलमानों’ को उन बर्तनों में खाना नहीं दिया जाता जिन्हें वह आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं।

समय-समय पर पसमांदा समाज के सामाजिक संगठनों एवं सामाजिक कार्यकताओं द्वारा इस पाबंदी के खिलाफ आवाज उठायी जाती रही है। हर साल देश के कुछ जिलों एवं जंतर मंतर पर प्रदर्शन एवं ज्ञापन भी दिया जाता रहा है। जिसके परिणामस्वप ही सच्चर कमेटी एवं रंगनाथ मिश्रा कमेटी गठित की गयी एवं उन्होंने दलित मुसलमानों के सम्बन्ध में रिपोर्ट दिये। लेकिन उस समय के तत्कालीन सरकार ने भी कुछ काम नहीं किये।

आशा थी कि दलित मुसलमानों के इस नाइंसाफी के खिलाफ सरकार कुछ कदम उठायेगी लेकिन वर्तमान सरकार ने अमल करने के बजाय दुबारा एक कमेटी बालकृष्णन आयोग का गठन ही किया है। अर्थात् (दलित) अरजल मुसलमानों के समस्याओं के साथ साफ-साफ अनदेखी की जा रही है।

अतएव समय की मांग है एवं सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह मुस्लिम दलितों (अरजल) के साथ इंसाफ करे। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए आर्टिकल 341 से धार्मिक पाबंदी खत्म कर संविधान की आत्मा को सुकून पहुँचाए, क्योंकि जिस अवसर की जरूरत हिन्दू दलितों को है, उसी मौके की दरकार मुसलमान दलितों (अरजल) की भी है। एक शायर ने कहा है-

कागजी पन्नों पे जो लिखे हैं अधिकार,
उन्हें हकीकत की जमीं पर लाना है।
सिर्फ चंद लोगों को न मिले ये इंसाफ,
इसे हर गरीब की झोपड़ी तक पहुँचाना है।