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शमीम हनफ़ी : उर्दू आलोचना में तारीख़, तहज़ीब और तख़्लीकी तजुर्बे की बौद्धिक परंपरा

फ़रज़ाना महदी

छह मई 2021 को उर्दू के मशहूर आलोचक शमीम हनफ़ी का इंतक़ाल हुआ था। आज उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि है। शमीम हनफ़ी का जन्म 17 मई 1938 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर में हुआ था।

जन संस्कृति मंच की लगातार यह कोशिश रही है कि हिंदी, उर्दू सहित तमाम क्षेत्रीय भाषाओं और उनके साहित्य के फ़रोग़ के लिए निरंतर कार्यक्रम होते रहें, ताकि संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहे। उर्दू भाषा और साहित्य पर बात करना आज इसलिए भी ज़्यादा ज़रूरी है कि मौजूदा समय में फ़ासीवादी सत्ता का सबसे बड़ा और पहला निशाना उर्दू ही है। ऐसे में आज उर्दू का समर्थन करना सिर्फ़ एक भाषा का समर्थन नहीं, बल्कि लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों का समर्थन है।

इसी संदर्भ में 17 मई 2026 को सुल्तानपुर के राइन नगर में जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश और हिंदुस्तान वेलफेयर सोसायटी, सुल्तानपुर द्वारा शमीम हनफ़ी की याद में एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। अगर आप सुल्तानपुर या उसके आसपास हैं, तो इस कार्यक्रम में ज़रूर शरीक हों।

उर्दू साहित्य की आलोचनात्मक परंपरा भारतीय बौद्धिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उर्दू आलोचना ने सिर्फ़ अदबी कृतियों के मूल्यांकन का काम ही नहीं किया, बल्कि उसने अदब और समाज के संबंध, सांस्कृतिक पहचान, इतिहासबोध और आधुनिकता के सवालों को भी गहराई से समझने की कोशिश की। यही वजह है कि उर्दू आलोचना को सिर्फ़ एक अदबी अनुशासन के रूप में नहीं बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक विमर्श के रूप में देखा जा सकता है।

बीसवीं सदी में उर्दू आलोचना ने कई महत्वपूर्ण चरणों से होकर अपनी यात्रा तय की। इस सफ़र में कुछ ऐसे आलोचक सामने आए जिन्होंने अदब को समझने की नई पद्धतियाँ विकसित कीं और आलोचना को एक गंभीर बौद्धिक गतिविधि का रूप दिया। इस संदर्भ में मुहम्मद हसन अस्करी, आले अहमद सुरूर, एहतिशाम हुसैन, कलीमुद्दीन अहमद और बाद की पीढ़ी में शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जैसे आलोचकों का उल्लेख ज़रूरी है।

इसी समृद्ध परंपरा में एक बेहद महत्वपूर्ण और विशिष्ट नाम शमीम हनफ़ी का है। शमीम हनफ़ी उन आलोचकों में शामिल हैं जिन्होंने उर्दू अदब को सिर्फ़ साहित्यिक पाठ के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव की एक जटिल और जीवंत प्रक्रिया के रूप में समझने की कोशिश की।

दरअसल शमीम हनफ़ी की आलोचना का केंद्रीय आग्रह यह है कि अदब को उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों से अलग करके नहीं समझा जा सकता। उनके लिए अदब एक जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज़ है जिसमें किसी समाज की सामूहिक स्मृतियाँ, अनुभव और भावनाएँ रचनात्मक रूप में अभिव्यक्त होती हैं।

शमीम हनफ़ी का जन्म 1938 में हुआ। उनका बचपन और युवावस्था ऐसे दौर में बीता जब भारतीय समाज स्वतंत्रता के बाद अपनी नई सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर गहरे विमर्शों से गुजर रहा था। यह वह वक़्त था जब साहित्य, राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में नए विचारों और नई बहसों का दौर शुरू हो चुका था।

उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्राप्त की। अलीगढ़ विश्वविद्यालय उर्दू भाषा और साहित्य के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और वहाँ का बौद्धिक वातावरण आधुनिक उर्दू आलोचना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

अलीगढ़ में अध्ययन के दौरान शमीम हनफ़ी ने उर्दू अदब की रावयत के साथ-साथ पश्चिमी साहित्यिक सिद्धांतों और आधुनिक आलोचनात्मक प्रवृत्तियों का भी गंभीर अध्ययन किया। यही अध्ययन आगे चलकर उनकी आलोचना की बौद्धिक आधारभूमि बना।

बाद में वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जुड़े और वहाँ लंबे समय तक अध्यापन करते रहे। जामिया का वातावरण बहुलतावादी और प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित रहा है। इस संस्थान में रहते हुए हनफ़ी ने न केवल अदब पढ़ाया बल्कि एक पूरी पीढ़ी को अदब और संस्कृति के बारे में गहराई से सोचने की प्रेरणा भी दी।

शमीम हनफ़ी की आलोचना को समझने के लिए यह ज़रूरी है कि हम उस वैचारिक परिदृश्य को भी देखें जिसमें उनका लेखन विकसित हुआ।

बीसवीं सदी के मध्य में उर्दू अदब में दो प्रमुख धाराएँ प्रभावशाली थीं, तरक़्क़ीपसंद आंदोलन और जदीदियत।
1936 में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना के साथ उर्दू अदब में तरक़्क़ीपसंद आंदोलन की शुरुआत हुई। इस आंदोलन का मक़सद अदब को सामाजिक न्याय, वर्गीय संघर्ष और मानवीय मुक्ति के सवालों से जोड़ना था। इस आंदोलन से जुड़े लेखकों का मानना था कि अदब को समाज की वास्तविक समस्याओं को सामने लाना चाहिए।

इसके उलट 1950 और 1960 के दशक में उर्दू अदब में जदीदियत का प्रभाव बढ़ने लगा। जदीद लेखकों और आलोचकों ने साहित्य की आंतरिक संरचना, भाषा, प्रतीक और शैली पर विशेष जोर दिया। उनके अनुसार साहित्य को सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि उसकी कलात्मक स्वतंत्रता और रचनात्मक जटिलता को भी महत्व दिया जाना चाहिए। यानि अदब बराए अदब।

इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच उर्दू अदब में एक लंबी बहस चली। कई बार यह बहस वैचारिक टकराव का रूप भी ले लेती थी। ऐसे माहौल में शमीम हनफ़ी की आलोचना एक संतुलित दृष्टि के रूप में सामने आती है।

शमीम हनफ़ी की आलोचना का मूल आधार यह विचार है कि अदब को उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

उनकी मशहूर किताब “तारीख़, तहज़ीब और तख़्लीकी तजुर्बा” इसी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है। इस किताब में उन्होंने अदब को समझने के लिए तीन प्रमुख अवधारणाओं को केंद्र में रखा है: तारीख़, तहज़ीब और तख़्लीकी तजुर्बा।
हनफ़ी के अनुसार अदब अपने वक़्त की ऐतिहासिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक अनुभवों से गहराई से जुड़ा होता है।

वे लिखते हैं:

“अदब को उसके तवारीखी और तहज़ीबी पस-मंजर से अलग करके समझना दरअसल उसकी असल रूह से दूर हो जाने के बराबर है।”

यह कथन उनकी आलोचना की मूल दिशा को स्पष्ट करता है।

शमीम हनफ़ी की आलोचना में “तहज़ीब” की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार किसी समाज की तहज़ीब उसकी सामूहिक स्मृति होती है और साहित्य उसी स्मृति की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।

उर्दू अदब के संदर्भ में यह विचार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उर्दू भाषा ख़ुद एक बहुसांस्कृतिक परंपरा की देन है। इसमें भारतीय, फारसी और इस्लामी सांस्कृतिक तत्वों का गहरा सम्मिलन है।

हनफ़ी का मानना है कि उर्दू अदब इस सांस्कृतिक सम्मिश्रण का एक ज़िंदा उदाहरण है।

शमीम हनफ़ी रिवायत और जदीदियत को परस्पर विरोधी नहीं मानते। उनके अनुसार आधुनिक साहित्य को समझने के लिए अपनी साहित्यिक परंपरा की गहरी समझ ज़रूरी है।

उर्दू शायरी की महान परंपरा का उल्लेख करते हुए वे बार-बार मीर, ग़ालिब और फ़िराक़ जैसे शायरों की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं।
उनके अनुसार इन शायरों की रचनाएँ केवल अदबी उपलब्धियाँ नहीं बल्कि एक पूरी सभ्यता के अनुभवों की अभिव्यक्ति हैं।

शमीम हनफ़ी के अनुसार अदब सिर्फ़ विचारों का बयान नहीं बल्कि मानवीय अनुभव की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।
वे लिखते हैं:
“ तख़्लीक का असल सरमाया इंसान का ज़िंदा तजुर्बा है और यही तजुर्बा अदब को मानी देता है।”

इस नज़रिये से अदब ज़िन्दगी के अनुभवों का कलात्मक रूप बन जाता है।

उर्दू अदब की आधुनिक आलोचना में कुछ ऐसे नाम हैं जिनके बिना इस पूरे बौद्धिक परिदृश्य को समझना लगभग नामुमकिन है। इनमें शमीम हनफी और शमसुर रहमान फारुकी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। दोनों आलोचकों ने उर्दू अदब की परंपरा, आधुनिकता और उसके सौंदर्यबोध पर गंभीर काम किया और आलोचना को एक नई बौद्धिक ऊँचाई दी। इसके बावजूद इन दोनों की आलोचनात्मक पद्धति और साहित्य को समझने का तरीका एक-दूसरे से काफ़ी अलग दिखाई देता है।

दरअसल यह फर्क केवल शैली या पसंद का फर्क नहीं है, बल्कि साहित्य की प्रकृति को लेकर दो अलग बौद्धिक नज़रियों का फर्क है। शम्सुर रहमान फारूखी की आलोचना का केंद्र अधिकतर साहित्य का पाठ, उसकी भाषा, उसकी बनावट और उसके फ़नकारी तत्व होते हैं, जबकि शमीम हनफ़ी अदब को इतिहास, समाज और तहज़ीब की बड़ी धारा में रखकर देखने की कोशिश करते हैं। इसी वजह से उर्दू आलोचना में इन दोनों नज़रियों के बीच एक गहरी बहस भी मौजूद रही है।

उर्दू आलोचना की आधुनिक शुरुआत को समझने के लिए हमें पीछे जाना पड़ता है, जहाँ अल्ताफ हुसैन हाली की मशहूर किताब मुक़ाद्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी सामने आती है। हाली ने यह बात बहुत साफ़ लफ़्ज़ों में कही थी कि अदब को ज़िंदगी से काटकर नहीं समझा जा सकता। उनके लिए शायरी और अदब का असली रिश्ता समाज और इंसानी तजुर्बे से था। यही वह बौद्धिक परंपरा थी जिसने आगे चलकर उर्दू आलोचना को एक सामाजिक और ऐतिहासिक आधार दिया।

बीसवीं सदी में जब उर्दू अदब में नई बहसें शुरू हुईं, प्रगतिशील आंदोलन और उसके बाद जदीदियत, तो आलोचना की दिशा भी बदलती रही। जदीदियत ने अदब की आंतरिक दुनिया, उसकी भाषा और उसकी कलात्मक स्वायत्तता पर ज़ोर दिया। इसी दौर में शम्सुर रहमान फारूखी एक महत्वपूर्ण आलोचक के रूप में सामने आए। उन्होंने उर्दू की क्लासिकी शायरी को नए ढंग से पढ़ने की कोशिश की और यह साबित करने की कोशिश की कि उर्दू की परंपरा को अक्सर सतही ढंग से समझा गया है।

उनकी महत्वपूर्ण किताब शेर-ए-शोर अंगेज़ इसी सिम्त में एक बड़ी परियोजना है, जिसमें उन्होंने विशेष रूप से मीर तक़ी मीर की शायरी को नए आलोचनात्मक नजरिये से समझने की कोशिश की। फारूखी का मानना था कि मीर की शायरी को लंबे वक़्त तक सिर्फ़ दर्द और जज़्बात की शायरी मान लिया गया, जबकि असल में उसमें बेहद पेचीदा काव्यशास्त्रीय संरचना और बारीक फ़नकारी मौजूद है।

इस काम का महत्व अपनी जगह बहुत बड़ा है, क्योंकि इससे उर्दू की क्लासिकी परंपरा की नई प्रतिष्ठा बनी। लेकिन इसी के साथ फारूखी की आलोचना का एक ऐसा पक्ष भी सामने आता है जहाँ अदब का विश्लेषण मुख्य रूप से टेक्स्ट, भाषा और फ़न तक सीमित हो जाता है। इस तरह कई बार अदब का वह व्यापक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ पीछे छूट जाता है जिसमें वह पैदा हुआ होता है।

यहीं पर शमीम हनफ़ी की आलोचना एक अलग और ज़्यादा व्यापक दिशा में जाती दिखाई देती है। हनफ़ी अदब को सिर्फ़ शब्दों की कलात्मक व्यवस्था नहीं मानते, बल्कि उसे इतिहास और तहज़ीब की एक जीवित अभिव्यक्ति समझते हैं। उनकी मशहूर किताब तारीख तहज़ीब और तखलीकी तजरुबा इसी सोच का प्रतिनिधित्व करती है।

हनफ़ी एक जगह लिखते हैं : “अदब किसी ख़ला में पैदा नहीं होता। उसके पीछे तारीख़, तहज़ीब और इंसानी तजुर्बे की पूरी दुनिया कारफ़रमा होती है।”

इस जुमले में उनकी आलोचना का मूल विचार मौजूद है। उनका मानना है कि अदब को सिर्फ़ उसके शब्दों और रूपकों के आधार पर नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसके पीछे मौजूद ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अनुभवों को समझना भी ज़रूरी है।
वे एक और जगह बहुत साफ़ शब्दों में कहते हैं : “अदब को सिर्फ़ मत्न की सतह पर पढ़ने का मतलब यह है कि हम उसके ज़िंदा इंसानी पस-मंज़र को नज़रअंदाज़ कर दें।”

यह बात दरअसल उस आलोचनात्मक रवैये की आलोचना है जो साहित्य को केवल टेक्स्ट के रूप में पढ़ने का आग्रह करता है।
फारूखी की आलोचना का आधार जदीदियत की वह धारणा है जिसमें अदब की स्वायत्तता को बहुत महत्व दिया गया। इस धारणा के अनुसार अदब को सामाजिक या राजनीतिक मानकों के आधार पर नहीं आँका जाना चाहिए, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक दुनिया के भीतर समझा जाना चाहिए।
यह विचार एक हद तक तो सही लग सकता है, क्योंकि इससे साहित्य को केवल प्रचार या विचारधारा का औज़ार बना देने की प्रवृत्ति का विरोध किया जा सकता है। लेकिन जब यह विचार बहुत ज़्यादा प्रबल हो जाता है तो साहित्य अपने सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों से कटने लगता है।
यहीं शमीम हनफ़ी की आलोचना अधिक संतुलित दिखाई देती है। वे फ़न और सौंदर्य की अहमियत से इनकार नहीं करते, लेकिन यह भी कहते हैं कि अदब का रिश्ता इंसान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दुनिया से हमेशा बना रहता है।
हनफ़ी के लिए अदब दरअसल एक तहज़ीबी तजुर्बा है। वे लिखते हैं:
“अदब इंसानी तहज़ीब की इज्तिमाई याददाश्त का हिस्सा है। इसे सिर्फ फ़न की एक मुजर्द सूरत समझना उसकी मआनवियत को महदूद कर देता है।”
इस विचार में अदब की एक बहुत व्यापक समझ दिखाई देती है। यहाँ अदब सिर्फ़ कलात्मक संरचना नहीं है, बल्कि वह इंसानी समाज की सामूहिक स्मृति और अनुभव का हिस्सा है।

अगर इन दोनों आलोचकों की पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो साफ़ दिखाई देता है कि फारूखी की आलोचना ज़्यादातर भाषा, रूप और काव्यशास्त्र की बारीकियों पर केंद्रित है। यह दृष्टि कई बार बेहद प्रभावशाली और सूक्ष्म विश्लेषण पैदा करती है, लेकिन साथ ही यह अदब के बड़े ऐतिहासिक और सामाजिक आयामों को पीछे भी छोड़ देती है।

इसके उलट शमीम हनफ़ी अदब को एक बड़े सांस्कृतिक संदर्भ में देखते हैं। उनके यहाँ अदब का रिश्ता इतिहास, समाज और तहज़ीब की निरंतरता से जुड़ा हुआ है। इसी वजह से उनकी आलोचना में सिर्फ़ पाठ का विश्लेषण नहीं होता, बल्कि अदब के पीछे मौजूद सांस्कृतिक चेतना को भी समझने की कोशिश की जाती है।

उर्दू आलोचना के इतिहास में इन दोनों आलोचकों का योगदान अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर यह पूछा जाए कि अदब की व्यापक समझ किस आलोचनात्मक दृष्टि से संभव है, तो शमीम हनफ़ी की आलोचना ज़्यादा संतुलित और ज़्यादा दूरदर्शी दिखाई देती है।

उन्होंने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि अदब को उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों से अलग करके नहीं समझा जा सकता। अदब सिर्फ़ फ़न का मामला नहीं है, बल्कि वह इंसान के सामूहिक अनुभवों, संघर्षों और स्मृतियों की अभिव्यक्ति भी है।
इसीलिए यह कहा जा सकता है कि उर्दू आलोचना की वह दिशा ज़्यादा समृद्ध और ज़्यादा जीवंत है जो अदब को सिर्फ़ टेक्स्ट या सौंदर्यशास्त्र तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे इतिहास, समाज और तहज़ीब की व्यापक धारा में रखकर समझने की कोशिश करती है और यही वह दिशा है जिसकी तरफ़ शमीम हनफ़ी की आलोचना लगातार इशारा करती है।

शमीम हनफ़ी का योगदान सिर्फ़ आलोचना तक सीमित नहीं था। वे उर्दू रंगमंच से भी गहराई से जुड़े हुए थे। उन्होंने कई नाटक लिखे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के ज़रिये अदब और समाज के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश की। उनका मानना था कि अदब को सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उसे समाज की सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुड़ना चाहिए। आज जब वैश्वीकरण, सांस्कृतिक राजनीति और पहचान के सवालों के बीच अदब की भूमिका को लेकर नई बहसें सामने आ रही हैं, ऐसे वक़्त में शमीम हनफ़ी की आलोचना और भी प्रासंगिक दिखाई देती है।

उनकी आलोचना हमें यह याद दिलाती है कि अदब सिर्फ़ भाषा और शैली का सवाल नहीं है बल्कि वह एक व्यापक सांस्कृतिक अनुभव का भी प्रतिनिधित्व करता है। इस तरह शमीम हनफ़ी उर्दू आलोचना की परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान रखते हैं।

उन्होंने अदब को समझने के लिए एक ऐसी आलोचनात्मक नज़रिया विकसित किया जिसमें इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव तीनों को समान महत्व दिया गया है। उनकी आलोचना हमें यह सिखाती है कि अदब सिर्फ़ शब्दों का खेल नहीं है बल्कि वह एक पूरी सभ्यता की स्मृति और अनुभव की रचनात्मक अभिव्यक्ति भी है।

( जन संस्कृति मंच से जुड़े फ़रज़ाना महदी कहानीकार हैं। संपर्क-9984154059 )