गोरखपुर। राजकीय बौद्ध संग्रहालय में शनिवार से प्रारंभ हुए प्रख्यात आलोचक प्रो परमानंद श्रीवास्तव पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘ परमानन्द श्रीवास्तव : अवदान और महत्त्व ‘ के दूसरे दिन दो सत्रों में परमानंद श्रीवास्तव की कविता, कथा और अन्य गद्य विधाओं की आलोचना पर देश के अलग-अलग स्थानों से आये जाने माने कवियों, आलोचकों ने विस्तार से चर्चा की।
दूसरे दिन का पहला सत्र तकनीकी सत्र था जिसमें छह शोधार्थियों – कंचन पटेल, आकाश यादव, अखिलेश पांडेय, शिवांगी गुप्ता, नीलकमल, मृत्युंजय कुमार ने शोध पत्र का वाचन किया।
इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे नालंदा से आये प्रो रवींद्रनाथ श्रीवास्तव परिचय दास ने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना गहन लालित्य से परिपूर्ण रचना है। वे अपनी आलोचना में फ़ैसलाक़ून नहीं हैं। उनकी आलोचना केवल साहित्यिक नहीं थी बल्कि उसमें गहरी सामाजिकता अनुस्यूत थी। इस सत्र में विषय विशेषज्ञ के रूप में राकेश रंजन और किरन तिवारी उपस्थित थे।
इसके बाद के ‘ कविता की आलोचना और प्रेमचंद’ सत्र की अध्यक्षता कर रहे पटना से आये प्रख्यात कवि अरुण कमल ने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव ऐसे आलोचक हैं जो रचना का पाठ और उसकी व्याख्या-विश्लेषण करते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। कई बार वे किसी निष्कर्ष ‘ पर नहीं भी पहुंचते हैं। उत्तर आधुनिकता के दौर में साहित्य की आलोचना क्षरित हुई है और उसकी जगह विमर्शों ने ले ली है। परमानंद श्रीवास्तव विमर्श के दौर के पहले अंतिम आलोचक हैं। वे साहित्य के बारे में सोचते हुए साहित्य की जड़ों के बारे में सोचते हैं।
अरुण कमल ने कहा कि परमानंद अपने समय में हिंसा और फासीवाद की आहट को देख रहे थे और इस बारे में बोल व लिख रहे थे। उन्होंने परमानंद की आलोचना के सूत्रों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वे लिखते हैं कि बड़ी कविता वह है जिसे एक अर्थ में सीमित न किया जा सके। हर कविता किसी पीछे की कविता को खोज कर लाती है और उसे नया जीवन देती है। परमानंद गंभीर आलोचक हैं। उनके प्रिय कवि निराला, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और रघुवीर सहाय हैं। परमानंद एक और महत्वपूर्ण सूत्र देते हैं कि कविता गद्य का व्यवहार करते हुए अपने को नए ढंग से बरतती है। गद्य में लिखी कविता को भाषा की सभी शक्तियों का व्यवहार करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि परमानंद जी स्त्री कविता पर सबसे महत्वपूर्ण लिखने वाले आलोचक हैं। वे कहते हैं कि श्रेष्ठ कविता कुछ भी बाहर नहीं रखती। वह अधिक से अधिक को अपने भीतर लेने की कोशिश करती है।
इस सत्र में बातचीत शुरू करते हुए आसनसोल से आये युवा कवि निशांत ने परमानंद श्रीवास्तव की कई कविताओं को उद्धृत करते हुए कहा कि परमानन्द श्रीवास्तव ने गीत लिखे।इस यात्रा में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह और देवेन्द्र बंगाली साथ थे। तीनों कवियों में समय का यथार्थ और भविष्यगामी कल्पनाओं की सामंजस्य देखने को मिलता है। परमानंद जी की कविताओं में अपने समय का राजनैतिक प्रतिरोध दर्ज है और वे हिंसा के बरक्स प्रेम को बचाने की बात करते हैं। उन्होंने कविता की भाषा में बहुत तोड़फोड़ नहीं की। उनमें यथार्थ को पकड़ने की दृष्टि है।

फ़ैज़ाबाद से आए कवि विशाल श्रीवास्तव ने परमानंद श्रीवास्तव की डायरी ‘ एक विस्थापित की डायरी’ की चर्चा करते हुए कहा कि वे विस्थापन को बहुत गंभीरता और व्यापकता में देखते हैं। आज विस्थापन का एक गहरा दौर चल रहा है। वे अपनी आलोचना में भारतीय साहित्य के साथ विश्व साहित्य पर व्यापक व सम्यक दृष्टि रखते हैं। उनकी नजर सिनेमा, संगीत के साथ सभी गतिविधियों पर रहती है। उनका लिखा सम्पूर्ण साहित्य बीहड़ जंगल में पगडंडियों पर चलते हुए आगे बढ़ने जैसा है।
मुंबई से आये जाने माने कवि बोधिसत्व ने कहा कि परमानंद मूलतः कवि कवि और कवि दृष्टि के आलोचक थे। उनकी आलोचना की भाषा दूसरे आलोचकों से भिन्न पठनीय है। उन्होंने कभी कटु बातें नहीं कही और निंदा में नहीं पड़े। उपलब्धियों का लेखा जोखा नहीं रखा और हमेशा सार्थक और सौहार्द रहे।
कानपुर से आए वरिष्ठ कवि पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि परमानंद के आलोचनात्मक अवदान का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन नहीं हुआ। यह आयोजन इस अभाव की पूर्ति करता है। उन्होंने हिंदी ही नहीं भारतीय और विश्व कविता पर विचार किया। नारायण सुर्वे की कविता पर लिखे लेख की चर्चा करते हुए कहा कि इसके ज़रिए वे सांप्रदायिक फासीवाद की आहटो को दर्ज करते हैं। वे उन कविताओं को सर्वाधिक महत्व देते हैं जिसमें दुख और संघर्ष है। वे कविता का प्रतिमान बनाते है कि जिस कविता में संघर्ष और गहरा दुख का प्रतिबिंबन है उसे श्रेष्ठ कविता कहना चाहिए। उनकी आलोचना में अंतरपाठीयता का सौंदर्य बहुत मूल्यवान है।
फ़ैज़ाबाद से आये वरिष्ठ आलोचक रघुवंश मणि ने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना बहुत श्रमसाध्य है। उनकी आलोचना को केवल टिप्पणियाँ कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कई कवियों पर पूरी किताब लिखी है। उनकी आलोचना में उनके समय के कवि तो हैं हीं वहाँ से आगे बढ़कर नए कवियों तक आते हैं। वे अपनी आलोचना में यथार्थ को बहुत महत्व देते हैं। वे यथार्थ उन्मुख साहित्य की चर्चा करते भिन्न भिन्न शैली से उसमें मौजूद यथार्थ का उद्घाटन करते हैं। उनकी आलोचना में समय समय पर परिवर्तन आता है जो समय के डायलेटिक्स की वजह से है।
बस्ती से आये वरिष्ठ कवि अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि हिंदी साहित्य में संस्थापन की पीड़ा को कम चिह्नित किया गया है। यह अलग किस्म की पीड़ा है। इसकी पीड़ा साहित्य-संस्कृति की पीड़ा है, किसानों, स्त्रियों की पीड़ा है। श्री शुक्ल ने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव दैनंदिन आलोचक थे। वे अतिसक्रिय थे। वह एकमात्र आलोचक हैं जिन्होंने नवे दशक की कविता का सर्वाधिक संज्ञान लिया। उनकी आलोचना सुग्राह्य है।
इस सत्र का संचालन आगरा से आये युवा साहित्यकार बृजराज सिंह ने किया।
