गोरखपुर। मियां बाजार स्थित इमामबाड़ा इस्टेट शहर की ऐतिहासिक धरोहर है। इमामबाड़ा इस्टेट सामाजिक एकता व अकीदत का केंद्र है। शुक्रवार मुहर्रम की तीसरी तारीख को मियां साहब सैयद अदनान फर्रूख शाह ने अवाम के बीच इमामबाड़ा इस्टेट के नये सज्जादानशीन के रूप में सैयद अयान अली शाह की घोषणा कर ताजपोशी की। पैरहन पहनाकर दस्तार (पगड़ी) बांधी। माथे को चूमा, मुबारकबाद दी। इसके बाद सातवें सज्जादानशीन को मुबारकबाद देने वालों का तांता लग गया। लोगों ने बुके, फूल माला व गुलाब की पंखुड़ियों से नये सज्जादानशीन का जोरदार स्वागत किया।
सैयद अयान अली ने कहा कि इमामबाड़ा इस्टेट केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब, भाईचारे और इंसानियत की जीवंत मिसाल है। यहां हर मजहब और तबके के लोग अपनी मुरादों और दुआओं के साथ आते हैं। हजरत रौशन अली शाह का फैज सभी पर बराबर बरसता है।

तीसरी मुहर्रम के गश्त की सैयद अयान अली ने की अगुवाई
इमामबाड़ा इस्टेट में तीसरी मुर्हरम का रवायती गश्ती जुलूस अपने नियत समय पर नये सज्जादानशीन सैयद अयान अली शाह व मियां साहब अदनान फर्रुख शाह की अगवाई में अपनी पुरानी शानो-शौकत के साथ निकला। सज्जादानशीन जुलूस की शक्ल में पूरे इमामबाड़े का गश्त करते हुए हज़रत सैयद रौशन अली शाह की मजार पर पहुंचे और फातिहा पढ़कर मुर्हरम के गश्ती जुलूस के समापन की घोषणा की।
इमामबाड़ा इस्टेट के सज्जादानशीन
मियां बाजार स्थित इमामबाड़े की देखभाल सूफी हजरत सैयद रौशन अली शाह करते रहे। वर्ष 1818 ई. में हजरत रौशन अली शाह के शिष्य व भतीजे सैयद अहमद अली शाह इस इमामबाड़े के उत्तराधिकारी हुए। इन्होंने ही मियां साहब की उपाधि धारण की जो शिष्य परम्परा से चली आ रही है। इनके पिता का नाम सैयद फौलाद अली था। सैयद रौशन अली शाह ने सैयद अहमद अली शाह की देखभाल अपने जिम्मे ली। बाबा की छत्रछाया में अहमद अली शाह की तरबियत हुई। सैयद अहमद अली ने अपनी मेहनत व सलाहियत से अपने इल्म को निखारा। 17 साल की उम्र में शेरो शायरी शुरू की। उन्होंने उर्दू, अरबी, फारसी तीनों जुबानों में महारत हासिल की। उन्होंने कई किताबें लिखी। पहली किताब ‘कशफुल बगावत’ लिखी जो 1857 ई. के जंगे आजादी पर थी। दूसरी किताब ‘नूरे हकीकत’ लिखी। इसका मौजू मजहब था। तीसरी किताब ‘ महबूब-उत-तवारीख’ लिखी। जिसमें उन्होंने गोरखपुर की तारीख को लिखा।

उनके उत्तराधिकारी एवं इमामबाड़े के सज्जादानशाीन सैयद वाजिद अली शाह वर्ष 1915 ई. तक सज्जादानशीन रहे। इसके बाद नौ साल की उम्र में ही सैयद जव्वाद अली शाह सज्जादानशीन बने। वह वर्ष 1916 से 1972 ई. तक सज्जादानशीन रहे। इसके बाद बड़े मियां साहब के नाम से मशहूर सैयद मजहर अली शाह वर्ष 1973 से 1986 ई. तक सज्जादानशीन रहे। वर्तमान में सैयद अदनान फर्रूख शाह वर्ष 1987 ई. से अब तक सज्जादानशीन रहे। तीसरी मुहर्रम से सज्जादानशीन की जिम्मेदारी सैयद अयान अली शाह के कांधों पर आ गई है।

मियां बाजार स्थित मियां साहब इमामबाड़ा इस्टेट की ऐतिहासिक इमारत इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। यह इमामबाड़ा सामाजिक एकता व अकीदत का मरकज है। यह भारत में सुन्नियों संप्रदाय का सबसे बड़ा इमामबाड़ा है। इमामबाड़े के दरो दीवार व सोने-चांदी की ताजिया में अवध स्थापत्य कला व कारीगरी रची बसी नज़र आती है। इमामबाड़ा के गेट पर अवध का राजशाही चिन्ह भी बना हुआ है। करीब तीन सौ सालों से हजरत सैयद रोशन अली शाह द्वारा जलाई धूनी आज भी जल रही है।
