गोरखपुर। प्रख्यात आलोचक प्रो परमानंद श्रीवास्तव की स्मृति में आज से दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘ परमानन्द श्रीवास्तव : अवदान और महत्त्व ‘ राजकीय बौद्ध संग्रहालय के में प्रारंभ हुआ। आज उद्घाटन सत्र के अलावा दो और सत्र हुए। इस दौरान आलोचक-कवि प्रो रघुवंश मणि को पहला परमानंद श्रीवास्तव आलोचना सम्मान, प्रो शम्भुनाथ को विमला देवी स्मृति सम्मान और वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे को बुद्धचर्या सम्मान से सम्मानित किया गया।
यह आयोजन प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने हिन्दुस्तानी एकेडमी, रज़ा फाउंडेशन, परमानन्द स्मृति न्यास के सहयोग स आयोजित किया था।
उद्घाटन सत्र में परमानंद श्रीवास्तव को याद करते हुए जाने माने आलोचक प्रो शम्भुनाथ ने कहा कि वे पूरे जीवन बौद्धिक मिठास लुटाते रहे और मनुष्य से मनुष्य के बीच दूरियों को ध्वस्त करते रहे।
उन्होंने कहा कि प्रो परमानंद रागदीप्त बौद्धिक थे। अस्सी-नब्बे के दशक में जार्गन, लफ़्फ़ाज़ियों और उद्धरणों की आलोचना का प्रभुत्व था। अति बौद्धिकता छायी हुई थी। अतिबौद्धिकता भिन्नता खोजती है जबकि रागदीप्त आलोचना भिन्नताओं के बीच संबंध और पुल बनती है। बौद्धिकता के साथ हृदय का राग भी होना चाहिए। हमारा देश बहु वैविध्य है। देश के बौद्धिकों को चाहिए कि वे देश की अभिन्नता के बारे में सोचे, दूरियों को ध्वस्त करने वाली आलोचना के बारे में सोचे।

उन्होंने कहा कि परमानंद अपने समय की रचनात्मकता को समझने वाले इनसाइक्लोपीडिया की तरह हैं। परमानंद श्रीवास्तव अपने समय के आलोचकों से अलग हैं। उन्होंने नायक पूजा करने के बाद छोटे छोटे रचनाकारों को नायक बनाया। वे जहाँ -जहाँ आवाजें थी वहाँ पहुँचे। उनकी कोई जड़ीभूत पसंद नहीं थी। उन्होंने कुछ भी हल्ला बोल नहीं लिखा। उनकी धीमी आवाज की असर बहुत है। वे अपने सौंदर्य बोध की सीमाएं तोड़ते हुए आगे बढ़ते रहे। वे साहित्य में अनसुनी आवाज़ों के मूर्तिकार हैं। उनकी चेतना में रूढ़ द्वार नहीं है।
प्रो अवधेश प्रधान ने कहा कि आज भूलने का महाभियान जोरों पर है। जैसा अपमान आज ज्ञान, साहित्य का हो रहा है वैसा कभी नहीं हुआ। ऐसे समय में परमानंद जी को याद करना और उन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी भूलने के खिलाफ युद्ध ही है। प्रो प्रधान ने परमानंद श्रीवास्तव की सुंदर लिखावट का जिक्र करते हुआ कहा कि उसमें कहीं कट मार्क नहीं मिलता। ऐसा तब होता है जब हृदय और मस्तिष्क एकाग्र हो जाता है।
वरिष्ठ आलोचक रघुवंश मणि ने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव आलोचना सम्मान प्राप्त करना उनके लिए अभिभूत करने वाला क्षण है। उनके साथ संबंध व्यक्तिगत और साहित्यिक है। उन्होंने मुझसे कई लेख लिखवाए और उसे अनूदित कर प्रकाशित किया। मेरी पहली किताब भी उनकी वजह से संभव हो पायी। उन्होंने मेरे जैसे अनेक लेखकों को प्रोत्साहित किया। वे नए लेखकों को उत्साहित ही नहीं करते थे बल्कि अच्छा लेखक बनने का द्वार भी खोलते थे।
प्रख्यात कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि परमानंद जी में अपने समय के युवा प्रतिभाओं को पहचानने की शक्ति थी। एक दृष्टि है कि वह फूल को देखता है और दूसरी दृष्टि है कि वह जहाँ भी देखता है फूलों को देखता है। परमानन्द जी की दृष्टि फूलपन को देखने की है।

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार प्रो रामदेव शुक्ल ने परमानन्द श्रीवास्तव को याद करते हुए कहा कि वे सही अर्थों में उनके सीनियर थे। प्रो आनंद प्रकाश दीक्षित ने हम दोनों को एक साथ हिंदी साहित्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हमने कभी उन्हें किसी से ऊँची आवाज में बोलते या झगड़ते नहीं देखा। वे साहित्य नहीं साहित्यकारों के निर्माता थे।
प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो सदानंद शाही ने परमानंद श्रीवास्तव की विश्वविद्यालय में हिंदी की कक्षाओं की याद करते हुए कहा कि उनसे पहली मुलाक़ात मुक्तिबोध की कविताओं के साथ हुई। वे ‘ भूल गलती ‘ कविता को जिस तरह से पढ़ाया उसने उनके साथ सभी छात्र-छात्राओं पर गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने हमारे सामंती और पिछड़े मन पर पर आधुनिक चिंतन, विचार और दृष्टि का प्रवेश कराया। वे कई पीढ़ियों का निर्माण करने वाले आलोचक-कवि थे। वे अपने समय के साथ अगली शताब्दी के बारे में सोचने वाले साहित्यकार थे।
आयोजन सचिव प्रो राजेश मल्ल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस सत्र का संचालन श्रुति कुमुद ने किया।
इस मौके पर परमानंद श्रीवास्तव की पत्नी ज्ञानवती श्रीवास्तव उपस्थित थीं।
दूसरा सत्र ‘ परमानंद श्रीवास्तव: जीवन और कृतित्व ‘ पर था जिसकी अध्यक्षता गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूरे अध्यक्ष प्रो अनंत मिश्र ने की। इस सत्र में प्रो केसी लाल, वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव, प्रेमचंद सिंह, डॉ मुमताज ख़ान, रविनंदन, प्रो मधुप कुमार, प्रेमव्रत तिवारी, नागेश राम त्रिपाठी, उषा कुमार, डॉ रंजना जायसवाल, उषा श्रीवास्तव, दस्तक की संपादक सीमा, विभूति नारायण ओझा, कौस्तुभ ने परमानंद श्रीवास्तव के साथ अपने यादें साझा करते हुए उनके साहित्यिक अवदान के बारे में बताया।
इस सत्र का संचालन परम प्रकाश राय ने किया। अपराजिता श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
