वाराणसी। लंका स्थित “क” कला दीर्घा में 24 मई की शाम ‘साखी शोधशाला, वाराणसी’ एवं ‘अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ’ के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत ‘संवाद सत्र: जातक कथाओं का मर्म’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विद्वानों ने जातक कथाओं के दार्शनिक, ऐतिहासिक, कलात्मक और सामाजिक पक्षों पर अत्यंत सारगर्भित विचार व्यक्त किए।कार्यक्रम में भरहुत, सांची और अजंता के पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ जातक कथाओं के वैश्विक प्रभाव पर हुई गंभीर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. सदानन्द शाही (पूर्व कुलपति एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बीएचयू) ने जातक कथाओं के मर्म को वैश्विक और समकालीन परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया। प्रो. शाही ने कहा कि जातक कथाएँ केवल मनोरंजन या अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य के भीतर सुप्त ‘पशुत्व’ को ‘बुद्धत्व’ में बदलने की व्यावहारिक वैचारिक प्रक्रिया हैं। उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों को साझा करते हुए बताया कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के भरहुत और सांची स्तूपों पर ब्राह्मी लिपि में अंकित दृश्य तथा अजंता की गुफा संख्या 17 के भित्ति चित्र इस बात की गवाही देते हैं कि ये कथाएँ सदियों से हमारी लोक-चेतना का हिस्सा रही हैं।

प्रो. शाही ने ‘सीहचम्म जातक’ का उदाहरण देते हुए इसके ईसप की कहानियों (Aesop’s Fables) पर पड़े प्रभाव तथा ‘बावेरु जातक’ के माध्यम से ‘अरेबियन नाइट्स’ और सिंदबाद की कहानियों में इसके वैश्विक प्रसार को भी रेखांकित किया। उन्होंने चीनी यात्रियों फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों का उल्लेख करते हुए सिद्ध किया कि यह साहित्य भारत का वह प्रथम ‘सॉफ्ट पावर’ था जिसने पूरी दुनिया के लोक-मानस को बिना तलवार के जीत लिया।
विशिष्ट वक्ता प्रो. राम सुधार सिंह ने अपने वक्तव्य में जातक कथाओं की साहित्यिक विधा और उनके आंतरिक वर्गीकरण पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जातक की प्रत्येक गाथा और आख्यान का अपना एक अनूठा विन्यास है। उन्होंने इसके विविध स्वरूपों की चर्चा करते हुए ‘कलिङ्ग जातक’, ‘कणवेर जातक’ जैसी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की कथाओं का संदर्भ दिया।
प्रो. सिंह ने रेखांकित किया कि ये कथाएँ पुनर्जन्म, कर्म के सिद्धांत और मानव स्वभाव के द्वंद्व को बहुत ही सहजता से समझाती हैं। बुद्धत्व की सर्वोच्च दशा को प्राप्त करने के लिए जीवन में जो आदर्श होने चाहिए, उसका बीजारोपण इन्हीं जातक कथाओं के माध्यम से होता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में जातक कथाओं के आध्यात्मिक और सामाजिक दर्शन को समग्रता में समेटा। उन्होंने कहा कि आत्मिक सुख की प्राप्ति केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज के सभी जीवों की मुक्ति और परोपकार में है। बौद्ध दर्शन और सनातन परंपरा के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आत्मिक सुख ही परम सत्य है और अपने साथ सबकी मुक्ति के लिए जीना ही ‘करुणा’ का मूल तत्व है। ‘महाकपि जातक’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि दूसरों के लिए अपना सर्वोत्कृष्ट त्याग कर देना ही नेतृत्व का असली धर्म है। इस बोधिसत्व धर्म की करुणा ने आगे चलकर वैष्णव धर्म और भारतीय भक्ति आंदोलन को भी गहरे तक प्रभावित किया।
इस अवसर पर प्रो मृदुला सिन्हा, प्रो मनोज राय, प्रो दीनबंधु तिवारी, प्रो प्रकाश उदय, प्रो महेश प्रसाद अहीरवार, राहुल शॉ, गौरव प्रताप राव, पंकज वर्मा, अंशु प्रिया, राकेश बुनकर तथा वाराणसी के अनेक साहित्यकार, शोधार्थी, कलाप्रेमी और प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
