देवेन्द्र आर्य
गोरखपुर की विमर्श केन्द्रित संस्था “आयाम” के लिए इससे बेहतर मंच क्या हो सकता था जहाँ साहित्यकार, बुद्धिजीवी, वन संरक्षक एवं वन्यजीव चिकित्सक, उन्हें रेस्क्यू करने वाले, वन और वन्यजीव प्रेमी एक साथ मिल बैठ कर देश के मानचित्र पर सुकुड़ते जा रहे जंगलों से जुड़ी परिस्थितिकी, पृथ्वी के संरक्षण, इकोलॅजी पर उत्पन्न ख़तरे और उससे प्रभावित पर्यावरण का मनुष्य जीवन पर पड़ रहे प्रभाव पर गहन चर्चा कर रहे हों।
अवसर था शिक्षाविद, समाजिक ऐक्टिविस्ट, शिक्षिका श्रीमती मंजूलता कि सद्यः प्रकाशित वन्य जीवन पर संस्मरणों की पुस्तक ” कुछ अपनी कुछ जंगल की ” के लोकार्पण का।
इस अवसर पर गोरखपुर के अशफ़ाक़ उल्लाह प्राणि उद्यान के सभागार में मंच पर थे साहित्यकार डा. वेदप्रकाश पाण्डेय, दलित जीवन के गहन अध्येता-चिंतक डा .अलख निरंजन, आई. एफ. यस, प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ बी.सी.बह्मा और उप निदेशक, पशु चिकित्सक डा. योगेश प्रताप सिंह तथा लेखिका मंजूलता।
आयाम के संयोजक कवि देवेन्द्र आर्य ने लेखिका का सम्मान करते हुए पुस्तक का परिचय सभागार में उपस्थित बुद्धिजीवियों को देते हुए बताया कि मजूलता जी की यह पहली पुस्तक क्यों पढ़ी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पृथ्वी, प्रकृति और पर्यावरण, तीनों तभी खु़शहाल रह सकते हैं जब वन्य जीवन और मनुष्य जीवन के बीच एक समन्वय भरा संतुलन बना रहे।
हमने विकास के नाम पर वनों को जंगल का सम्बोधन देकर भाषा के साथ अन्याय किया है और जंगल को जंगलीपन के अर्थ में सीमित कर दिया है। प्राकृतिक जंगल अविकसित, ख़तरनाक और आदिम जीवन का पर्याय बनते गए जिसे मिटा कर कंकरीट के जंगल खड़े करना ही विकास की परिभाषा हो गई है। वृक्षों , जलाशयों, नदियों को विकास में अवरोध माना जाने लगा है। जंगल (वन) सभ्यता विरोधी का अर्थ देने लगे। मंजूलता की यह पुस्तक इस अवधारणा को तोड़ती है कि वन्यजीव का मतलब जंगली जीवन है। लेखिका बार-बार स्वीकार करती है कि उसके वन्य जीवन अनुभव और उसके पुस्तकाकार रूप में सामने आने की प्रेरणा उनके पति, फ़्रेंड, फ़िलास्फ़र, गाइड , कवि , विज्ञान कथा लेखक उनके पति अमित कुमार से मिली है।
लोकार्पण समारोह का बेहतरीन संचालन श्री उमेश भास्कर और धन्यवाद ज्ञापन अजय कुमार सिंह ने किया।
यह पुस्तक ‘ रोमांच के साथ रोमांस ‘ का अद्भुत संगम है। भाषा का यह प्रयोग मेरी बात की ताईद का उदाहरण है — ‘मैंने मन ही मन सोचा कि दिखना तो ठीक है पर कोई इस तरह से भी क्या दिखे कि दिल धक हो जाए। फिर सोची, किसी के दिखने पर दिल धक भी न हो तो उसका दिखना भी क्या ? ‘
पुस्तक की भाषा अत्यंत सरल, सहज है और बयान काव्यात्मक और कहीं-कहीं चित्रात्मक हो गए हैं। कुछ एक वाक्य तो मुहावरा बनने लायक हैं जैसे –‘ हमने बाघ को तो नहीं देखा पर यह संतोष तो था कि बाघ ने हमें तो देखा ही होगा’ या फिर
‘घास है तो बाघ हैं, बाघ है तो जंगल है।’
पुस्तक सूचनात्मक संस्मरणों से भरी पड़ी है जैसे राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित ‘बकरी बैंक’। देवप्रयाग स्थित भागीरथी और अलकनंदा के संगम का वर्णन करते हुए मंजू लिखती हैं — ‘दो नदियों के संगम में जो बड़ी नदी होती है उसी का नाम चलता है। यहाँ भागीदारी और अलकनंदा नदी के संगम के बाद आगे बढ़ी नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है। ‘
एक संस्मरण निशाचर प्राणी एशियाई पाम सिवेट के रेस्क्यू का भी है जिसके बारे में ‘एक तथ्य और है कि दुनिया की सबसे मंहगी काफी ( kopi Luwak) इंडोनेशिया में पाए जाने वाले सिवेट जैसे जंगली जानवर के मल से निकले, बिना पचे हुए खड़े-खड़े बीन्स को धो-सुखा कर बनाई जाती है।
इस पुस्तक में न केवल जंगली प्राणियों के बारे में संस्मरण हैं बल्कि तमाम पक्षियों के स्वभाव, रहन-सहन-स्वभाव का भी भोगा हुआ वर्णन है। वे लिखती हैं –‘प्रकृति का अवलोकन अपने आप में दुनिया का सबसे सुकून और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति का माध्यम है। हम अपने आप से सही अर्थों में तभी जुड़ पाते हैं, अपने भीतर भी हम प्रवेश तभी कर पाते हैं, अपने आप से साक्षात्कार हम तभी कर पाते हैं जब हम प्रकृति से साक्षात्कार करते हैं। ‘
‘ प्रकृति ने कितने चेक एंड बैलेंस का तरीका बनाया है कि किसी का आधिपत्य न होने पाए’ । प्रकृति की इस फिलासफी और मंशा को समझ पाने के लिए इस तरह के पर्यटन आवश्यक हैं। पुस्तक का शीर्षक : ” कुछ अपनी कुछ जंगल की “अपने भीतर के कंटेंट का न केवल आईना है बल्कि उसे पूरी तरफ़ जस्टीफाइड करता है जिसके लिए भी लेखिका बधाई की पात्र हैं। अनायास नहीं कि पुस्तक की विस्तृत भूमिका मैंगलोर (कर्नाटक) की शौकिया पक्षी वैज्ञानिक, राजनीतिक चेतना सम्पन्न लेखिका मीरा मेघमाला ने लिखी है।
यह पुस्तक अपने दाम्पत्य जीवन के पर्यटन पक्ष के साथ ही वन्यजीवों के हालचाल का समाहार प्रस्तुत करती है जिसने अपना लक्ष्य ‘सैर कर दुनिया की गाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ‘ को बना रखा है – “महीने में एक छोटा ट्रिप और तीन महीने में एक बड़ा ट्रिप “
आमतौर पर कविता कहानी लिख कर साहित्यकार कहलाने वाले समय में एक भिन्न मगर बेहद आवश्यक विषय पर लिखने का साहस करने वाली मंजूलता को इस पुस्तक के लिए एक बार पुनः बधाई!
आशा है पर्यावरण और परिस्थितिकी की चिंता करने वालों के बीच यह पुस्तक समादृत की जाएगी।
