रामकोला ( कुशीनगर)। लोकायत जन विकास केंद्र, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान और एसडीडीएस पीजी कालेज रामकोला द्वारा संयुक्त रूप से 18 जून को एसडीडीएस पीजी कालेज रामकोला में बोधि पथ सप्ताहव्यापी कार्यशाला के समापन अवसर पर जातक कथाओं पर परिचर्चा और कविता पाठ का आयोजन किया गया।
पहले सत्र में जातक कथाओं का मर्म : संदर्भ भारत का ज्ञान परम्परा ‘ पर परिचर्चा हुई।
परिचर्चा सत्र का प्रारंभ करते हुए प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो सदानंद शाही ने कहा कि जातक कथाएँ केवल मनोरंजन या अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य के भीतर सुप्त ‘पशुत्व’ को ‘बुद्धत्व’ में बदलने की व्यावहारिक वैचारिक प्रक्रिया हैं। उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों को साझा करते हुए बताया कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के भरहुत और सांची स्तूपों पर ब्राह्मी लिपि में अंकित दृश्य तथा अजंता की गुफा संख्या 17 के भित्ति चित्र इस बात की गवाही देते हैं कि ये कथाएँ सदियों से हमारी लोक-चेतना का हिस्सा रही हैं।
प्रो. शाही ने ‘सीहचम्म जातक’ का उदाहरण देते हुए इसके ईसप की कहानियों (Aesop’s Fables) पर पड़े प्रभाव तथा ‘बावेरु जातक’ के माध्यम से ‘अरेबियन नाइट्स’ और सिंदबाद की कहानियों में इसके वैश्विक प्रसार को भी रेखांकित किया।

गाजीपुर से आए प्राध्यापक डॉ निरंजन कुमार ने कहा कि जातक कथाएँ नैतिक और मानवीय सद्वृति विषयक शिक्षाओं का एक अहम स्रोत हैं। इन कथाओं में अच्छाई एवं बुराई का संघर्ष, ईमानदारी, दया , न्याय तथा विवेक और प्रज्ञा जैसे गुणों का महत्त्व प्रमुख रूप से उभरकर हमारे सामने आता है। जो बात इन कथाओं को विशेष बनाती है, वह यह है कि ये मानव और प्रकृति के सम्बंध को एक सरल और बोधगम्य तरीके से प्रस्तुत करती हैं। बुद्ध मनुष्य भी हैं। जीव – जंतु भी हैं और पेड़ पौधे के रूप में भी हैं ।
बलरामपुर में हिंदी के प्राध्यापक डॉ भानु प्रताप सिंह ने कहा है कि प्रोफेसर सदानंद शाही जी बुद्ध के जीवन और दर्शन पर बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। जातक कथाओं पर यह कार्यशाला उसी की एक कड़ी है। जातक कथाएं विश्व की सबसे प्राचीन कथाएं हैं। इनका प्रभाव सभी भाषाओं की कहानियों पर पड़ा है।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि जातक कथाओं को पढ़ने से बुद्ध और उनके पूर्व के समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थितियों के बारे में पता चलता है। उस समय बन रहे नए वर्गों , आर्थिक व्यवस्था, लोक विश्वासों के साथ-साथ नदियों, पहाड़ों, वनों, नगरों और ग्रामों की जानकारी मिलती है।

उन्होंने कई जातक कथाओं यथा ‘ फल जातक ‘, ‘ नाम सिद्धि जातक ‘, ‘ वानरिंद जातक ‘ सुनाते हुए कहा कि जातकों का रूप लोक साहित्य का है। इसमें मनुष्य, पशुओं, वृक्षों सहित प्रकृति की सरस कथाएँ हैं। जातकों का प्रभाव ना केवल भारतीय वरन विश्व साहित्य पर पड़ा। जातक कथाओं से मिलती जुलती लोक कथाएँ आज भी हमें साधारण जन से सुनाई देती हैं।
परिचर्चा में हस्तक्षेप करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ रामनरेश राम ने कहा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति की महत्त्वपूर्ण बौद्धिक संपदा के रूप में जातक कथाओं को देखा जाना चाहिए । इन जातक कथाओं से प्राचीन भारत मे व्यापार प्रविधि और व्यापारिक रास्तों के बारे में पता चलता है। इन कथाओं के इसीलिए प्राचीन भारत की खिड़की भी कहा गया है। ये कथाएं पुनर्जन्म की कहानियां कहती हैं। लेकिन यहां पुनर्जन्म एक टेक्निक मात्र है। इन कथाओं को अभिधात्मक अर्थ में नही समझा जा सकता है। ये कहानियां पोलमिकल लगती हैं। बुद्ध के पुनर्जन्म का जो संदर्भ इन कथाओं में मिलता है दरसल यह पुनर्जन्म नहीं बल्कि समस्त प्राणी जगत को संबोधित करने के लिए संचार के लोकप्रिय माध्यम के रूप में प्रकृति से एकात्मकता के उदाहरण हैं। हमे आधुनिक विज्ञान ने यह बताया कि एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है और सभी प्राणियों का जीवन अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर करता है, उसी तरह से ये कहानियाँ एक परिस्थिक्तिकी तंत्र की समझ को व्यक्त करती हैं। जिनमे व्यक्त ज्ञान दरसल भारतीय जन जीवन के अनुभवों से बनी हैं। इसलिए ये भारतीय ज्ञान परंपरा की असली धारा को व्यक्त करने वाली हैं। इन जातक कथाओं के माध्यम से हमे भारतीय इतिहास के ओझल पक्षों को उजागर करने में मदद मिल सकती है।

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार चौधरी ने कहा कि बुद्ध ने एक नवीन युग का सूत्रपात किया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था का विरोध किया और कहा कि सभी व्यक्ति एक समान है और उसके साथ कोई भेदभाव नहीं होनी चाहिए। जातक कथाओं के ज़रिए बुद्ध वचन को साधारण जन तक पहुँचाने का कार्य हुआ। जातकों से तत्कालीन समाज की यथार्थ जानकारी मिलती है। साथ यह भी कि बुद्ध और उनका भिक्षु संघ किस तरह समाज व्यवस्था के बदलाव में लगे थे।
दूसरे सत्र में वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्रीधर मिश्र, जयप्रकाश नाटक, राणा प्रताप, ओंकार सिंह, राघवेन्द्र शाही , कवयित्री डॉ चेतना पांडेय, शिवांगी गोयल, आकृति विज्ञा अर्पण ने कविता पाठ किया। कविता पाठ का संचालन आकृति विज्ञा अर्पण ने किया।

इस मौक़े पर जातक कथा चित्र प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा की गई। चित्रकला प्रतियोगता में प्रथम स्थान वंदना, दूसरा स्थान श्रुति पटेल और तीसरा स्थान हर्षिका अग्रवाल को दिया गया। आँचल विश्वकर्मा, हिना, शालू विश्वकर्मा वी जन्नतुन को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। रामकोला स्थित त्रिवेणी सुगर मिल के महाप्रबंधक यशराज सिंह ने छात्राओं को पुरस्कार दिए।
इस अवसर पर डॉ जाह्नवी सिंह, सेवानिवृत्त प्राचार्य हरेन्द्र सिंह, बृजेश गोविंद राव सहित कई महाविद्यालय की छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
