साहित्य - संस्कृति

“ बुद्धकालीन समाज का दिग्दर्शन हैं जातक कथाएँ ”

गोरखपुर। बोधि पथ कार्यशाला के समापन अवसर पर आज राजकीय बौद्ध संग्रहालय के सभागार में जातक कथाओं पर परिचर्चा और कविता पाठ का आयोजन किया गया। यह आयोजन प्रेमचन्द साहित्य संस्थान, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान और राजकीय बौद्ध संग्रहालय द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।

आज के आयोजन के पहले सत्र में ‘ जातक कथाओं का मर्म : संदर्भ-भारत की ज्ञान परम्पराएं ‘ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें देश के जाने माने साहित्यकारों और विद्वानों ने शिरकत की।

परिचर्चा की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार प्रो रामदेव शुक्ल ने कहा कि भारतीयता का निर्माण अद्भुत मिश्रण से होता है। बिना संवाद के कोई संस्कृति आगे नहीं बढ़ सकती। मनुष्यकृत भेद चलने वाला है। हिंदुस्तान की ग़ज़ब की विशेषता है जो भी चीज यहाँ आयी उसे हमने और बेहतर बना दिया। जातक कथाओं का मर्म यही कि मनुष्य-मनुष्य एक बने रहें और कोई पार्थकता स्वीकार नहीं है।

परिचर्चा के मुख्य वक्ता वाराणसी से आए पाली साहित्य के विद्वान रामसुधार सिंह ने पाली में जातक कथाओं को सुनाते हुए कहा कि बौद्ध साहित्य में धम्मपद और जातक कथाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। धम्मपद बुद्ध वचन हैं तो जातक बुद्ध द्वारा कही गई कथाएँ हैं। जातक कथाएँ तत्कालीन समाज का दिग्दर्शन है जिसमें राजनीतिक व्यवस्था, धार्मिक विश्वास, नए बनते समाज का सूक्ष्म विवरण मिलता है। बुद्ध के समय रूढ़ियों की रेत खड़ी हो गई थी जिसे हटाने का काम बौद्ध साहित्य ने किया।

परिचर्चा के प्रारंभ में प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो सदानंद शाही ने बोधि पथ कार्यशाला के बारे में बताते हुए कहा कि जातक कथाओं का केवल भारत में नहीं बल्कि विश्व कथा साहित्य के विकास में बड़ा योगदान हैं। प्रो. शाही ने ‘सीहचम्म जातक’ का उदाहरण देते हुए इसके ईसप की कहानियों (Aesop’s Fables) पर पड़े प्रभाव तथा ‘बावेरु जातक’ के माध्यम से ‘अरेबियन नाइट्स’ और सिंदबाद की कहानियों में इसके वैश्विक प्रसार को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बुद्ध द्वारा स्थापित विहार और भिक्षु संघ शिक्षा के विकसित और संगठित केंद्र थे। उन्होंने शिक्षा के लोकतांत्रीकरण में बड़ा योगदान किया।

प्रो शाही ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा कोई एकरैखिक परम्परा नहीं है। सहस्रों परंपराएं है जो एक दूसरे को काटती भाईं है और उसको विस्तारित भी करती हैं।

दलित और आदिवासी संगठनों के राष्ट्रीय परिसंघ के अध्यक्ष अशोक भारती ने कहा कि जातक कथाएँ समाज में ज्ञान की खोज की धारायें हैं। बौद्ध दर्शन ने जनता के बीच पैदा हुए ज्ञान को आगे ले जाने का कार्य किया। जातक कथाएँ कर्म की प्रधानता देती हैं।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर अनिल कुमार राय ने भारतीय ज्ञान परंपरा के ज़रिए राज्य सत्ता द्वारा ख़ास तरह का बौद्धिक वातावरण निर्मित करने की राजनीति की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा एकवचन नहीं  बहुवचन प्रत्यय है। भारतीय ज्ञान परंपरा में सिर्फ़ संस्कृत के ज्ञान ग्रंथों की ही बात की जा रही है जबकि संस्कृत के अलावा प्राकृत , अपभ्रंश, पाली सहित तमाम भाषाओं की ज्ञान परंपरा को अनदेखा किया जा रहा है। यह वर्चस्वी एकाधिकार और नियंत्रण की राजनीतिक कोशिश है। उन्होंने कहा कि जातक कथाओं ने मनुष्य को मनुष्य बनाने में बड़ी भूमिका निभायी।

बस्ती से आए वरिष्ठ आलोचक डॉ रघुवंश मणि ने कहा कि जातक कथाएँ नीति शिक्षा की ओर ले जाती हैं। वे परिमाताएँ हैं जिसके ज़रिए मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है। बौद्ध धर्म नैतिकता और सद्गुणों का धर्म है। जातक कथाओं से विश्व साहित्य पर प्रभाव की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज का वैश्वीकरण नब्बे के दशक में हुआ लेकिन ज्ञान का वैश्वीकरण बहुत प्राचीन है। दुनिया के तमाम भागों से वाणिज्यिक संपर्क के विस्तार के साथ ज्ञान का भी आदान-प्रदान हो रहा था। विभिन्न विचार एक दूसरे से संवाद कर रहे थे। रही थी। ज्ञान परम्परा संवाद और विवाद से आगे बढ़ती है।

परिचर्चा में विशेष रूप से उपस्थित विद्याश्री न्यास के सचिव दयानिधि मिश्र ने सहमति जतायी कि भारतीय ज्ञान बहुलतावादी है।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय के उपनिदेशक यशवंत सिंह राठौड़ ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।

परिचर्चा का संचालन राजकीय महाविद्यालय पचपेड़वा ( बलरामपुर) में हिंदी के प्राध्यापक भानु प्रताप सिंह ने किया।

इस मौके पर प्रो रामदेव शुक्ल को विद्याश्री न्यास द्वारा भोजपुरी वैभव सम्मान से सम्मानित किया गया। राजकीय बौद्ध संग्रहालय के नवीनतम ब्रोशर का लोकार्पण किया गया। जातक कथाओं के प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र दिए गए।

कार्यक्रम का दूसरा सत्र कविता पाठ का था। इस सत्र में जाने माने कवि अष्टभुजा शुक्ल, देवेन्द्र आर्य, प्रकाश उदय, स्वप्निल श्रीवास्तव, डॉ रंजना जायसवाल, अर्पण कुमार, विशाल श्रीवास्तव, ज्योति रीता, केतन यादव, शिवांगी गोयल ने कविता पाठ किया।

इस सत्र का संचालन युवा कवि केतन यादव ने किया।

आज के आयोजन में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूरे अध्यक्ष प्रो चितरंजन मिश्र, प्रो अरविंद त्रिपाठी, आलोचक कपिल देव, पूर्व सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही, वरिष्ठ पत्रकार जगदीश लाल श्रीवास्तव, राघवेंद्र दुबे, अशोक चौधरी, पृथ्वीराज सिंह, राजाराम चौधरी, स्वदेश, टीपी शाही, डॉ चतुरानन ओझा, डॉ अचल पुलस्तेय,सरिता यादव, नितेन अग्रवाल, रिंकी प्रजापति, जेपी सिंह एडवोकेट, आरके सिंह, वरिष्ठ कथाकार लाल बहादुर, संतोष श्रीवास्तव, आदित्य राजन आदि उपस्थित थे।

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