लखनऊ। वरिष्ठ पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक, विश्व क्लासिक्स सीरीज़ के सम्पादक, अनुवादक तथा भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज के सम्पादक सत्यम वर्मा की असंवैधानिक गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ सत्यम वर्मा रिहाई मंच की ओर से सात मई को आयोजित प्रेस वार्ता को कवयित्री कात्यायनी, रिहाई मंच की संयोजिका कविता कृष्णपल्लवी, मानवाधिकार कर्मी हिमांशु कुमार, इप्टा के राकेश, प्रोफेसर रमेश दीक्षित, जन संस्कृति मंच के कौशल किशोर, एडवा से मधु गर्ग और ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट से दिनकर कपूर ने सम्बोधित किया।
नोएडा मज़दूर आन्दोलन में हिंसा के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस सत्यम वर्मा को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार कर ले गयी, जबकि उन्होंने इस आन्दोलन के दौरान तो क्या दशकों से नोएडा में क़दम नहीं रखा और इस आन्दोलन के एक्टिविस्टों के साथ उनका कोई सम्पर्क भी नहीं था।
वार्ता को सम्बोधित करते हुए ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ की संयोजिका कविता कृष्णपल्लवी ने कहा कि यूपी पुलिस-प्रशासन की यह अंधेरगर्दी मज़दूर आन्दोलन के समर्थन में सत्यम वर्मा के रूप में उठी एक मज़बूत आवाज़ को चुप कराने की साज़िश है। सत्यम वर्तमान सत्ता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिया रखते हैं और अपने विचारों को मुखरता से अपनी लेखनी में अभिव्यक्त करते आए हैं। सत्यम वर्मा ‘ जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान ‘, ‘अरविन्द मेमोरियल ट्रस्ट’ जैसी संस्थाओं से जुड़े हैं तथा कभी-कभी ‘मज़दूर बिगुल’ में लेखन करते रहे हैं। नोएडा मज़दूर आन्दोलन में भड़की हिंसा से पुलिस ‘मज़दूर बिगुल’ और इन संस्थाओं को जोड़कर सत्यम को “षडयंत्र का मास्टरमाइंड” साबित करना चाहती है ताकि उनके प्रतिरोध के स्वर को अपराध घोषित किया जा सके।
कवयित्री कात्यायनी ने 10 अप्रैल से 19 अप्रैल तक यानी पुलिस द्वारा सत्यम वर्मा को अगवा किये जाने से लेकर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने तक के घटनाक्रम पर सिलसिलेवार बात रखी। उन्होंने बताया कि 10 अप्रैल की सुबह निराला नगर चौकी की पुलिस सत्यम को पूछ-ताछ के नाम पर पुलिस चौकी ले गयी। शाम को निरालानगर स्थित जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान पर एलआईयू एसीपी, निराला नगर चौकी के एसएचओ विक्रम सिंह, हसनगंज एसएचओ आते हैं। पुलिस बड़ी संख्या में स्त्री और पुरुष कर्मियों के साथ जनचेतना पहुँची थी। मुझसे और सत्यम के साथ देर तक पूछताछ करती रही।
इसके बाद पुलिस एक बार फिर 13 अप्रैल को जनचेतना आती है। मुझे और सत्यम को हिरासत में लेती है और पूछताछ के लिए थाना हसनगंज ले जाती है। संजय श्रीवास्तव अनुराग लाइब्रेरी में वालंटियर करते हैं। संजय का इस पूरे मामले से कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर भी जब वह थाने पहुँचे तो उन्हें भी बिठा कर पुलिस उनके साथ पूछताछ करने लगी।
इसके बाद 17 अप्रैल को नोएडा पुलिस बिना किसी पहचान के सादी वर्दी में स्थानीय पुलिस के साथ जनचेतना आती है। पुलिस बताती है कि उनके पास जनचेतना परिसर के प्रथम तल का सर्च वारंट है। वह वारंट बेहद अस्पष्ट था। कथित तौर पर सर्च वारंट जनचेतना परिसर के मात्र एक फ्लोर का होने के बावजूद पुलिस पूरे परिसर की तलाशी लेती रही और मौजूद सभी लोगों से पूछताछ करती रही।

इसके बाद पुलिस सत्यम को पता सम्बन्धी किसी पूछताछ के लिए अपने साथ थाने ले जाती है। फिर देर रात लगभग 11:30 बजे वही सादी वर्दी वाले और पुलिस कर्मी सत्यम को लेकर उनके आवास स्थल लौटती है। पुलिस के पास आवास का सर्च वारंट नहीं था। लेकिन पुलिस पूरे आवास की तलाशी लेती है। जनचेतना और आवास से पुलिस कोई सीज़र मेमो दिये बिना ही कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, किताबें, फ़ाइलें और डायरियाँ ले जाती है। इस पूरी कार्रवाई के दौरान पुलिस सत्यम और मुझे न तो ज़रूरी दवाएँ लेने देती है न ही हमें वकीलों से सम्पर्क करने देती है।
पूरे आवास की तलाशी लेने के बाद पुलिस हमें बिना सूचित किए देर रात सत्यम को अपने साथ ले गयी। पुलिस उन्हें किसी गुप्त स्थान ले गयी। हमारे लाख कोशिश करने के बावजूद हमें उनकी कोई जानकारी हासिल नहीं हुई। 17 अप्रैल की रात सत्यम को ग़ैरक़ानूनी ढंग से गिरफ़्तार करने के 42 घण्टे बाद यूपी पुलिस उन्हें सूरजपुर कोर्ट में 19 अप्रैल को पेश करती है। जबकि क़ानूनन उन्हें गिरफ़्तारी के 24 घण्टे के अन्दर लखनऊ मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना था।

पुलिस की यह ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक कार्रवाई दर्शाती है कि हम अघोषित आपातकाल में जी रहे हैं।
प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने सत्यम वर्मा सहित सभी छात्र-युवा एक्टिविस्टों, कलाकारों और मज़दूरों की तत्काल रिहाई की माँग की है। उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश में बढ़ते एनकाउंटर, बुलडोज़र राज, ग़ैर क़ानूनी गिरफ्तारियों और धमकियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि यहाँ जंगल राज है। यूपी पुलिस ने जैसे गुण्डों की तरह आचरण करते हुए सत्यम वर्मा, कवयित्री कात्यायनी व जनचेतना की पूरी टीम के साथ जो व्यवहार किया है वह निंदनीय है। उन्होंने प्रेस के माध्यम से यूपी सरकार और उच्च अधिकारियों से सत्यम वर्मा और अन्य लोगों को तत्काल न्यायालय में प्रस्तुत करने और उनपर लगायी गयी धाराओं की जानकारी देने की माँग की।
इप्टा से राकेश ने कहा कि पुलिस ने अपने इतिहास को दोहराते हुए जिस तरह आनन्द तेलतुम्बड़े, गौतम नवलखा जैसे बुद्धिजीवियों के लैपटॉप और फ़ोन में ग़लत सबूत इम्प्लांट कर उन्हें फँसाया, पूरी सम्भावना है कि सत्यम वर्मा के साथ भी ऐसा ही वह करेगी। उन्होंने भी सत्यम वर्मा के साथ सभी गिरफ्तार छात्रों, कार्यकर्ताओं की रिहाई की माँग की।
ऑल इंडिया पीपुल्स फ़्रण्ट से दिनकर कपूर ने कहा कि यह मामला व्यक्ति की गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है। भाजपा और आरएसएस देश, संविधान और लोकतंत्र को ध्वस्त कर तानाशाही लाना चाहती है। उन्होंने नोएडा, गुड़गाँव और मानेसर में चले मज़दूर आन्दोलन का समर्थन किया और सत्यम के साथ सभी की रिहाई की माँग की।
मानवाधिकार कर्मी हिमांशु कुमार ने भी सत्यम वर्मा और सभी कार्यकर्ताओं की रिहाई की माँग की। उन्होंने कहा कि सत्यम और अन्य कार्यकर्ताओं को अपराधी घोषित करना शर्मनाक है।
एडवा से मधु गर्ग ने रिहाई की माँग की और उत्तरप्रदेश में जनआंदोलनों के बर्बर दमन और क्षीण होते जनवादी स्पेस पर चिंता व्यक्त की।
जन संस्कृति मंच से कौशल किशोर ने सत्यम वर्मा और अन्य कार्यकर्ताओं की प्रताड़ना पर क्षोभ व्यक्त किया और मज़दूरों के आन्दोलन का समर्थन किया। उन्होंने भी सभी कि तुरंत रिहाई की माँग की है।
