शांतम निधि
अहमदपुर खेड़ा का पुरवा लखनऊ शहर से सिर्फ 25 किलोमीटर दूर है। लेकिन यहां रहने वाले लोगों के लिए आधुनिक भारत ज्यादातर सिर्फ सरकारी विज्ञापनों, टीवी भाषणों और बड़े-बड़े नारों में दिखाई देता है।
इटौंजा थाना क्षेत्र और बख्शी का तालाब तहसील के इस छोटे से गांव में लगभग 200 लोग रहते हैं। लगभग सभी दलित परिवार हैं जो पीढ़ियों से खेतिहर मजदूर के रूप में काम करते आए हैं। ज्यादातर लोगों के पास एक बीघा से भी कम जमीन है। पिछली पीढ़ियां गरीबी से बाहर नहीं निकल पाईं और आज की पीढ़ी को भी आगे बढ़ने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। यहां खेती भी लगातार संकट में है। किसानों को खेती के लिए किराए पर बोरिंग का पानी लेना पड़ता है। मजदूरी का काम अनिश्चित है और बड़े जमीन मालिकों पर निर्भर है। गांव के नौजवान बचपन से ही यह सीखते हुए बड़े होते हैं कि उनके हिस्से में मेहनत तो है, लेकिन आगे बढ़ने का कोई भरोसा नहीं।
गांव में सही नाली व्यवस्था नहीं है, इसलिए बारिश और गंदगी का पानी सड़कों पर भर जाता है। वर्षों से मांग और आवेदन देने के बावजूद सड़क आज भी कच्ची है। कई घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं। बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल रही है। इटौंजा का स्वास्थ्य केंद्र भ्रष्ट, बदहाल और लगभग निष्क्रिय माना जाता है। गरीब परिवारों के लिए बीमार पड़ना भी एक आर्थिक संकट बन जाता है।
और सबसे दर्दनाक सच यह है कि इस गांव के इतिहास में आज तक एक भी बच्चा ग्रेजुएशन नहीं कर पाया है।
इसी सच्चाई के संदर्भ में लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई फीस वृद्धि को समझना होगा। जब दलित खेतिहर मजदूर परिवारों की पीढ़ियां पहले से ही उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पा रही हैं, तब 40% से 200% तक फीस बढ़ाना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह गरीबों और दलितों को शिक्षा से बाहर धकेलने का काम है। जिस गांव से आज तक एक भी बच्चा ग्रेजुएशन नहीं कर पाया, उसी देश में विश्वविद्यालयों की फीस लगातार बढ़ाई जा रही है।
इसी संदर्भ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) को कमजोर किए जाने को भी समझना होगा। जिन गांवों में रोजगार पहले से ही अनिश्चित है और बड़े जमीन मालिकों पर निर्भर है, वहां मनरेगा को कमजोर करना गरीब मजदूरों को और ज्यादा असुरक्षा और निर्भरता की तरफ धकेलता है। इसी तरह अमेरिका के साथ किसानों से जुड़े व्यापार समझौते छोटे और गरीब किसानों के लिए और बड़ा संकट पैदा करेंगे। जो किसान पहले ही कर्ज, महंगाई और खेती के संकट से जूझ रहे हैं, उनके सामने सस्ती विदेशी कृषि व्यवस्था और बड़ी कंपनियों की ताकत को खड़ा किया जा रहा है।
“विकसित भारत” के नारों के पीछे यही असली भारत छिपा हुआ है। उत्तर प्रदेश की राजधानी से सिर्फ 25 किलोमीटर दूर एक गांव आज भी ऐसी जिंदगी जी रहा है जहां पीढ़ियां बिना उच्च शिक्षा, बिना सम्मानजनक रोजगार और बिना बुनियादी सुविधाओं के गुजर जाती हैं। यहां बच्चे विश्वविद्यालयों को सिर्फ दूर से देखते हैं। यहां नौजवानों को बचपन से ही यह समझ आ जाता है कि उनकी जिंदगी खेतों, दिहाड़ी और संघर्ष तक सीमित कर दी गई है।
क्या यही “विकसित भारत” है? या फिर यह ऐसा भारत है जहां विकास सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए है जिनके पास पहले से जमीन, पैसा, जातिगत विशेषाधिकार और सत्ता है?
