सुल्तानपुर। उर्दू के मशहूर अदीब शमीम हनफ़ी की याद में उनके जन्मदिवस पर जन संस्कृति मंच तथा हिंदुस्तान वेलफेयर सोसाइटी की ओर से 17 मई को ‘यादे शमीम हनफ़ी’ का आयोजन दरियापुर, सुल्तानपुर में हुआ। कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहले सत्र में शमीम हनफ़ी साहब की शख्सियत और उनके साहित्यिक नजरिए और सफरनामे पर वक्ताओं ने विचार रखे। इस सत्र की सदारत जनाब अब्दुल करीम एडवोकेट ने की। वहीं दूसरा सत्र मुशायरे का था जिसकी अध्यक्षता लखनऊ से आए कवि कौशल किशोर ने की।
कार्यक्रम का आरंभ जनवादी कवि डॉ डी एम मिश्रा के स्वागत वक्तव्य से हुआ। आजादी के बाद के माहौल में जनाब शमीम हनफ़ी के साहित्यिक-वैचारिक सफर पर जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर शमीम हनफी आधुनिक विचारों वाले लेखक थे। आधुनिकता पर उनकी पुस्तकों में ’द फिलॉसॉफिकल फाउंडेशन ऑफ मॉडर्निज्म’ और ’न्यू पोएटिक ट्रेडिशन’ अहम किताबें शामिल हैं। वह जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली में प्रोफेसर एमेरिटेस भी रहे। फरजाना ने कहा कि हनफी साहब का सबसे नुमायां काम यह है कि उन्होंने प्रगतिशील होते हुए भी कभी जदीदियत की नुक्ताचीनी नहीं की और जेनुइन लेखन पर ही जोर दिया। उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा किताबें लिखीं और डी.लिट भी किया था।

कथाकार-पत्रकार सुहेल वहीद ने उनके पत्रकारीय लेखन पर बात शुरु की और कहा कि उनके कालम्स की किताब ‘ये किसका ख्वाब तमाशा है’ दो हिस्सों में होनी चाहिए थी क्योंकि उसमें दर्जन भर से ज्यादा उनके कालम्स तो ख़ाके हैं, और बहुत उम्दा ख़ाके हैं जिसमें ’फिराक़ साहब’ का तो जवाब ही नहीं। उन्होंने कई और उदाहरण देते हुए कहा कि इस किताब को पढ़ते हुए बार बार लगता है कि शमीम साहब विलक्षण प्रतिभा के धनी होने के साथ साथ बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व के मालिक थे कि उनके अंदर मानवता के प्रति असीम सम्मान था। उन्होंने बताया कि इस किताब से प्रोफेसर हनफी की एक अलग ही शख्सियत उभर कर सामने आती है।
शायर हबीब अजमली ने प्रोफेसर शमीम हनफी के आलोचना पक्ष पर लिखे गए एक लेख के हवाले से कहा कि उनका लेखन किसी के पक्ष में नहीं रहा और न ही किसी की आलोचना के पक्ष में। उन्होंने उर्दू साहित्य में छिपे व्यक्तित्ववाद को निशाना बनाए बिना अपनी बात कही।

मशहूर कथाकार असरार गांघी ने प्रोफेसर शमीम हनफी के इलाहाबाद में गुजरे बचपन के कई किस्से सुनाए और कहा कि वह बेहद शरीफ और मेहनती थे और सुल्तानपुर में चूंकि उन दिनों इंटर के बाद पढ़ने के लिए कोई कॉलेज ही नहीं था तो उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद भेजा गया जहां फिराक़ गोरखपुरी के घर पर रह कर ही उन्होंने अपनी पढ़ाई की शुरुआत की और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की तालीम और तरबियत ने उन्हें इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। वह भलमनसाहत पर यकीन करने वाले थे और आज उन्हें यहां उनके वतन सुल्तानपुर में याद किया जा रहा है, यह बड़ी प्रेरणादायक कोशिश है।
डाक्टर उमैर मंज़र ने प्रोफेसर शमीम हनफी पर अपने शोध परक लेख के अंशों को पढ़कर बताया कि कैसे हनफी साहब की साहित्यक रचनात्मकता ने हमेशा सकारात्मकता की दिशा को तय किया। उन्होंने कहा कि शमीम हनफी ने अपने किसी भी सृजन में कभी किसी पर न तंज़ किया और न किसी पूर्व या समकालीन लेखन की उत्कृष्टता को नकारने की कोशिश की बल्कि हमेशा अपनी रचना को महान कृतियों के समकक्ष सृजित करने की कोशिश की। इस मामले में वह अपने सभी समकालीन लेखकों से आगे दिखते है। उनके अंदर एक अजीब सी सुकून भरी संवेदना थी जो दूसरों और विशेषकर उनके शागिर्दों के लिए प्रेरणा बन जाती थी, यही उनका कमाल था। डॉ. उमैर मंज़र ने प्रोफेसर शमीम हनफी से कई वर्षों तक जामिया में तालीम हासिल की थी तो उन्होंने उस दौर के कई किस्से भी सुनाए।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे एडवोकेट अब्दुल करीम ने कहा कि इस शहर में शमीम हनफी को याद किया जाना एक शानदार मौक़ा है। उन्होंने अपने छात्र जीवन को याद करते हुए बताया कि कैसे उनको शमीम हनफी की शख्सियत ने मुतास्सिर किया।
दूसरा सत्र मुशायरा का था। इसकी निजामत हबीब अजमली ने की। जनवादी गज़लकार डॉ डी एम मिश्रा ने उम्मीद से भरी ग़ज़ल व कुछ शेर सुनाए। ख़ूब वाहवाही लूटी। वे कहते हैं – ‘मुझे यक़ीन है सूरज यहीं से निकलेगा /यहीं घना है अंधेरा यहीं पे चमकेगा’। वहीं
डाॅ मन्नान सुल्तानपुरी बेहतर कल की बात करते हैं – ‘आज से बेहतर यक़ीनन होंगे कल के रास्ते/जब मेरी कुटिया से निकलेंगे महल के रास्ते’।
कैसी हो गयी है सियासत? इस पर अलिफ़ सीन कादिरी का शेर है-सियासत चाहती है बे दर – ओ – दीवार हो जाएं/कि हम अहले वफ़ा रुसवा सरे बाज़ार हो जाएं’। निजामत कर रहे हबीब अजमली ने नज़्म और ग़ज़ल सुनाई। उन्होंने कहा- ‘हम अपने आपमें अन्दर ही अन्दर दुखते रहते हैं /हमारे जिस्म में सांसें नहीं पुरवाई रहती है।’ डॉ उमैर मंज़र ने भी ग़ज़लों से समां बांधा। उत्कर्ष सिंह ने एक कविता और नयी लिखी ग़ज़ल सुनाई।

कार्यक्रम की सदारत करते हुए लखनऊ से आए कौशल किशोर ने कहा कि ऐसा समाज बनाया जा रहा है जिसकी आजादी के जननायकों ने कभी कल्पना नहीं की थी। इन विपरीत स्थितियों में अदब की भूमिका बढ़ जाती है। सच, साहस और ईमानदारी की पहले किसी समय से आज ज्यादा जरूरत है। यहां पढ़ी गई शायरी इसी का एक नमूना है। कौशल किशोर ने अपनी कविता ‘वह हामिद था’ सुनाई। यह प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ के चरित्र हामिद का वर्तमान में विस्तार है तथा नफ़रत और हिंसा से भरे आज के हिंदुस्तान से रुबरु कराती है। कहते हैं ‘हामिद मारा गया/ नहीं नहीं हमीद नहीं मारा गया /मारी गई संवेदनाएं /हत्या हुई भाव-विचार की /जो हमें हामिद से जोड़ती हैं/ जो हमें आपस में जोड़ती हैं/जो हमें इंसान बनाती हैं/जो हमें हिंदुस्तान बनाती हैं।’
समाज सेवी शकील अहमद ने ऐसे आयोजन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्य प्रेम, भाईचारा व बेहतरी का संदेश देता है। उसकी भूमिका जन जागरण की है। हिन्दुस्तान वेलफेयर सोसाइटी के सचिव परवेज़ करीम के धन्यवाद ज्ञापन से कार्यक्रम समाप्त हुआ। इस मौके पर प्रो राम जी तिवारी, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, मुंबई विश्वविद्यालय, डॉ राधेश्याम सिंह, पूर्व प्राचार्य कमला नेहरू संस्थान, सैय्यद रज़ा, यतीन्द्र शाही, शमीम हनफ़ी के परिवार के लोग सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
